ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सगल बनसपति महि बैसंतरु सगल दूध महि घीआ ॥
ऊच नीच महि जोति समाणी घटि घटि माधउ जीआ ॥1॥
संतहु घटि घटि रहिआ समाहिओ ॥
पूरन पूरि रहिओ सरब महि जलि थलि रमईआ आहिओ ॥1॥ रहाउ ॥
गुण निधान नानकु जसु गावै सतिगुरि भरमु चुकाइओ ॥
सरब निवासी सदा अलेपा सभ महि रहिआ समाइओ ॥2॥1॥29॥
जा कै सिमरणि होइ अनंदा बिनसै जनम मरण भै दुखी ॥
चारि पदारथ नव निधि पावहि बहुरि न त्रिसना भुखी ॥1॥
जा को नामु लैत तू सुखी ॥
सासि सासि धिआवहु ठाकुर कउ मन तन जीअरे मुखी ॥1॥ रहाउ ॥
सांति पावहि होवहि मन सीतल अगनि न अंतरि धुखी ॥
गुर नानक कउ प्रभू दिखाइआ जलि थलि त्रिभवणि रुखी ॥2॥2॥30॥
काम क्रोध लोभ झूठ निंदा इन ते आपि छडावहु ॥
इह भीतर ते इन कउ डारहु आपन निकटि बुलावहु ॥1॥
अपुनी बिधि आपि जनावहु ॥
हरि जन मंगल गावहु ॥1॥ रहाउ ॥
बिसरु नाही कबहू हीए ते इह बिधि मन महि पावहु ॥
गुरु पूरा भेटिओ वडभागी जन नानक कतहि न धावहु ॥2॥3॥31॥
जा कै सिमरणि सभु कछु पाईऐ बिरथी घाल न जाई ॥
तिसु प्रभ तिआगि अवर कत राचहु जो सभ महि रहिआ समाई ॥1॥
हरि हरि सिमरहु संत गोपाला ॥
साधसंगि मिलि नामु धिआवहु पूरन होवै घाला ॥1॥ रहाउ ॥
सारि समालै निति प्रतिपालै प्रेम सहित गलि लावै ॥
कहु नानक प्रभ तुमरे बिसरत जगत जीवनु कैसे पावै ॥2॥4॥32॥
अबिनासी जीअन को दाता सिमरत सभ मलु खोई ॥
गुण निधान भगतन कउ बरतनि बिरला पावै कोई ॥1॥
मेरे मन जपि गुर गोपाल प्रभु सोई ॥
जा की सरणि पइआं सुखु पाईऐ बाहुड़ि दूखु न होई ॥1॥ रहाउ ॥
वडभागी साधसंगु परापति तिन भेटत दुरमति खोई ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सोरठि महला 5 घरु 2 दुपदे ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।