जनम जनम की इसु मन कउ मलु लागी काला होआ सिआहु ॥
खंनली धोती उजली न होवई जे सउ धोवणि पाहु ॥
गुर परसादी जीवतु मरै उलटी होवै मति बदलाहु ॥
नानक मैलु न लगई ना फिरि जोनी पाहु ॥1॥
चहु जुगी कलि काली कांढी इक उतम पदवी इसु जुग माहि ॥
गुरमुखि हरि कीरति फलु पाईऐ जिन कउ हरि लिखि पाहि ॥
नानक गुर परसादी अनदिनु भगति हरि उचरहि हरि भगती माहि समाहि ॥2॥
हरि हरि मेलि साध जन संगति मुखि बोली हरि हरि भली बाणि ॥
हरि गुण गावा हरि नित चवा गुरमती हरि रंगु सदा माणि ॥
हरि जपि जपि अउखध खाधिआ सभि रोग गवाते दुखा घाणि ॥
जिना सासि गिरासि न विसरै से हरि जन पूरे सही जाणि ॥
जो गुरमुखि हरि आराधदे तिन चूकी जम की जगत काणि ॥22॥
रे जन उथारै दबिओहु सुतिआ गई विहाइ ॥
सतिगुर का सबदु सुणि न जागिओ अंतरि न उपजिओ चाउ ॥
सरीरु जलउ गुण बाहरा जो गुर कार न कमाइ ॥
जगतु जलंदा डिठु मै हउमै दूजै भाइ ॥
नानक गुर सरणाई उबरे सचु मनि सबदि धिआइ ॥1॥
सबदि रते हउमै गई सोभावंती नारि ॥
पिर कै भाणै सदा चलै ता बनिआ सीगारु ॥
सेज सुहावी सदा पिरु रावै हरि वरु पाइआ नारि ॥
ना हरि मरै न कदे दुखु लागै सदा सुहागणि नारि ॥
नानक हरि प्रभ मेलि लई गुर कै हेति पिआरि ॥2॥
जिना गुरु गोपिआ आपणा ते नर बुरिआरी ॥
हरि जीउ तिन का दरसनु ना करहु पापिसट हतिआरी ॥
ओहि घरि घरि फिरहि कुसुध मनि जिउ धरकट नारी ॥
वडभागी संगति मिले गुरमुखि सवारी ॥
हरि मेलहु सतिगुर दइआ करि गुर कउ बलिहारी ॥23॥
गुर सेवा ते सुखु ऊपजै फिरि दुखु न लगै आइ ॥
जंमणु मरणा मिटि गइआ कालै का किछु न बसाइ ॥
हरि सेती मनु रवि रहिआ सचे रहिआ समाइ ॥
नानक हउ बलिहारी तिंन कउ जो चलनि सतिगुर भाइ ॥1॥
बिनु सबदै सुधु न होवई जे अनेक करै सीगार ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “श्लोक महला 3॥ कई जन्मों की इस मन को मैल लगी हुई है इसलिए ये बहुत ही काला हुआ पड़ा है (सफेद नहीं हो सकता)।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।