लुल्ला परिवारLulla Family
English
सिख वाणीनाम, सेवा और एकत्व

अंग 558 · वडहंस

इस पृष्ठ पर
अंग
558
वडहंस
अंग बदलें या अंश चुनें · 3 अंश

1 से 1430 तक कोई अंक लिखिए।

  1. ना मनीआरु न चूड़ीआ ना से वंगुड़ीआहा ॥
  2. मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥
  3. नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥

ना मनीआरु न चूड़ीआ ना से वंगुड़ीआहा ॥

अंग 557 से चला आ रहा अंश

ना मनीआरु न चूड़ीआ ना से वंगुड़ीआहा ॥
जो सह कंठि न लगीआ जलनु सि बाहड़ीआहा ॥
सभि सहीआ सहु रावणि गईआ हउ दाधी कै दरि जावा ॥
अंमाली हउ खरी सुचजी तै सह एकि न भावा ॥
माठि गुंदाइंी पटीआ भरीऐ माग संधूरे ॥
अगै गई न मंनीआ मरउ विसूरि विसूरे ॥
मै रोवंदी सभु जगु रुना रुंनड़े वणहु पंखेरू ॥
इकु न रुना मेरे तन का बिरहा जिनि हउ पिरहु विछोड़ी ॥
सुपनै आइआ भी गइआ मै जलु भरिआ रोइ ॥
आइ न सका तुझ कनि पिआरे भेजि न सका कोइ ॥
आउ सभागी नीदड़ीए मतु सहु देखा सोइ ॥
तै साहिब की बात जि आखै कहु नानक किआ दीजै ॥
सीसु वढे करि बैसणु दीजै विणु सिर सेव करीजै ॥
किउ न मरीजै जीअड़ा न दीजै जा सहु भइआ विडाणा ॥1॥3॥

हिन्दी अर्थ: पलंघ की बाहियां ही तोड़ डालें और अपनी सजाई हुई बाँहें ही तोड़ डालें क्योंकि ना उन बाँहों को सजाने वाला मनियार ही आपका कुछ सवार सका। ना ही उसकी दी हुई चूड़ियाँ और कंगन किसी काम आए। जल जाएं वे (सजी हुई) बाँहें जो पति के गले से ना लग सकीं। (भाव। अगर जीव-स्त्री सारी उम्र धार्मिक भेष करने में ही गुजार दे। इसको धर्मोपदेश देने वाला भी अगर बाहरी भेष की तरफ ही उसे प्रेरित करता रहे। तो ये सारे उद्यम व्यर्थ चले गए। क्योंकि। धार्मिक वेश-भूषा से ईश्वर को प्रसन्न नहीं किया जा सकता। उससे तो सिर्फ आत्मिक मिलाप ही हो सकता है)। (प्रभू-चरणों में जुड़ने वाली) सारी सहेलियाँ (तो) प्रभू पति को प्रसन्न करने के यतन कर रही हैं (पर। मैं जो निरे दिखावे के ही धर्म-वेष करती रही) मैं कर्म जली किसके दर पर जाऊँ। हे सखी ! मैं (इन धर्म-भेषों पर ही टेक रख के) अपनी ओर से तो बड़ी अच्छी करतूत वाली बनी बैठी हूँ। पर। (हे) प्रभू पति ! किसी एक भी गुण के कारण मैं आपको पसंद नहीं आ रही। मैं सवार-सवार के चोटियाँ गूँदती हूँ। मेरी पटियों के चीर में सिंदूर भी भरा जाता है। पर आपकी हजूरी में मैं फिर भी प्रवान नहीं हो रही। (इस वास्ते) झुर झुर के मर रही हूँ। (प्रभू-पति से विछुड़ के) मैं इतनी दुखी हो रही हूँ (कि) सारा जगत मेरे पर तरस कर रहा है। जंगल के पक्षी भी (मेरी दुखी हालत पर) तरस कर रहे हैं। सिर्फ ये मेरे अंदर का विछोड़ा ही है जो तरस नहीं करता (जो मेरी खलासी नहीं करता)।इसने मुझे प्रभू-पति से विछोड़ा हुआ है। (हे पति !) मुझे आप सपने में मिले (सपना खत्म हुआ। और आप) फिर चले गए। (विछोड़े के दुख में) मैं आँसू भर के रोई। हे प्यारे ! मैं (निमाणी) आपके पास पहुँच नहीं सकती। मैं (गरीब) किसी को आपके पास भेज नहीं सकती (जो मेरी हालत आपको बताए। नींद के आगे ही तरले करती हूँ-) हे सौभाग्यशाली सुंदर नींद ! आप (मेरे पास आएँ) शायद (आपके द्वारा ही) मैं अपने पति-प्रभू का दीदार कर सकूँ। हे नानक ! (प्रभू-दर पर) कहें, हे मेरे मालिक ! अगर कोई गुरमुखि मुझे आपकी कोई बात सुनाए तो मैं उसके आगे कौन सी भेटा रखूँ ! अपना सिर काट के मैं उसके बैठने के लिए आसन बना दूँ (भाव।) स्वै भाव दूर करके मैं उसकी सेवा करूँ। जब हमारा प्रभू-पति (हमारी मूर्खता के कारण) हमसे अलग हो जाए (तो उसे दुबारा अपना बनाने के लिए यही एक तरीका है कि) हम स्वैभाव मार दें। और अपनी जिंद उस पर सदके कर दें। 1। 3।

मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥

वडहंसु महला 3 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मनि मैलै सभु किछु मैला तनि धोतै मनु हछा न होइ ॥
इह जगतु भरमि भुलाइआ विरला बूझै कोइ ॥1॥
जपि मन मेरे तू एको नामु ॥
सतिगुरि दीआ मो कउ एहु निधानु ॥1॥ रहाउ ॥
सिधा के आसण जे सिखै इंद्री वसि करि कमाइ ॥
मन की मैलु न उतरै हउमै मैलु न जाइ ॥2॥
इसु मन कउ होरु संजमु को नाही विणु सतिगुर की सरणाइ ॥
सतगुरि मिलिऐ उलटी भई कहणा किछू न जाइ ॥3॥
भणति नानकु सतिगुर कउ मिलदो मरै गुर कै सबदि फिरि जीवै कोइ ॥
ममता की मलु उतरै इहु मनु हछा होइ ॥4॥1॥

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 घरु 1 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई ! अगर मनुष्य का मन (विकारों की) मैल से भरा रहे (तो उतने वक्त मनुष्य जो कुछ करता है) सब कुछ विकार ही करता है। शरीर को (तीर्थ आदि के) स्नान करवाने से मन पवित्र नहीं हो सकता। पर ये संसार (तीर्थ-स्नान आदि से मन की पवित्रता मिल जाने के) भुलेखे में पड़ के गलत राह पर चला जा रहा है। कोई दुर्लभ मनुष्य ही (इस सच्चाई को) समझता है। 1। हे मेरे मन ! आप (विकारों से बचने के लिए) सिर्फ परमात्मा का नाम जपा करें। यह (नाम-) खजाना गुरू ने बख्शा है। 1।रहाउ। अगर मनुष्य चमत्कारी योगियों वाले आसन सीख ले। अगर काम-वासना को जीत के (आसनों के अभ्यास की) कमाई करने लग जाए। तो भी मन की मैल नहीं उतरती। (मन में से) अहंकार की मैल नहीं जाती। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना और कोई यत्न इस मन को पवित्र नहीं कर सकता। अगर गुरू मिल जाए तो मन बिरती संसार से पलट जाती है (और मन की ऐसी ऊँची दशा बन जाती है जो) बयान नहीं की जा सकती। 3। नानक कहता है, जो मनुष्य गुरू को मिल के (विकारों से) अछूता हो जाता है। और। फिर गुरू के शबद में जुड़ के आत्मिक जीवन हासिल कर लेता है (उसके अंदर से माया की) ममता की मैल उतर जाती है। उसका ये मन पवित्र हो जाता है। 4। 1।

नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥

वडहंसु महला 3 ॥
नदरी सतगुरु सेवीऐ नदरी सेवा होइ ॥
नदरी इहु मनु वसि आवै नदरी मनु निरमलु होइ ॥1॥
मेरे मन चेति सचा सोइ ॥
एको चेतहि ता सुखु पावहि फिरि दूखु न मूले होइ ॥1॥ रहाउ ॥
नदरी मरि कै जीवीऐ नदरी सबदु वसै मनि आइ ॥
नदरी हुकमु बुझीऐ हुकमे रहै समाइ ॥2॥
जिनि जिहवा हरि रसु न चखिओ सा जिहवा जलि जाउ ॥
अन रस सादे लगि रही दुखु पाइआ दूजै भाइ ॥3॥
सभना नदरि एक है आपे फरकु करेइ ॥
नानक सतगुरि मिलिऐ फलु पाइआ नामु वडाई देइ ॥4॥2॥

हिन्दी अर्थ: वडहंसु महला 3 ॥ (हे भाई !) परमात्मा की मेहर की निगाह से ही गुरू की शरण पड़ सकते हैं। मेहर की नजर से ही परमात्मा की सेवा भक्ति हो सकती है। मेहर की निगाह से ही ये मन काबू में आता है। और पवित्र हो जाता है। 1। हे (मेरे) मन ! उस सदा कायम रहने वाले परमात्मा को याद किया करें। अगर आप उस एक परमात्मा को याद करते रहेंगे तो सुख हासिल करेंगे। और आपको कभी भी कोई दुख नहीं छू सकेगा। 1।रहाउ। (हे भाई !) परमात्मा की कृपा की नजर से ही विकारों से हट के आत्मिक जीवन हासिल किया जाता है। और गुरू का शबद मन में आ बसता है। मेहर की निगाह से ही परमात्मा की रजा को समझा जा सकता है। और रजा में सदा टिके रहा जाता है। 2। हे भाई ! जिस जीभ ने कभी परमात्मा के नाम का स्वाद नहीं चखा वह जीभ जलने योग्य ही है। (क्योंकि जिस मनुष्य की जीभ) अन्य रसों के स्वाद में लगी रहती है। वह मनुष्य माया के मोह में फंस के दुख (ही) पाता रहता है। 3। (हे भाई ! वैसे तो) सब जीवों पर एक परमात्मा की ही कृपा की नजर रहती है। (पर कोई अच्छा बन जाता है कोई विकारी हो जाता है। यह) फर्क (भी) परमात्मा खुद ही बनाता है (क्योंकि) हे नानक ! अगर गुरू मिल जाए (तो ही परमात्मा की मेहर की निगाह का) फल मिलता है (परमात्मा गुरू के द्वारा अपना) नाम बख्शता है (ये नाम-प्राप्ति ही सब से बड़ी) इज्जत (है)। 4। 2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 558 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।