Lulla Family

अंग ६१७ · सोरठ

अंग
617
सोरठ
अंग बदलें या अंश चुनें · ५ अंश

१ से १४३० तक कोई अंक लिखिए।

  1. सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥
  2. जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥
  3. काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥
  4. जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥
  5. अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥

सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥

सोरठि महला 5 घरु 2 दुपदे
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥
ऊच नीच महि जोति समाणी घटि घटि माधउ जीआ ॥1॥
संतहु घटि घटि रहिआ समाहिओ ॥
पूरन पूरि रहिओ सरब महि जलि थलि रमईआ आहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुण निधान नानकु जसु गावै सतिगुरि भरमु चुकाइओ ॥
सरब निवासी सदा अलेपा सभ महि रहिआ समाइओ ॥2॥1॥29॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 घरु 2 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! जैसे सब पौधों में आग (गुप्त रूप में मौजूद) है।जैसे हरेक किस्म के दूध में घी (मक्खन) गुप्त मौजूद है। वैसे अच्छे-बुरे सब जीवों में प्रभू की ज्योति समाई हुई है।परमात्मा हरेक शरीर में है।सब जीवों में है। 1। हे संत जनो ! परमात्मा हरेक शरीर में मौजूद है। वह पूरी तरह सारे शरीरों में व्यापक है।वह सुंदर राम पानी में है।धरती में है। 1।रहाउ। हे भाई ! नानक (उस) गुणों के खजाने परमात्मा की सिफत सालाह के गीत गाता है।गुरू ने (नानक का) भुलेखा दूर कर दिया है (तभी तो नानक को यकीन है कि) परमात्मा सब जीवों में बसता है (फिर भी) सदा (माया के मोह से) निर्लिप है।सब जीवों में समा रहा है। 2। 1। 29।

जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥

सोरठि महला 5 ॥
जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥
चारि पदारथ नव निधि पावहि बहुरि न त्रिसना भुखी ॥1॥
जा को नामु लैत तू सुखी ॥
सासि सासि धिआवहु ठाकुर कउ मन तन जीअरे मुखी ॥1॥ रहाउ ॥
सांति पावहि होवहि मन सीतल अगनि न अंतरि धुखी ॥
गुर नानक कउ प्रभू दिखाइआ जलि थलि त्रिभवणि रुखी ॥2॥2॥30॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू के सिमरन से आप खुशियों भरा जीवन जी सकते हैं आपके जनम-मरण के सारे डर और दुख दूर हो सकते हैं। आप (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) चारों पदार्थ और दुनिया के नौ के नौ खजाने हासिल कर सकते हैं।(जिसके सिमरन से) आपको माया की प्यास भूख फिर नहीं व्यापेगी (उसका सिमरन हरेक सांस के साथ करता रह)। 1। हे जीव ! जिस परमात्मा का नाम सिमरने से आप सुखी हो सकते हैं। उस पालनहार प्रभू को अपने मन से तन से मुँह से हरेक सांस से सिमरा कर। 1।रहाउ। (हे भाई ! सिमरन की बरकति से) आप शांति हासिल कर लेगा।आप अंतरात्मे शीतलता से भर जाएगा।आपके अंदर तृष्णा की आग नहीं धधकेगी। हे भाई ! गुरू ने (मुझे) नानक को वह परमात्मा पानी में धरती में वृक्षों में सारे संसार में बसता दिखा दिया है। 2। 2। 30।

काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥

सोरठि महला 5 ॥
काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥
इह भीतर ते इन कउ डारहु आपन निकटि बुलावहु ॥1॥
अपुनी बिधि आपि जनावहु ॥
हरि जन मंगल गावहु ॥1॥ रहाउ ॥
बिसरु नाही कबहू हीए ते इह बिधि मन महि पावहु ॥
गुरु पूरा भेटिओ वडभागी जन नानक कतहि न धावहु ॥2॥3॥31॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे प्रभू ! काम-क्रोध-लोभ-झूठ-निंदा (आदि) इन (सारे विकारों) से आप मुझे स्वयं छुड़ा ले। मेरे इस मन में से इन (विकारों) को निकाल दे।मुझे अपने चरणों में जोड़े रख। 1। हे प्रभू ! अपनी भक्ति की विधि आप मुझे खुद सिखा। मुझे प्रेरणा दे कि कि मैं आपके संत जनों के साथ मिल के आपकी सिफत सालाह के गीत गाया करूँ। 1।रहाउ। हे प्रभू ! मेरे मन में आप ऐसी शिक्षा डाल दे कि मेरे हृदय में से आप कभी ना बिसरे। हे दास नानक ! आपको बड़े भाग्यों से पूरा गुरू मिल गया है।अब आप किसी और की तरफ ना दौड़ता फिर। 2। 3। 31।

जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥

सोरठि महला 5 ॥
जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥
तिसु प्रभ तिआगि अवर कत राचहु जो सभ महि रहिआ समाई ॥1॥
हरि हरि सिमरहु संत गोपाला ॥
साधसंगि मिलि नामु धिआवहु पूरन होवै घाला ॥1॥ रहाउ ॥
सारि समालै निति प्रतिपालै प्रेम सहित गलि लावै ॥
कहु नानक प्रभ तुमरे बिसरत जगत जीवनु कैसे पावै ॥2॥4॥32॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! जिस प्रभू के सिमरन की बरकति से हरेक पदार्थ मिल सकता है।(सिमरन की) की हुई मेहनत व्यर्थ नहीं जाती। जो प्रभू सारी सृष्टि में मौजूद है उसे छोड़ के किस तरफ मस्त हो रहे हैं। 1। हे संत जनो ! सृष्टि के पालनहार को सदा सिमरते रहो। साध-संगति में मिल के प्रभू का नाम सिमरा करो।(सिमरन की) मेहनत जरूर सफल हो जाती है। 1।रहाउ। हे भाई ! वह परमात्मा (सब जीवों की) सार ले के संभाल करता है।सदैव पालना करता है (सिमरन करने वालों को) प्रेम से अपने गले से लगा लेता है। हे नानक ! कह, हे प्रभू ! आपको विसार के जीव आपको कैसे मिल सकता है।और।आप ही सारे जीवों की जिंदगी का सहारा हैं। 2। 4। 32।

अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥

अगले अंग पर आगे पढ़िए →

सोरठि महला 5 ॥
अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥
गुण निधान भगतन कउ बरतनि बिरला पावै कोई ॥1॥
मेरे मन जपि गुर गोपाल प्रभु सोई ॥
जा की सरणि पइआं सुखु पाईऐ बाहुड़ि दूखु न होई ॥1॥ रहाउ ॥
वडभागी साधसंगु परापति तिन भेटत दुरमति खोई ॥

हिन्दी अर्थ: सोरठि महला 5 ॥ हे भाई ! उस परमात्मा का सिमरन करने से (मन से विकारों की) सारी मैल उतर जाती है जो नाश-रहित है।और।जो सारे जीवों को दातें देने वाला है। वह प्रभू सारे गुणों का खजाना है।भक्तों के वास्ते हर वक्त का सहारा है।पर।कोई विरला मनुष्य ही उसका मिलाप हासिल करता है। 1। हे मेरे मन ! उस प्रभू को जपा करो जो सबसे बड़ा है।जो सृष्टि को पालने वाला है।और। जिसका आसरा लेने से सुख प्राप्त कर लिया जाता है।फिर कभी दुख नहीं व्याप्ता। 1।रहाउ। हे भाई ! बड़ी किस्मत से भले मनुष्यों की संगति हासिल होती है।उनको मिलने से खोटी बुद्धि नाश हो जाती है।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ६१७ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

English