Lulla Family

अंग 570

अंग
570
राग Vadhans
राग: Vadhans · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुण महि गुणी समाए जिसु आपि बुझाए लाहा भगति सैसारे ॥
बिनु भगती सुखु न होई दूजै पति खोई गुरमति नामु अधारे ॥
वखरु नामु सदा लाभु है जिस नो एतु वापारि लाए ॥
रतन पदारथ वणजीअहि जां सतिगुरु देइ बुझाए ॥1॥
माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा राम ॥
कूड़ु बोलि बिखु खावणी बहु वधहि विकारा राम ॥
बहु वधहि विकारा सहसा इहु संसारा बिनु नावै पति खोई ॥
पड़ि पड़ि पंडित वादु वखाणहि बिनु बूझे सुखु न होई ॥
आवण जाणा कदे न चूकै माइआ मोह पिआरा ॥
माइआ मोहु सभु दुखु है खोटा इहु वापारा ॥2॥
खोटे खरे सभि परखीअनि तितु सचे कै दरबारा राम ॥
खोटे दरगह सुटीअनि ऊभे करनि पुकारा राम ॥
ऊभे करनि पुकारा मुगध गवारा मनमुखि जनमु गवाइआ ॥
बिखिआ माइआ जिनि जगतु भुलाइआ साचा नामु न भाइआ ॥
मनमुख संता नालि वैरु करि दुखु खटे संसारा ॥
खोटे खरे परखीअनि तितु सचै दरवारा राम ॥3॥
आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई राम ॥
जितु भावै तितु लाइसी जिउ तिस दी वडिआई राम ॥
जिउ तिस दी वडिआई आपि कराई वरीआमु न फुसी कोई ॥
जगजीवनु दाता करमि बिधाता आपे बखसे सोई ॥
गुर परसादी आपु गवाईऐ नानक नामि पति पाई ॥
आपि करे किसु आखीऐ होरु करणा किछू न जाई ॥4॥4॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद (आत्मिक जीवन की) समझ देता है वह मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह में टिक के गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है।वह जगत में (जन्म ले के) प्रभू की भक्ति का लाभ कमाता है। गुरू की मति पर चल के वह हरी-नाम को (अपनी जिंदगी का) आसरा बनाए रखता है (उसे निश्चय रहता है कि) भक्ति के बिना आत्मिक आनंद नहीं मिल सकता।माया के मोह में फसने वाले ने (लोक-परलोक में अपनी) इज्जत गवा ली। हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा इस (नाम-) व्यापार में लगा देता है वह सदा नाम का व्यापार करता है।नाम का ही लाभ कमाता है। भाई ! जब गुरू (आत्मिक जीवन की) समझ बख्शता है तो (मनुष्य के हृदय-शहर में) प्रभू की सिफत सालाह के कीमती रत्नों का व्यापार होने लगता है। 1। हे भाई ! माया का मोह निरा दुख ही (पैदा करता) है (निरी माया की खातिर दौड़-भाग) आत्मिक जीवन में घाटा डालने वाला व्यापार है। (इस तरह) झूठ बोल बोल के (आत्मिक मौत लाने वाले मोह का) जहर खाया जाता है।(जिसके कारण मनुष्य के अंदर) अनेकों विकार बढ़ते जाते हैं। अनेकों विकार बढ़ते जाते हैं।ये जगत भी (निरा) सहम (का घर ही प्रतीत होता) है।परमात्मा के नाम से टूट के मनुष्य (लोक-परलोक में) इज्जत गवा लेता है। पण्डित ग्रंथ पढ़-पढ़कर वाद-विवाद करते हैं परन्तु ज्ञान के बिना उन्हें भी सुख प्राप्त नहीं होता। जिस मनुष्य को सदा माया का मोह प्यारा लगता है उसके जनम-मरण का चक्र कभी समाप्त नहीं होता। हे भाई ! माया का मोह निरा दुख ही (पैदा करता) है।(निरी माया की खातिर दौड़-भाग) आत्मिक जीवन में घाटा डालने वाला व्यापार है। 2। हे भाई ! बुरे और अच्छे सारे (जीव) उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा के दरबार में परखे जाते हैं। बुरे लोग तो दरबार में रद्द कर दिए जाते हैं।वे वहां खड़े हो के पुकार करते हैं। जिन मनुष्यों ने अपने मन के पीछे चल के अपना मानस जन्म गवा लिया।वह मूर्ख गवार (प्रभू की दरगाह में परे फेंके जाने पर) खड़े पुकार करते हैं (तरले मिन्नतें करते हैं)। (आत्मिक जीवन को खत्म करने वाली) जिस जहर-माया ने जगत को गलत रास्ते पर डाल रखा है (उस में फंस के उनको) सदा कायम रहने वाला हरी-नाम अच्छा नहीं था लगा। (संत-जन ऐसे मनुष्यों को उपदेश तो करते हैं।पर) अपने मन के पीछे चलने वाला जगत सेंत-जनों के साथ वैर करके दुख सहेड़ता रहता है। हे भाई ! बुरे और अच्छे (सारे जीव) उस सदा कायम रहने वाले के दरबार में परखे जाते हैं। 3। (हे भाई ! जीवों को ‘खोटे-खरे’ परमात्मा) खुद ही बनाता है।(किसी जीव के खोटे अथवा खरे होने का गिला) किसी के पास नहीं किया जा सकता।(प्रभू की रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता। जिस काम में (जीवों को लगाने की प्रभू की) मर्जी होती है उस काम में लगा देता है।जैसे उसकी रजा होती है (वैसे करवाता है)। जैसे उस प्रभू की रजा होती है वैसे ही (जीवों से काम) करवाता है (अपने आप में) ना कोई जीव शूरवीर है ना ही कोई कमजोर है। जगत का सहारा दातार जो जीवों के किए कर्मों के अनुसार जीवों को पैदा करने वाला है वह स्वयं ही कृपा करता है (और जीवों को सही जीवन राह बताता है)। हे नानक ! (कह, हे भाई !) गुरू की कृपा से ही स्वै भाव दूर किया जा सकता है (जिसने स्वै भाव दूर कर लिया।उसने) परमात्मा के नाम में जुड़ के (लोक-परलोक में) सम्मान पा लिया है। (हे भाई ! जीवों को खोटे-खरे परमात्मा) खुद ही बनाता है (किसी जीव के खोटे या खरे होने का गिला) किसी के पास नहीं किया जा सकता।(प्रभू की रजा के उलट) और कुछ भी नहीं किया जा सकता। 4। 4।
वडहंसु महला 3 ॥
सचा सउदा हरि नामु है सचा वापारा राम ॥
गुरमती हरि नामु वणजीऐ अति मोलु अफारा राम ॥
अति मोलु अफारा सच वापारा सचि वापारि लगे वडभागी ॥
अंतरि बाहरि भगती राते सचि नामि लिव लागी ॥
नदरि करे सोई सचु पाए गुर कै सबदि वीचारा ॥
नानक नामि रते तिन ही सुखु पाइआ साचै के वापारा ॥1॥
हंउमै माइआ मैलु है माइआ मैलु भरीजै राम ॥
गुरमती मनु निरमला रसना हरि रसु पीजै राम ॥
रसना हरि रसु पीजै अंतरु भीजै साच सबदि बीचारी ॥
अंतरि खूहटा अंम्रिति भरिआ सबदे काढि पीऐ पनिहारी ॥
जिसु नदरि करे सोई सचि लागै रसना रामु रवीजै ॥
नानक नामि रते से निरमल होर हउमै मैलु भरीजै ॥2॥
पंडित जोतकी सभि पड़ि पड़ि कूकदे किसु पहि करहि पुकारा राम ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ हे भाई ! परमात्मा का नाम ही सदा साथ निभने वाला सौदा है व्यापार है। ये हरी नाम गुरू की मति पे चल कर कमाया जा सकता है। इसका मूल्य बहुत ही ज्यादा है (दुनिया का कोई भी पदार्थ इसकी बराबरी नहीं कर सकता)। सदा स्थिर प्रभू के नाम का व्यापार बहुत अनमोल है।जो मनुष्य इस व्यापार में लगते हैं वे भाग्यशाली हो जाते हैं। वे मनुष्य अंतरात्मे भक्ति रंग में रंगे रहते हैं।दुनिया के कार्य-व्यवहार करते हुए भी वे भक्ति रंग में रंगे रहते हैं।सदा-स्थिर हरी-नाम में उनकी लगन लगी रहती है। पर। हे भाई ! वही मनुष्य गुरू के शबद द्वारा विचार करके सदा-स्थिर हरी-नाम सौदा हासिल करता है जिस पर परमात्मा मेहर की नजर करता है। हे नानक ! (कह) जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं उन्होंने ही सदा-स्थिर प्रभू के नाम व्यापार में आत्मिक आनंद प्राप्त किया है। 1। हे भाई ! अहंकार और माया (की ममता मनुष्य के आत्मिक जीवन को मैला करने वाली) मैल है।मनुष्य का मन माया (की ममता) की मैल से लिबड़ा रहता है। गुरू की मति पर चलने से मन पवित्र हो जाता है (इस वास्ते।हे भाई ! गुरू की मति पर चल के) जीभ से परमात्मा का नाम-जल पीते रहना चाहिए। जीभ हरी-नाम-जल पीते रहना चाहिए।(इस नाम जल से) हृदय तरो-तर हो जाता है।और सदा-स्थिर प्रभू की सिफत सालाह के शबद से विचारवान हो जाता है। हे भाई ! आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल से भरा हुआ चश्मा (कुई) मनुष्य के अंदर ही है।जिस मनुष्य की सुरति गुरू के शबद के द्वारा ये नाम-जल भरना जानती है वह मनुष्य (अंदर के चश्मे में से नाम-जल) निकाल के पीता रहता है।(पर। हे भाई !) वही मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में लगता है जिस पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है।(हे भाई !) जीभ से परमात्मा का नाम सिमरते रहना चाहिए। हे नानक ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगे जाते हैं।वे पवित्र हो जाते हैं।बाकी की दुनिया अहंकार की मैल से लिबड़ी रहती है। 2। पंडित और ज्योतिषी।ये सारे (ज्योतिषि आदि की पुस्तकें) पढ़-पढ़ के ऊँचा ऊँचा औरों को उपदेश करते रहते हैं।पर ये ऊँची आवाज में किसको सुनाते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिस मनुष्य को परमात्मा खुद (आत्मिक जीवन की) समझ देता है वह मनुष्य प्रभू की सिफत सालाह में टिक के गुणों के मालिक प्रभू में लीन हो जाता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।