राग: Bihaagraa · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
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करि मजनु हरि सरे सभि किलबिख नासु मना ॥ करि सदा मजनु गोबिंद सजनु दुख अंधेरा नासे ॥ जनम मरणु न होइ तिस कउ कटै जम के फासे ॥ मिलु साधसंगे नाम रंगे तहा पूरन आसो ॥ बिनवंति नानक धारि किरपा हरि चरण कमल निवासो ॥1॥ तह अनद बिनोद सदा अनहद झुणकारो राम ॥ मिलि गावहि संत जना प्रभ का जैकारो राम ॥ मिलि संत गावहि खसम भावहि हरि प्रेम रस रंगि भिंनीआ ॥ हरि लाभु पाइआ आपु मिटाइआ मिले चिरी विछुंनिआ ॥ गहि भुजा लीने दइआ कीन॑े प्रभ एक अगम अपारो ॥ बिनवंति नानक सदा निरमल सचु सबदु रुण झुणकारो ॥2॥ सुणि वडभागीआ हरि अंम्रित बाणी राम ॥ जिन कउ करमि लिखी तिसु रिदै समाणी राम ॥ अकथ कहाणी तिनी जाणी जिसु आपि प्रभु किरपा करे ॥ अमरु थीआ फिरि न मूआ कलि कलेसा दुख हरे ॥ हरि सरणि पाई तजि न जाई प्रभ प्रीति मनि तनि भाणी ॥ बिनवंति नानक सदा गाईऐ पवित्र अंम्रित बाणी ॥3॥ मन तन गलतु भए किछु कहणु न जाई राम ॥ जिस ते उपजिअड़ा तिनि लीआ समाई राम ॥ मिलि ब्रहम जोती ओति पोती उदकु उदकि समाइआ ॥ जलि थलि महीअलि एकु रविआ नह दूजा द्रिसटाइआ ॥ बणि त्रिणि त्रिभवणि पूरि पूरन कीमति कहणु न जाई ॥ बिनवंति नानक आपि जाणै जिनि एह बणत बणाई ॥4॥2॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: हे मन ! परमात्मा (की सिफत सालाह) के तालाब में स्नान किया कर।आपके सारे पापों का नाश हैं जाएगा। हे मन ! सदा (हरि-सर में) स्नान करता रहा कर।(जो मनुष्य ये स्नान करता है) मित्र प्रभू उसके सारे दुख नाश कर देता है उसके मोह का अंधकार दूर कर देता है। उस मनुष्य को जनम-मरण का चक्कर नहीं भुगतना पड़ता।मित्र-प्रभू उसकी जम की फांसियां (आत्मक मौत लाने वाली फाँसियां) काट देता है। हे मन ! साध-संगत में मिल।परमात्मा के नाम-रंग में जुड़ा कर।साध-संगत में ही आपकी हरेक आस पूरी होगी। नानक विनती करता है, हे हरी ! कृपा कर।आपके सुंदर कोमल चरणों में मेरा मन सदा टिका रहे। 1। साध-संगत में सदा आत्मिक आनंद और खुशियों की (मानो) एक अनहद झनकार चलती रहती है। साध-संगति में संत-जन मिल के परमात्मा के सिफत सालाह के गीत गाते रहते हैं। संत-जन सिफत सालाह के गीत गाते हैं।वे पति-प्रभू को प्यारे लगते हैं।उनकी सुरति परमात्मा के प्रेम-रस के रंग में भीगी रहती है। वे (इस मानस जनम में) परमात्मा के नाम की कमाई कमाते हैं।(अपने अंदर से) स्वै भाव (अहंकार) मिटा लेते हैं।चिरों से विछुड़े हुए (पुनः परमात्मा को) मिल जाते हैं। अपहुँच और बेअंत परमात्मा उन पर दया करता है।(उनकी) बाँह पकड़ के (उनको) अपने बना लेता है। नानक विनती करता है, वे संत जन सदा के लिए पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं।परमात्मा की सिफत सालाह की बाणी उनके अंदर मीठी-मीठी मध्यम सुरीली सुर चलाए रखती है। 2। हे भाग्यशाली ! आत्मिक जीवन देने वाली प्रभू की सिफत सालाह की बाणी सदा सुना कर। ये बाणी उस उस (भाग्यशाली) के हृदय में बसती है जिनके माथे पर परमात्मा की बख्शिश से इसकी प्राप्ति का लेख लिखा होता है। जिस जिस मनुष्य पर प्रभू स्वयं कृपा करता है वह लोग अकथनीय प्रभू की सिफत सालाह से सांझ पाते हैं। (जो मनुष्य परमात्मा की सिफत सालाह से सांझ डालता है) वह अटल आत्मिक जीवन वाले हो जाता है।वह फिर कभी आत्मिक मौत नहीं मरता।वह (अपने अंदर से) सारे दुख-कलेश झगड़े दूर कर लेता है। वह मनुष्य उस परमात्मा की शरण प्राप्त कर लेता है जो कभी छोड़ के नहीं जाता।उस मनुष्य के मन में।हृदय में प्रभू की प्रीति प्यारी लगने लगती है। नानक विनती करता है, (हे भाई !) आत्मिक जीवन देने वाली सिफत सालाह की पवित्र बाणी सदा गायन करनी चाहिए। 3। (‘अमृत बाणी’ की बरकति से मनुष्य का) मन और हृदय (परमात्मा की याद में इस तरह) मस्त हो जाता है कि (इस प्रथाय) कुछ बताया नहीं जा सकता। (बस ! ये ही कहा जा सकता है कि) जिस परमात्मा से वह पैदा हुआ था उसने (उसको) अपने में मिला लिया। ताने-बाने की तरह परमात्मा की ज्योति में समा के (वह यूँ हो गया जैसे) पानी में पानी मिल जाता है। (फिर उस मनुष्य को) पानी में।धरती पर।आकाश में।एक परमात्मा ही मौजूद दिखाई देता है (उसके बिना) कोई और नहीं दिखता। उस मनुष्य को परमात्मा जंगल में।घास (के हरेक तृण) में।सारे संसार में व्यापक प्रतीत होता है (उस मनुष्य की आत्मक अवस्था का) मूल्य बयान नहीं किया जा सकता। नानक विनती करता है, जिस परमात्मा ने (उस मनुष्य की आत्मिक अवस्था की) ये खेल बना दी वह खुद ही उसको समझता है। 4। 2। 5।
बिहागड़ा महला 5 ॥ खोजत संत फिरहि प्रभ प्राण अधारे राम ॥ ताणु तनु खीन भइआ बिनु मिलत पिआरे राम ॥ प्रभ मिलहु पिआरे मइआ धारे करि दइआ लड़ि लाइ लीजीऐ ॥ देहि नामु अपना जपउ सुआमी हरि दरस पेखे जीजीऐ ॥ समरथ पूरन सदा निहचल ऊच अगम अपारे ॥ बिनवंति नानक धारि किरपा मिलहु प्रान पिआरे ॥1॥ जप तप बरत कीने पेखन कउ चरणा राम ॥ तपति न कतहि बुझै बिनु सुआमी सरणा राम ॥ प्रभ सरणि तेरी काटि बेरी संसारु सागरु तारीऐ ॥ अनाथ निरगुनि कछु न जाना मेरा गुणु अउगणु न बीचारीऐ ॥ दीन दइआल गोपाल प्रीतम समरथ कारण करणा ॥ नानक चात्रिक हरि बूंद मागै जपि जीवा हरि हरि चरणा ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 5 ॥ (हे भाई !) संत जन प्राणों के आसरे परमात्मा को (सदा) तलाशते फिरते हैं। प्यारे प्रभू को मिले बिना उनका शरीर कमजोर हो जाता है। उनका शारीरिक बल घट जाता है। हे प्यारे प्रभू ! मेहर करके मुझे मिल।दया करके मुझे अपने साथ लगा ले। हे मेरे स्वामी ! मुझे अपना नाम दे।मैं (आपके नाम को सदा) जपता रहूँ।आपके दर्शन करके मेरे अंदर आत्मिक जीवन पैदा हैं जाता है। हे सब ताकतों के मालिक ! हे सर्व-व्यापक ! हे सदा अटॅल रहने वाले ! हे सबसे ऊँचे ! हे अपहुँच ! हे बेअंत ! नानक विनती करता है, हे प्राणों से प्यारे ! मेहर करके मुझे आ मिल। 1। परमात्मा के दर्शन करने के लिए अनेकों जप किए।धूणियां तपाई।वर्त रखे। पर मालिक प्रभू की शरण के बिना कहीं भी मन की तपष नहीं बुझती। हे प्रभू ! (जपों-तपों के आसरे छोड़ के) मैं आपकी शरण आया हूँ।मेरी माया के मोह की बेड़ी काट दे।मुझे संसार-सागर से पार लंघा ले। हे प्रभू ! मेरा और कोई आसरा नहीं।मैं गुण-हीन हूँ।(संसार-समुंद्र से पार लांघने का) मैं कोई तरीका नहीं जानता।मेरा ना कोई गुण ना ही अवगुण अपने ख्यालों में लाना। हे दीनों पर दया करने वाले ! हे सृष्टि के रखवाले ! हे प्रीतम ! हे सारी ही ताकतों के मालिक ! हे जगत के मूल ! हे नानक ! (कह) (जैसे) पपीहा (बरखा की) बूँद माँगता है (वैसे ही मैं आपके नाम अमृत की बूँद माँगता हूँ) आपके चरणों का ध्यान धर-धर के मुझे आत्मिक जीवन प्राप्त होता है। 2।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे मन ! परमात्मा (की सिफत सालाह) के तालाब में स्नान किया कर।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।