हउ बलिहारी तिंन कंउ जो गुरमुखि सिखा ॥
जो हरि नामु धिआइदे तिन दरसनु पिखा ॥
सुणि कीरतनु हरि गुण रवा हरि जसु मनि लिखा ॥
हरि नामु सलाही रंग सिउ सभि किलविख क्रिखा ॥
धनु धंनु सुहावा सो सरीरु थानु है जिथै मेरा गुरु धरे विखा ॥19॥
गुर बिनु गिआनु न होवई ना सुखु वसै मनि आइ ॥
नानक नाम विहूणे मनमुखी जासनि जनमु गवाइ ॥1॥
सिध साधिक नावै नो सभि खोजदे थकि रहे लिव लाइ ॥
बिनु सतिगुर किनै न पाइओ गुरमुखि मिलै मिलाइ ॥
बिनु नावै पैनणु खाणु सभु बादि है धिगु सिधी धिगु करमाति ॥
सा सिधि सा करमाति है अचिंतु करे जिसु दाति ॥
नानक गुरमुखि हरि नामु मनि वसै एहा सिधि एहा करमाति ॥2॥
हम ढाढी हरि प्रभ खसम के नित गावह हरि गुण छंता ॥
हरि कीरतनु करह हरि जसु सुणह तिसु कवला कंता ॥
हरि दाता सभु जगतु भिखारीआ मंगत जन जंता ॥
हरि देवहु दानु दइआल होइ विचि पाथर क्रिम जंता ॥
जन नानक नामु धिआइआ गुरमुखि धनवंता ॥20॥
पड़णा गुड़णा संसार की कार है अंदरि त्रिसना विकारु ॥
हउमै विचि सभि पड़ि थके दूजै भाइ खुआरु ॥
सो पड़िआ सो पंडितु बीना गुर सबदि करे वीचारु ॥
अंदरु खोजै ततु लहै पाए मोख दुआरु ॥
गुण निधानु हरि पाइआ सहजि करे वीचारु ॥
धंनु वापारी नानका जिसु गुरमुखि नामु अधारु ॥1॥
विणु मनु मारे कोइ न सिझई वेखहु को लिव लाइ ॥
भेखधारी तीरथी भवि थके ना एहु मनु मारिआ जाइ ॥
गुरमुखि एहु मनु जीवतु मरै सचि रहै लिव लाइ ॥
नानक इसु मन की मलु इउ उतरै हउमै सबदि जलाइ ॥2॥
हरि हरि संत मिलहु मेरे भाई हरि नामु द्रिड़ावहु इक किनका ॥
हरि हरि सीगारु बनावहु हरि जन हरि कापड़ु पहिरहु खिम का ॥
ऐसा सीगारु मेरे प्रभ भावै हरि लागै पिआरा प्रिम का ॥
हरि हरि नामु बोलहु दिनु राती सभि किलबिख काटै इक पलका ॥
हरि हरि दइआलु होवै जिसु उपरि सो गुरमुखि हरि जपि जिणका ॥21॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! गुरमुख मनुष्य जो कुछ करते हैं।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।