Lulla Family

अंग 577

अंग
577
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
कहु नानक तिसु जन बलिहारी तेरा दानु सभनी है लीता ॥2॥
तउ भाणा तां त्रिपति अघाए राम ॥
मनु थीआ ठंढा सभ त्रिसन बुझाए राम ॥
मनु थीआ ठंढा चूकी डंझा पाइआ बहुतु खजाना ॥
सिख सेवक सभि भुंचण लगे हंउ सतगुर कै कुरबाना ॥
निरभउ भए खसम रंगि राते जम की त्रास बुझाए ॥
नानक दासु सदा संगि सेवकु तेरी भगति करंउ लिव लाए ॥3॥
पूरी आसा जी मनसा मेरे राम ॥
मोहि निरगुण जीउ सभि गुण तेरे राम ॥
सभि गुण तेरे ठाकुर मेरे कितु मुखि तुधु सालाही ॥
गुणु अवगुणु मेरा किछु न बीचारिआ बखसि लीआ खिन माही ॥
नउ निधि पाई वजी वाधाई वाजे अनहद तूरे ॥
कहु नानक मै वरु घरि पाइआ मेरे लाथे जी सगल विसूरे ॥4॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! कह, (हे प्रभू !) मैं उस सेवक से सदके जाता हूँ।आपके नाम की दाति उससे सब जीव लेते हैं। 2। हे प्रभू ! मैं गुरू से सदके जाता हॅूँ।अगर आपकी मर्जी हैं तो (गुरू की शरण पड़ कर जीव माया की भूख से) पूरी तरह से तृप्त हैं जाता है। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है।उस का) मन शांत हो जाता है।कभी ना खत्म होने वाली माया की प्यास (उसके अंदर से) बुझ जाती है (गुरू के माध्यम से वह) (बड़ा नाम-) खजाना प्राप्त कर लेता है। (जो भी गुरू की शरण आते हैं।वह) सारे सिख सेवक नाम-खजाने बरतने लग पड़ते हैं। (गुरू की शरण पड़ने वाले मनुष्य दुनिया के सहमों की ओर से) निडर हो जाते हैं।प्रभू पति के प्रेम रंग में रंगे जाते हैं।जमों का सहम मिटा लेते हैं। हे नानक ! (कह, हे प्रभू ! मेहर कर।मैं) दास सदा (गुरू के) चरणों में टिका रहूँ।(गुरू का) सेवक बना रहूँ।और सुरति जोड़ के आपकी भक्ति करता रहूँ। 3। हे प्रभू जी ! (आपकी मेहर से मेरी हरेक) आशा और कामना पूरी हैं गई है। हे प्रभू जी ! मैं गुणहीन था (मेरे अंदर कोई भी गुण नहीं था) आपके अंदर सारे ही गुण हैं। हे मेरे मालिक ! आपके अंदर सारे ही गुण हैं।मैं किस मुंह से आपकी महिमा गाऊँ। तूने मेरा कोई अवगुण नहीं विचारा।तूने मेरा कोई गुण नहीं देखा।और।एक पल में ही तूने मुझ पर मेहर कर दी। (आपकी मेहर से मैंने।मानो) सारे ही नौ खजाने हासिल कर लिए हैं।मेरे अंदर आत्मिक आनंद की चढ़दीकला बन गई है मेरे अंदर आत्मिक आनंद के एक-रस बाजे बजने लगे हैं। हे नानक ! (कह) हे प्रभू जी ! मैंने (आपको) पति को अपने हृदय-गृह में ही पा लिया है।मेरे सारे ही चिंता-फिक्र उतर गए हैं। 4। 1।
सलोकु ॥
किआ सुणेदो कूड़ु वंञनि पवण झुलारिआ ॥
नानक सुणीअर ते परवाणु जो सुणेदे सचु धणी ॥1॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भाई ! नाशवंत पदार्थों की बात क्या सुनता है।(ये पदार्थ तो) हवा के बुल-बुलों की तरह उड़ जाते हैं। हे नानक (सिर्फ) वह कान (परमात्मा की हजूरी में) कबूल हैं जो सदा स्थिर रहने वाले मालिक प्रभू (की सिफत सालाह) को सुनते हैं। 1।
छंतु ॥
तिन घोलि घुमाई जिन प्रभु स्रवणी सुणिआ राम ॥
से सहजि सुहेले जिन हरि हरि रसना भणिआ राम ॥
से सहजि सुहेले गुणह अमोले जगत उधारण आए ॥
भै बोहिथ सागर प्रभ चरणा केते पारि लघाए ॥
जिन कंउ क्रिपा करी मेरै ठाकुरि तिन का लेखा न गणिआ ॥
कहु नानक तिसु घोलि घुमाई जिनि प्रभु स्रवणी सुणिआ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: छंत। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने अपने कानों से प्रभू (का नाम) सुना है।उनसे मैं सदके कुर्बान जाता हूँ। जो मनुष्य अपनी जीभ से परमात्मा का नाम जपते हैं वे आत्मिक अडोलता में टिक के सुखी रहते हैं। वे मनुष्य आत्मिक अडोलता में रह के सुखी जीवन जीते हैं।वे अमूल्य गुणवान हो जाते हैं।वे तो जगत को संसार-समुंद्र से पार लंघाने के लिए आते हैं। हे भाई ! इस भयानक संसार-समुंद्र से पार लांघने के वास्ते परमात्मा के चरण जहाज हैं (खुद नाम जपने वाले मनुष्य) अनेकों को (प्रभू-चरनों में जोड़ के) पार लंघा देते हैं। मेरे मालिक प्रभू ने जिन पर मेहर (की निगाह) की।उनके कर्मों के हिसाब करने उसने छोड़ दिए। हे नानक ! कह, मैं उस मनुष्य से सदके कुर्बान जाता हूँ जिसने अपने कानों से परमात्मा (की सिफत सालाह) को सुना है। 1।
सलोकु ॥
लोइण लोई डिठ पिआस न बुझै मू घणी ॥
नानक से अखड़ीआं बिअंनि जिनी डिसंदो मा पिरी ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ मैंने अपनी आँखों से जगत को देखा है।(अभी भी) मुझे (जगत को देखने की प्यास) बहुत है।ये प्यास बुझती नहीं। हे नानक ! जिन आँखों ने मेरे प्यारे प्रभू को देखा।वे आँखें और किस्म की हैं (उन आँखों को दुनियावी पदार्थ देखने की लालसा नहीं होती)। 1।
छंतु ॥
जिनी हरि प्रभु डिठा तिन कुरबाणे राम ॥
से साची दरगह भाणे राम ॥
ठाकुरि माने से परधाने हरि सेती रंगि राते ॥
हरि रसहि अघाए सहजि समाए घटि घटि रमईआ जाते ॥
सेई सजण संत से सुखीए ठाकुर अपणे भाणे ॥
कहु नानक जिन हरि प्रभु डिठा तिन कै सद कुरबाणे ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। मैं उनसे सदके हूँ।जिन्होंने परमात्मा के दर्शन किए हैं। वे (भाग्यशाली) लोग सदा-स्थिर प्रभू की हजूरी में शोभा देते हैं। जिन जीवों को मालिक प्रभू ने आदर-मान दिया है।(हर जगह) जाने माने जाते हैं।वे परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं।परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगे रहते हैं। वे मनुष्य परमात्मा के नाम-रस से (दुनियावी पदार्थों की तरफ से) तृप्त रहते हैं वे आत्मिक अडोलता में लीन रहते हैं।वे मनुष्य परमात्मा को हरेक शरीर में बसता पहचानते हैं। हे भाई ! वही मनुष्य भले हैं।संत हैं।सुखी हैं।जो अपने मालिक प्रभू को पसंद हैं। हे नानक ! कह, जिन मनुष्यों ने हरी प्रभू के दर्शन कर लिए हैं।मैं उनसे सदा सदके जाता हूँ। 2।
सलोकु ॥
देह अंधारी अंध सुंञी नाम विहूणीआ ॥
नानक सफल जनंमु जै घटि वुठा सचु धणी ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ हे भाई ! जो शरीर परमात्मा के नाम से वंचित रहता है।वह माया के मोह के अंधेरे में अंधा हुआ रहता है। हे नानक ! उस मनुष्य का जीवन कामयाब है जिसके दिल में सदा कायम रहने वाला मालिक-प्रभू आ बसता है। 1।
छंतु ॥
तिन खंनीऐ वंञां जिन मेरा हरि प्रभु डीठा राम ॥
जन चाखि अघाणे हरि हरि अंम्रितु मीठा राम ॥
हरि मनहि मीठा प्रभू तूठा अमिउ वूठा सुख भए ॥
दुख नास भरम बिनास तन ते जपि जगदीस ईसह जै जए ॥
मोह रहत बिकार थाके पंच ते संगु तूटा ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: छंतु। मैं उन मनुष्यों पर से सदा सदके कुर्बान जाता हूँ जिन्होंने मेरे हरी-प्रभू के दर्शन कर लिए हैं। वे मनुष्य (परमात्मा का नाम-रस) चख के (दुनियावी पदार्थों की ओर से) तृप्त हो जाते हैं।उनको आत्मिक जीवन देने वाला परमात्मा का नाम-जल मीठा लगता है। परमात्मा उनके मन को भाता है।परमात्मा उन पर प्रसन्न हो जाता है।उनके अंदर आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल आ बसता है।उनको सारे आनंद प्राप्त हो जाते हैं। जगत के मालिक प्रभू की जै-जैकार कह कह के उनके शरीर से दुख व भ्रम दूर हो जाते हैं। वे मनुष्य मोह से रहित हो जाते हैं।उनके अंदर से विकार समाप्त हो जाते हैं।कामादिक पाँचों से उनका साथ टूट जाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! कह, (हे प्रभू !) मैं उस सेवक से सदके जाता हूँ।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।