तब नानक चेतिओ चिंतामनि काटी जम की फासी ॥3॥7॥
रे नर इह साची जीअ धारि ॥
सगल जगतु है जैसे सुपना बिनसत लगत न बार ॥1॥ रहाउ ॥
बारू भीति बनाई रचि पचि रहत नही दिन चारि ॥
तैसे ही इह सुख माइआ के उरझिओ कहा गवार ॥1॥
अजहू समझि कछु बिगरिओ नाहिनि भजि ले नामु मुरारि ॥
कहु नानक निज मतु साधन कउ भाखिओ तोहि पुकारि ॥2॥8॥
इह जगि मीतु न देखिओ कोई ॥
सगल जगतु अपनै सुखि लागिओ दुख मै संगि न होई ॥1॥ रहाउ ॥
दारा मीत पूत सनबंधी सगरे धन सिउ लागे ॥
जब ही निरधन देखिओ नर कउ संगु छाडि सभ भागे ॥1॥
कहंउ कहा यिआ मन बउरे कउ इन सिउ नेहु लगाइओ ॥
दीना नाथ सकल भै भंजन जसु ता को बिसराइओ ॥2॥
सुआन पूछ जिउ भइओ न सूधउ बहुतु जतनु मै कीनउ ॥
नानक लाज बिरद की राखहु नामु तुहारउ लीनउ ॥3॥9॥
मन रे गहिओ न गुर उपदेसु ॥
कहा भइओ जउ मूडु मुडाइओ भगवउ कीनो भेसु ॥1॥ रहाउ ॥
साच छाडि कै झूठह लागिओ जनमु अकारथु खोइओ ॥
करि परपंच उदर निज पोखिओ पसु की निआई सोइओ ॥1॥
राम भजन की गति नही जानी माइआ हाथि बिकाना ॥
उरझि रहिओ बिखिअन संगि बउरा नामु रतनु बिसराना ॥2॥
रहिओ अचेतु न चेतिओ गोबिंद बिरथा अउध सिरानी ॥
कहु नानक हरि बिरदु पछानउ भूले सदा परानी ॥3॥10॥
जो नरु दुख मै दुखु नही मानै ॥
सुख सनेहु अरु भै नही जा कै कंचन माटी मानै ॥1॥ रहाउ ॥
नह निंदिआ नह उसतति जा कै लोभु मोहु अभिमाना ॥
हरख सोग ते रहै निआरउ नाहि मान अपमाना ॥1॥
आसा मनसा सगल तिआगै जग ते रहै निरासा ॥
कामु क्रोधु जिह परसै नाहनि तिह घटि ब्रहमु निवासा ॥2॥
गुर किरपा जिह नर कउ कीनी तिह इह जुगति पछानी ॥
नानक लीन भइओ गोबिंद सिउ जिउ पानी संगि पानी ॥3॥11॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु तेग बहादुर जी (1621-1675) की वाणी में वैराग्य और nश्वरता का स्वर लगातार है। उन्होंने जीवन का बड़ा हिस्सा एकांत में बिताया, असम और बिहार की यात्राओं में। 1675 में औरंगज़ेब के हुक्म पर उन्हें दिल्ली के चाँदनी चौक के पास शहीद किया गया, क्योंकि उन्होंने कश्मीरी पंडितों के धर्मांतरण से इनकार किया था। उनकी शहादत के स्थल पर आज सीस-गंज गुरुद्वारा है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे।
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।