गुरु अंकसु जिनि नामु द्रिड़ाइआ भाई मनि वसिआ चूका भेखु ॥7॥ इहु तनु हाटु सराफ को भाई वखरु नामु अपारु ॥ इहु वखरु वापारी सो द्रिड़ै भाई गुर सबदि करे वीचारु ॥ धनु वापारी नानका भाई मेलि करे वापारु ॥8॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: (माया में मस्त मन-हाथी को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए) गुरू (का शबद) कुंडा है।गुरू ने ही परमात्मा का नाम मनुष्य को दृढ़ करवाया है।(गुरू की मेहर से जब नाम) मन में बसता है।तब धार्मिक दिखावा समाप्त हो जाता है। 7। हे भाई ! ये मानस शरीर परमात्मा-सर्राफ़ की दी हुई एक हाट है जिसमें कभी ना खत्म होने वाला नाम-सौदा है। वही जीव-व्यापारी इस सौदे का (अपने शरीर हाट में) दृढ़ता से वणज करता है जो गुरू के शबद में विचार करता है। हे नानक ! वह जीव-व्यापारी भाग्यशाली है जो साध-संगति में (रह के) ये व्यापार करता है। 8। 2।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 ॥ जिन लोगों ने सतिगुरू का पल्ला पकड़ा है।हे सज्जन ! उनके संगी-साथी भी पार लांघ जाते हैं। जिनकी जीभ परमात्मा का नाम-अमृत चखती है उनके (जीवन-यात्रा में विकार आदि की) रुकावटें नहीं पड़ती। हे सज्जन ! जो लोग परमात्मा के डर-अदब से वंचित रहते हैं वे विकारों के भार से लादे जाते हैं और संसार समुंद्र में डूब जाते हैं।पर जब परमात्मा मेहर की निगाह करता है तो उनको भी पार लंघा लेता है। 1। हे सज्जन प्रभू ! सदा आपको ही सलाहना चाहिए।हमेशा आपकी ही सिफत सालाह करनी चाहिए। (इस संसार-समुंद्र में से पार लांघने के लिए आपकी सिफत सालाह ही जीवों के लिए जहाज है।इस) जहाज के बिना भव-सागर में डूब जाते हैं।(कोई भी जीव समुंद्र का) दूसरा छोर ढूँढ नहीं सकता।रहाउ। हे सज्जन ! सलाहने योग्य परमात्मा की सिफत सालाह करनी चाहिए।उस जैसा और कोई नहीं। जो लोग प्यारे प्रभू की सिफत सालाह करते हैं वे भाग्यशाली हैं।गुरू के शबद में गहरी लगन रखने वाले व्यक्ति को परमात्मा का प्रेम रंग चढ़ता है। ऐसे आदमी की संगति अगर (किसी को) प्राप्त हो जाए तो वह हरी नाम का रस लेता है।और (नाम-दूध को) मथ के वह जगत के मूल प्रभू में मिल जाता है। 2। हे भाई ! सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का नाम प्रभू-पति को मिलने के लिए (इस जीवन-सफर में) राहदारी है।ये नाम सदा-स्थिर रहने वाली मेहर है। (प्रभू का यही हुकम है कि) जगत में जो भी आया है उसने (प्रभू को मिलने के लिए।ये नाम-रूपी राहदारी) लिख के अपने साथ ले जानी है। हे भाई ! प्रभू की इस आज्ञा को समझ (पर इस हुकम को समझने के लिए गुरू की शरण पड़ना पड़ेगा) गुरू के बिना प्रभू का हुकम समझा नहीं जा सकता।हे भाई ! (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के समझ लेता है।विकारों का मुकाबला करने के लिए उसको) सदा-स्थिर प्रभू का बल हासिल हो जाता है। 3। हे भाई ! जीव परमात्मा के हुकम अनुसार (पहले) माता के गर्भ में ठहरता है।और माँ के पेट में (दस महीने निवास रखता है)। उल्टे सिर भार रह के प्रभू के हुकम अनुसार ही (फिर) जनम लेता है। (किसी खास जीवन उद्देश्य के लिए ही जीव जगत में आता है) जो जीव गुरू की शरण पड़ कर जीवन-उद्देश्य को सँवार के यहाँ से जाता है वही परमात्मा की हजूरी में आदर पाता है। 4। हे सज्जन ! परमात्मा की रजा के अनुसार ही जीव जगत में आता है।रजा के अनुसार ही यहाँ से चला जाता है। जो मनुष्य अपने मन के पीछे चलता है (और माया के मोह में फस जाता है) उसे प्रभू की रजा के अनुसार ही बाँध के (भाव।जबरदस्ती) यहाँ से रवाना किया जाता है (क्योंकि मोह के कारण वह इस माया को छोड़ना नहीं चाहता)। परमात्मा की रजा के अनुसार ही जिसने गुरू के शबद के द्वारा (जीवन-उद्देश्य को) पहचान लिया है वह परमात्मा की हजूरी में आदर सहित जाता है। 5। हे भाई ! परमात्मा की रजा के अनुसार ही (कहीं) माया की सोच सोची जा रही है।प्रभू की रजा में ही कहीं अहंकार व कहीं द्वैत है। प्रभू की रजा के अनुसार ही (कहीं कोई माया की खातिर) भटक रहा है।(कहीं कोई) जनम-मरन के चक्कर में डाला जा रहा है।कहीं पाप की ठॅगी हुई दुनिया (अपने दुख) रो रही है। जिस मनुष्य को शाह-प्रभू की रजा की समझ आ जाती है।उसे सदा-स्थिर रहने वाला प्रभू मिल जाता है।उसकी (लोक-परलोक में) उपमा होती है। 6। हे भाई ! (जगत में माया का प्रभाव इतना है कि) परमात्मा का सदा-स्थिर रहने वाला नाम सिमरना बड़ा कठिन हो रहा है।ना ही प्रभू-नाम सुना जा रहा है (माया के प्रभाव तले जीव नाम नहीं सिमरते।नाम नहीं सुनते)। हे भाई ! मैं उन लोगों से कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने प्रभू की सिफत सालाह की है। (मेरी यही प्रार्थना है कि उन की संगति में) मुझे भी नाम मिले और मेरा जीवन संतोषी हो जाए।मेहर की नज़र वाले प्रभू के चरणों में मैं जुड़ा रहूँ। 7। हे भाई ! हमारा शरीर कागज बन जाए।यदि मन को स्याही की दवात बना लें। यदि हमारी जीभ प्रभू की सिफत सालाह बनने के लिए कलम बन जाए।तो हे भाई ! (सौभाग्य इसी बात में है कि) परमात्मा के गुणों को अपने विचार-मण्डल में ला के (अपने अंदर) उकरते चलो। हे नानक ! वह लिखारी धन्य है जो सदा-स्थिर प्रभू के नाम को हृदय में टिका के (अपने अंदर) उकर लेता है। 8। 3।
सोरठि महला 1 पहिला दुतुकी ॥ तू गुणदातौ निरमलो भाई निरमलु ना मनु होइ ॥ हम अपराधी निरगुणे भाई तुझ ही ते गुणु सोइ ॥1॥ मेरे प्रीतमा तू करता करि वेखु ॥ हउ पापी पाखंडीआ भाई मनि तनि नाम विसेखु ॥ रहाउ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 1 पहिला दुतुकी ॥ हे प्रभू ! आप (जीवों को अपने) गुणों की दाति देने वाला है।आप पवित्र स्वरूप है।(पर विकारों के कारण) हम जीवों का मन पवित्र नहीं। हम पापी हैं।गुण हीन हैं।हे प्रभू ! (पवित्रता का) वह गुण आपकी ओर से ही मिल सकता है। 1। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! आप मेरा करतार है।मुझे पैदा करके (अब आप ही) मेरी संभाल कर (और मुझे विकारों से बचा)। मैं पापी हूँ।पाखण्डी हूँ।हे प्यारे ! मेरे मन में मेरे तन में अपने नाम की महत्वता (पैदा कर)। 1।रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(माया में मस्त मन-हाथी को सीधे रास्ते पर चलाने के लिए) गुरू (का शबद) कुंडा है।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।