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अंग 539

अंग
539
राग Bihaagraa
राग: Bihaagraa · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जन त्राहि त्राहि सरणागती मेरी जिंदुड़ीए गुर नानक हरि रखवाले राम ॥3॥
हरि जन हरि लिव उबरे मेरी जिंदुड़ीए धुरि भाग वडे हरि पाइआ राम ॥
हरि हरि नामु पोतु है मेरी जिंदुड़ीए गुर खेवट सबदि तराइआ राम ॥
हरि हरि पुरखु दइआलु है मेरी जिंदुड़ीए गुर सतिगुर मीठ लगाइआ राम ॥
करि किरपा सुणि बेनती हरि हरि जन नानक नामु धिआइआ राम ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह) हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! परमात्मा के सेवक परमात्मा की शरण आते हैं (और।प्रार्थना करते हैं, हे प्रभू ! हमें) बचा ले।बचा ले।गुरू परमात्मा उनके रक्षक बनते हैं। 3। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! परमात्मा के भक्त परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ के (संसार समुंद्र में से) बच निकलते हैं।धुर दरगाह से लिखे लेख अनुसार बड़े भाग्यों से वह परमात्मा को मिल जाते हैं। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! परमात्मा का नाम जहाज है।(हरि के जनों को) गुरू-मल्लाह के शबद ने (संसार समुंद्र से) पार लंघा दिया। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! सर्व-व्यापक परमात्मा सदा ही दयावान है।गुरू सतिगुरू की शरण पड़ने से (हरि-जनों को परमात्मा) प्यारा लगने लग पड़ता है। हे दास नानक ! (कह) हे हरी ! मेहर कर।मेरी विनती सुन (मैं आपका नाम सिमरता रहूँ।जिन पर तूने मेहर की निगाह की।उन्होंने) आपका नाम सिमरा। 4। 2।
बिहागड़ा महला 4 ॥
जगि सुक्रितु कीरति नामु है मेरी जिंदुड़ीए हरि कीरति हरि मनि धारे राम ॥
हरि हरि नामु पवितु है मेरी जिंदुड़ीए जपि हरि हरि नामु उधारे राम ॥
सभ किलविख पाप दुख कटिआ मेरी जिंदुड़ीए मलु गुरमुखि नामि उतारे राम ॥
वड पुंनी हरि धिआइआ जन नानक हम मूरख मुगध निसतारे राम ॥1॥
जो हरि नामु धिआइदे मेरी जिंदुड़ीए तिना पंचे वसगति आए राम ॥
अंतरि नव निधि नामु है मेरी जिंदुड़ीए गुरु सतिगुरु अलखु लखाए राम ॥
गुरि आसा मनसा पूरीआ मेरी जिंदुड़ीए हरि मिलिआ भुख सभ जाए राम ॥
धुरि मसतकि हरि प्रभि लिखिआ मेरी जिंदुड़ीए जन नानक हरि गुण गाए राम ॥2॥
हम पापी बलवंचीआ मेरी जिंदुड़ीए परद्रोही ठग माइआ राम ॥
वडभागी गुरु पाइआ मेरी जिंदुड़ीए गुरि पूरै गति मिति पाइआ राम ॥
गुरि अंम्रितु हरि मुखि चोइआ मेरी जिंदुड़ीए फिरि मरदा बहुड़ि जीवाइआ राम ॥
जन नानक सतिगुर जो मिले मेरी जिंदुड़ीए तिन के सभ दुख गवाइआ राम ॥3॥
अति ऊतमु हरि नामु है मेरी जिंदुड़ीए जितु जपिऐ पाप गवाते राम ॥
पतित पवित्र गुरि हरि कीए मेरी जिंदुड़ीए चहु कुंडी चहु जुगि जाते राम ॥
हउमै मैलु सभ उतरी मेरी जिंदुड़ीए हरि अंम्रिति हरि सरि नाते राम ॥
अपराधी पापी उधरे मेरी जिंदुड़ीए जन नानक खिनु हरि राते राम ॥4॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 4 ॥ हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! परमात्मा की सिफत सालाह करनी।परमात्मा का नाम जपना।जगत में सबसे श्रेष्ठ कर्म है।आप भी परमात्मा की सिफत सालाह किया कर।परमात्मा का नाम अपने मन में टिकाए रख। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! परमात्मा का नाम (विकारियों को) पवित्र करने वाला है।आप भी परमात्मा का नाम जपा कर।नाम (संसार समुंद्र में डूबने से) बचा लेता है। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! (जिस मनुष्य ने हरि-नाम सिमरा।उसने अपने अंदर से) सारे विकार।सारे पाप सारे दुख दूर कर लिए।वह मनुष्य गुरू की शरण पड़ के हरि-नाम की बरकति से विकारों की मैल उतार लेता है। हे दास नानक ! (कह) बड़े भाग्यों से ही परमात्मा का नाम सिमरा जा सकता है।परमात्मा का नाम हम जैसे मूर्खों को।महा मूर्खों को संसार समुंद्र से पार लंघा लेता हैं। 1। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते रहते हैं।कामादिक पाँचों वैरी उनके वश में आ जाते हैं। दुनिया के नौ खजानों की बराबरी करने वाला हरि-नाम उनके मन में आ बसता है।हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! गुरू उन्हें उस परमात्मा की समझ बख्श देता है जिस तक मनुष्य की अपनी समझ नहीं पहुँच सकती। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! गुरू ने जिन मनुष्यों की आशा और मन की मनसा पूरी कर दी।उनको परमात्मा मिल गया।उनकी माया की सारी भूख उतर जाती है। हे दास नानक ! (कह) धुर दरगाह से परमात्मा ने जिस मनुष्य के माथे पर (सिमरन का लेख) लिख दिया है।वह सदा परमात्मा के गुण गाता रहता है। 2। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! हम जीव पापी हैं।छल कपट करने वाले हैं।दूसरों के साथ दग़ा-फरेब करने वाले हैं।माया की खातिर ठॅगी करने वाले हैं। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! जिस अति भाग्यशाली ने गुरू ढूँढ लिया उसने पूरे गुरू के द्वारा उच्च आत्मिक जीवन की मर्यादा हासिल कर ली। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! जिस मनुष्य के मुँह में गुरू ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल टपका दिया।उस आत्मिक मौत मर रहे मनुष्य को गुरू ने दोबारा आत्मिक जीवन बख्श दिया। हे दास नानक ! (कह) हे मेरी सोहणी जिंदे ! जो मनुष्य गुरू से मिल लिए।गुरू ने उनके सारे दुख दूर कर दिए। 3। हे मेरी सोहणी जिंदे ! परमात्मा का नाम बड़ा ही श्रेष्ठ है।इस नाम के जपने से सारे (पिछले) पाप दूर हो जाते हैं। हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! गुरू ने हरी-नाम दे के विकारों में गिरे हुओं को भी पवित्र बना दिया है।वे सारे संसार में सदा के लिए ही मशहूर हो गए। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! जिन मनुष्यों ने आत्मक जीवन देने वाले हरि-नाम-जल में।हरी-नाम-सरोवर में स्नान किया।उनके अहंकार की सारी मैल उतर गई। हे दास नानक ! (कह) हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! जो विकारी और पापी भी एक छिन के लिए हरी-नाम के रंग में रंगे गए।वे संसार समुंद्र में डूबने से बच गए। 4। 3।
बिहागड़ा महला 4 ॥
हउ बलिहारी तिन॑ कउ मेरी जिंदुड़ीए जिन॑ हरि हरि नामु अधारो राम ॥
गुरि सतिगुरि नामु द्रिड़ाइआ मेरी जिंदुड़ीए बिखु भउजलु तारणहारो राम ॥
जिन इक मनि हरि धिआइआ मेरी जिंदुड़ीए तिन संत जना जैकारो राम ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: बिहागड़ा महला 4 ॥ हे मेरी सुंदर सी जीवात्मा ! (कह) मैं उनसे कुर्बान हूँ जिन्होंने परमात्मा के नाम को (अपनी जिंदगी का) आसरा बना लिया है। हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! गुरू ने सतिगुरू ने उनके हृदय में परमात्मा का नाम पक्की तरह टिका दिया है।गुरू (माया के मोह के) जहर (-भरे) संसार-समुंद्र से पार लंघाने की समर्था रखता है। हे मेरी सोहणी जीवात्मा ! जिन संत जनों ने एक-मन हो के परमात्मा का नाम सिमरा है।उनकी (हर जगह) शोभा-महिमा होती है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक ! (कह) हे मेरी सुंदर जीवात्मा ! परमात्मा के सेवक परमात्मा की शरण आते हैं (और।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।