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वडहंस
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· छंत · राग वडहंस
कहु नानक तिसु जन बलिहारी तेरा दानु सभनी है लीता ॥2॥
कहु नानक तिसु जन बलिहारी तेरा दानु सभनी है लीता ॥2॥
तउ भाणा तां त्रिपति अघाए राम ॥
मनु थीआ ठंढा सभ त्रिसन बुझाए राम ॥
मनु थीआ ठंढा चूकी डंझा पाइआ बहुतु खजाना ॥
सिख सेवक सभि भुंचण लगे हंउ सतगुर कै कुरबाना ॥
निरभउ भए खसम रंगि राते जम की त्रास बुझाए ॥
नानक दासु सदा संगि सेवकु तेरी भगति करंउ लिव लाए ॥3॥
पूरी आसा जी मनसा मेरे राम ॥
मोहि निरगुण जीउ सभि गुण तेरे राम ॥
सभि गुण तेरे ठाकुर मेरे कितु मुखि तुधु सालाही ॥
गुणु अवगुणु मेरा किछु न बीचारिआ बखसि लीआ खिन माही ॥
नउ निधि पाई वजी वाधाई वाजे अनहद तूरे ॥
कहु नानक मै वरु घरि पाइआ मेरे लाथे जी सगल विसूरे ॥4॥1॥
तउ भाणा तां त्रिपति अघाए राम ॥
मनु थीआ ठंढा सभ त्रिसन बुझाए राम ॥
मनु थीआ ठंढा चूकी डंझा पाइआ बहुतु खजाना ॥
सिख सेवक सभि भुंचण लगे हंउ सतगुर कै कुरबाना ॥
निरभउ भए खसम रंगि राते जम की त्रास बुझाए ॥
नानक दासु सदा संगि सेवकु तेरी भगति करंउ लिव लाए ॥3॥
पूरी आसा जी मनसा मेरे राम ॥
मोहि निरगुण जीउ सभि गुण तेरे राम ॥
सभि गुण तेरे ठाकुर मेरे कितु मुखि तुधु सालाही ॥
गुणु अवगुणु मेरा किछु न बीचारिआ बखसि लीआ खिन माही ॥
नउ निधि पाई वजी वाधाई वाजे अनहद तूरे ॥
कहु नानक मै वरु घरि पाइआ मेरे लाथे जी सगल विसूरे ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कहें, (हे प्रभू !) मैं उस सेवक से सदके जाता हूँ। आपके नाम की दाति उससे सब जीव लेते हैं। 2। हे प्रभू ! मैं गुरू से सदके जाता हॅूँ। अगर आपकी मर्जी हो तो (गुरू की शरण पड़ कर जीव माया की भूख से) पूरी तरह से तृप्त हो जाता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। उस का) मन शांत हो जाता है। कभी ना खत्म होने वाली माया की प्यास (उसके अंदर से) बुझ जाती है (गुरू के माध्यम से वह) (बड़ा नाम-) खजाना प्राप्त कर लेता है। (जो भी गुरू की शरण आते हैं। वह) सारे सिख सेवक नाम-खजाने बरतने लग पड़ते हैं। (गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य दुनिया के सहमों की ओर से) निडर हो जाते हैं। प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं। जमों का सहम मिटा लेते हैं। हे नानक ! (कहें, हे प्रभू ! मेहर करें। मैं) दास सदा (गुरू के) चरणों में टिका रहूँ। (गुरू का) सेवक बना रहूँ। और सुरति जोड़ के आपकी भक्ति करता रहूँ। 3। हे प्रभू जी ! (आपकी मेहर से मेरी हरेक) आशा और कामना पूरी हो गई है। हे प्रभू जी ! मैं गुणहीन था (मेरे अंदर कोई भी गुण नहीं था) आपके अंदर सारे ही गुण हैं। हे मेरे मालिक ! आपके अंदर सारे ही गुण हैं। मैं किस मुंह से आपकी महिमा गाऊँ। आपने मेरा कोई अवगुण नहीं विचारा। आपने मेरा कोई गुण नहीं देखा। और, एक पल में ही आपने मुझ पर मेहर कर दी। (आपकी मेहर से मैंने। मानो) सारे ही नौ खजाने हासिल कर लिए हैं। मेरे अंदर आत्मिक आनंद की चढ़दीकला बन गई है मेरे अंदर आत्मिक आनंद के एक-रस बाजे बजने लगे हैं। हे नानक ! (कहें) हे प्रभू जी ! मैंने (आपको) पति को अपने हृदय-गृह में ही पा लिया है। मेरे सारे ही चिंता-फिक्र उतर गए हैं। 4। 1।
· सलोक · राग वडहंस
किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥
सलोकु ॥
किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥
नानक सुणीअर ते परवाणु जो सुणेदे सचु धणी ॥1॥
किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥
नानक सुणीअर ते परवाणु जो सुणेदे सचु धणी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भाई ! नाशवंत पदार्थों की बात क्या सुनता है। (ये पदार्थ तो) हवा के बुल-बुलों की तरह उड़ जाते हैं। हे नानक (सिर्फ) वह कान (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हैं जो सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू (की सिफत सालाह) को सुनते हैं। 1।
· छंत · राग वडहंस
छंतु ॥
छंतु ॥
तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥
से सहजि सुहेले जिन हरि हरि रसना भणिआ राम ॥
से सहजि सुहेले गुणह अमोले जगत उधारण आए ॥
भै बोहिथ सागर प्रभ चरणा केते पारि लघाए ॥
जिन कंउ क्रिपा करी मेरै ठाकुरि तिन का लेखा न गणिआ ॥
कहु नानक तिसु घोलि घुमाई जिनि प्रभु स्रवणी सुणिआ ॥1॥
तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥
से सहजि सुहेले जिन हरि हरि रसना भणिआ राम ॥
से सहजि सुहेले गुणह अमोले जगत उधारण आए ॥
भै बोहिथ सागर प्रभ चरणा केते पारि लघाए ॥
जिन कंउ क्रिपा करी मेरै ठाकुरि तिन का लेखा न गणिआ ॥
कहु नानक तिसु घोलि घुमाई जिनि प्रभु स्रवणी सुणिआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: छंत। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने अपने कानों से प्रभू (का नाम) सुना है। उनसे मैं सदके कुर्बान जाता हूँ। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपते हैं वे आत्मिक अडोलता में टिक के सुखी रहते हैं। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में रह के सुखी जीवन जीते हैं। वे अमूल्य गुणवान हो जाते हैं। वे तो जगत को संसार-समुंद्र से पार लंघाने के लिए आते हैं। हे भाई ! इस भयानक संसार-समुंद्र से पार लांघने के वास्ते परमात्मा के चरण जहाज हैं (खुद नाम जपने वाले मनुष्य) अनेकों को (प्रभू-चरनों में जोड़ के) पार लंघा देते हैं। मेरे मालिक प्रभू ने जिन पर मेहर (की निगाह) की। उनके कर्मों के हिसाब करने उसने छोड़ दिए। हे नानक ! कहें, मैं उस मनुष्य से सदके कुर्बान जाता हूँ जिसने अपने कानों से परमात्मा (की सिफत सालाह) को सुना है। 1।
· सलोक · राग वडहंस
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥
सलोकु ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥
नानक से अखड़ीआं बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥1॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥
नानक से अखड़ीआं बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ मैंने अपनी आँखों से जगत को देखा है। (अभी भी) मुझे (जगत को देखने की प्यास) बहुत है। ये प्यास बुझती नहीं। हे नानक ! जिन आँखों ने मेरे प्यारे प्रभू को देखा। वे आँखें और किस्म की हैं (उन आँखों को दुनियावी पदार्थ देखने की लालसा नहीं होती)। 1।
· छंत · राग वडहंस
छंतु ॥
छंतु ॥
जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥
से साची दरगह भाणे राम ॥
ठाकुरि माने से परधाने हरि सेती रंगि राते ॥
हरि रसहि अघाए सहजि समाए घटि घटि रमईआ जाते ॥
सेई सजण संत से सुखीए ठाकुर अपणे भाणे ॥
कहु नानक जिन हरि प्रभु डिठा तिन कै सद कुरबाणे ॥2॥
जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥
से साची दरगह भाणे राम ॥
ठाकुरि माने से परधाने हरि सेती रंगि राते ॥
हरि रसहि अघाए सहजि समाए घटि घटि रमईआ जाते ॥
सेई सजण संत से सुखीए ठाकुर अपणे भाणे ॥
कहु नानक जिन हरि प्रभु डिठा तिन कै सद कुरबाणे ॥2॥
हिन्दी अर्थ: छंतु। मैं उनसे सदके हूँ। जिन्होंने परमात्मा के दर्शन किए हैं। वे (भाग्यशाली) लोग सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में शोभा देते हैं। जिन जीवों को मालिक प्रभू ने आदर-मान दिया है। (हर जगह) जाने माने जाते हैं। वे परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं। परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे मनुष्य परमात्मा के नाम-रस से (दुनियावी पदार्थों की तरफ से) तृप्त रहते हैं वे आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं। वे मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचानते हैं। हे भाई ! वही मनुष्य भले हैं। संत हैं। सुखी हैं। जो अपने मालिक प्रभू को पसंद हैं। हे नानक ! कहें, जिन मनुष्यों ने हरी प्रभू के दर्शन कर लिए हैं। मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ। 2।
· सलोक · राग वडहंस
देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥
सलोकु ॥
देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥
नानक सफल जनंमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥1॥
देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥
नानक सफल जनंमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥1॥
हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे भाई ! जो शरीर परमात्मा के नाम से वंचित रहता है। वह माया के मोह के अंधेरे में अंधा हुआ रहता है। हे नानक ! उस मनुष्य का जीवन कामयाब है जिसके दिल में सदा कायम रहने वाला मालिक-प्रभू आ बसता है। 1।
· छंत · राग वडहंस
छंतु ॥
छंतु ॥
तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥
जन चाखि अघाणे हरि हरि अंम्रितु मीठा राम ॥
हरि मनहि मीठा प्रभू तूठा अमिउ वूठा सुख भए ॥
दुख नास भरम बिनास तन ते जपि जगदीस ईसह जै जए ॥
मोह रहत बिकार थाके पंच ते संगु तूटा ॥
तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥
जन चाखि अघाणे हरि हरि अंम्रितु मीठा राम ॥
हरि मनहि मीठा प्रभू तूठा अमिउ वूठा सुख भए ॥
दुख नास भरम बिनास तन ते जपि जगदीस ईसह जै जए ॥
मोह रहत बिकार थाके पंच ते संगु तूटा ॥
हिन्दी अर्थ: छंतु। मैं उन मनुष्यों पर से सदा सदके कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने मेरे हरी-प्रभू के दर्शन कर लिए हैं। वे मनुष्य (परमात्मा का नाम-रस) चख के (दुनियावी पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाते हैं। उनको आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-जल मीठा लगता है। परमात्मा उनके मन को भाता है। परमात्मा उन पर प्रसन्न हो जाता है। उनके अंदर आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आ बसता है। उनको सारे आनंद प्राप्त हो जाते हैं। जगत के मालिक प्रभू की जै-जैकार कह कह के उनके शरीर से दुख व भ्रम दूर हो जाते हैं। वे मनुष्य मोह से रहित हो जाते हैं। उनके अंदर से विकार समाप्त हो जाते हैं। कामादिक पाँचों से उनका साथ टूट जाता है।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 577 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।