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अंग 617

अंग
617
राग सोरठ
राग: सोरठ · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सोरठि महला 5 घरु 2 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥
ऊच नीच महि जोति समाणी घटि घटि माधउ जीआ ॥1॥
संतहु घटि घटि रहिआ समाहिओ ॥
पूरन पूरि रहिओ सरब महि जलि थलि रमईआ आहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुण निधान नानकु जसु गावै सतिगुरि भरमु चुकाइओ ॥
सरब निवासी सदा अलेपा सभ महि रहिआ समाइओ ॥2॥1॥29॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 2 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जैसे सब पौधों में आग (गुप्त रूप में मौजूद) है।जैसे हरेक किस्म के दूध में घी (मक्खन) गुप्त मौजूद है। वैसे अच्छे-बुरे सब जीवों में प्रभू की ज्योति समाई हुई है।परमात्मा हरेक शरीर में है।सब जीवों में है। 1। हे संत जनो ! परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है। वह पूरी तरह सारे शरीरों में व्यापक है।वह सुंदर राम पानी में है।धरती में है। 1।रहाउ। हे भाई ! नानक (उस) गुणों के खजाने परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है।गुरू ने (नानक का) भुलेखा दूर कर दिया है (तभी तो नानक को यकीन है कि) परमात्मा सब जीवों में बसता है (फिर भी) सदा (माया के मोह से) निर्लिप है।सब जीवों में समा रहा है। 2। 1। 29।
सोरठि महला 5 ॥
जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥
चारि पदारथ नव निधि पावहि बहुरि न त्रिसना भुखी ॥1॥
जा को नामु लैत तू सुखी ॥
सासि सासि धिआवहु ठाकुर कउ मन तन जीअरे मुखी ॥1॥ रहाउ ॥
सांति पावहि होवहि मन सीतल अगनि न अंतरि धुखी ॥
गुर नानक कउ प्रभू दिखाइआ जलि थलि त्रिभवणि रुखी ॥2॥2॥30॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू के सिमरन से आप खुशियों भरा जीवन जी सकता है आपके जनम-मरण के सारे डर और दुख दूर हैं सकते हैं। आप (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) चारों पदार्थ और दुनिया के नौ के नौ खजाने हासिल कर सकता है।(जिसके सिमरन से) आपको माया की प्यास भूख फिर नहीं व्यापेगी (उसका सिमरन हरेक सांस के साथ करता रह)। 1। हे जीव ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से आप सुखी हैं सकता है। उस पालनहार प्रभू को अपने मन से तन से मुँह से हरेक सांस से सिमरा कर। 1।रहाउ। (हे भाई ! सिमरन की बरकति से) आप शांति हासिल कर लेगा।आप अंतरात्मे शीतलता से भर जाएगा।आपके अंदर तृष्णा की आग नहीं धधकेगी। हे भाई ! गुरू ने (मुझे) नानक को वह परमात्मा पानी में धरती में वृक्षों में सारे संसार में बसता दिखा दिया है। 2। 2। 30।
सोरठि महला 5 ॥
काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥
इह भीतर ते इन कउ डारहु आपन निकटि बुलावहु ॥1॥
अपुनी बिधि आपि जनावहु ॥
हरि जन मंगल गावहु ॥1॥ रहाउ ॥
बिसरु नाही कबहू हीए ते इह बिधि मन महि पावहु ॥
गुरु पूरा भेटिओ वडभागी जन नानक कतहि न धावहु ॥2॥3॥31॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे प्रभू ! काम-क्रोध-लोभ-झूठ-निंदा (आदि) इन (सारे विकारों) से आप मुझे स्वयं छुड़ा ले। मेरे इस मन में से इन (विकारों) को निकाल दे।मुझे अपने चरणों में जोड़े रख। 1। हे प्रभू ! अपनी भक्ति की विधि आप मुझे खुद सिखा। मुझे प्रेरणा दे कि कि मैं आपके संत जनों के साथ मिल के आपकी सिफत सालाह के गीत गाया करूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मेरे मन में आप ऐसी शिक्षा डाल दे कि मेरे हृदय में से आप कभी ना बिसरे। हे दास नानक ! आपको बड़े भाग्यों से पूरा गुरू मिल गया है।अब आप किसी और की तरफ ना दौड़ता फिर। 2। 3। 31।
सोरठि महला 5 ॥
जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥
तिसु प्रभ तिआगि अवर कत राचहु जो सभ महि रहिआ समाई ॥1॥
हरि हरि सिमरहु संत गोपाला ॥
साधसंगि मिलि नामु धिआवहु पूरन होवै घाला ॥1॥ रहाउ ॥
सारि समालै निति प्रतिपालै प्रेम सहित गलि लावै ॥
कहु नानक प्रभ तुमरे बिसरत जगत जीवनु कैसे पावै ॥2॥4॥32॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू के सिमरन की बरकति से हरेक पदार्थ मिल सकता है।(सिमरन की) की हुई मेहनत व्यर्थ नहीं जाती। जो प्रभू सारी सृष्टि में मौजूद है उसे छोड़ के किस तरफ मस्त हो रहे हैं। 1। हे संत जनो ! सृष्टि के पालनहार को सदा सिमरते रहो। साध-संगति में मिल के प्रभू का नाम सिमरा करो।(सिमरन की) मेहनत जरूर सफल हो जाती है। 1।रहाउ। हे भाई ! वह परमात्मा (सब जीवों की) सार ले के संभाल करता है।सदैव पालना करता है (सिमरन करने वालों को) प्रेम से अपने गले से लगा लेता है। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! आपको विसार के जीव आपको कैसे मिल सकता है।और।आप ही सारे जीवों की जिंदगी का सहारा है। 2। 4। 32।
सोरठि महला 5 ॥
अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥
गुण निधान भगतन कउ बरतनि बिरला पावै कोई ॥1॥
मेरे मन जपि गुर गोपाल प्रभु सोई ॥
जा की सरणि पइआं सुखु पाईऐ बाहुड़ि दूखु न होई ॥1॥ रहाउ ॥
वडभागी साधसंगु परापति तिन भेटत दुरमति खोई ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरन करने से (मन से विकारों की) सारी मैल उतर जाती है जो नाश-रहित है।और।जो सारे जीवों को दातें देने वाला है। वह प्रभू सारे गुणों का खजाना है।भक्तों के वास्ते हर वक्त का सहारा है।पर।कोई विरला मनुष्य ही उसका मिलाप हासिल करता है। 1। हे मेरे मन ! उस प्रभू को जपा करो जो सबसे बड़ा है।जो सृष्टि को पालने वाला है।और। जिसका आसरा लेने से सुख प्राप्त कर लिया जाता है।फिर कभी दुख नहीं व्याप्ता। 1।रहाउ। हे भाई ! बड़ी किस्मत से भले मनुष्यों की संगति हासिल होती है।उनको मिलने से खोटी बुद्धि नाश हो जाती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 5 घरु 2 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।