ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सभ दिन के समरथ पंथ बिठुले हउ बलि बलि जाउ ॥
गावन भावन संतन तोरै चरन उवा कै पाउ ॥1॥ रहाउ ॥
जासन बासन सहज केल करुणा मै एक अनंत अनूपै ठाउ ॥1॥
रिधि सिधि निधि कर तल जगजीवन स्रब नाथ अनेकै नाउ ॥
दइआ मइआ किरपा नानक कउ सुनि सुनि जसु जीवाउ ॥2॥1॥38॥6॥44॥
रागु देवगंधारी महला 9 ॥
यह मनु नैक न कहिओ करै ॥
सीख सिखाइ रहिओ अपनी सी दुरमति ते न टरै ॥1॥ रहाउ ॥
मदि माइआ कै भइओ बावरो हरि जसु नहि उचरै ॥
करि परपंचु जगत कउ डहकै अपनो उदरु भरै ॥1॥
सुआन पूछ जिउ होइ न सूधो कहिओ न कान धरै ॥
कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते काजु सरै ॥2॥1॥
सभ किछु जीवत को बिवहार ॥
मात पिता भाई सुत बंधप अरु फुनि ग्रिह की नारि ॥1॥ रहाउ ॥
तन ते प्रान होत जब निआरे टेरत प्रेति पुकारि ॥
आध घरी कोऊ नहि राखै घर ते देत निकारि ॥1॥
म्रिग त्रिसना जिउ जग रचना यह देखहु रिदै बिचारि ॥
कहु नानक भजु राम नाम नित जा ते होत उधार ॥2॥2॥
जगत मै झूठी देखी प्रीति ॥
अपने ही सुख सिउ सभ लागे किआ दारा किआ मीत ॥1॥ रहाउ ॥
मेरउ मेरउ सभै कहत है हित सिउ बाधिओ चीत ॥
अंति कालि संगी नह कोऊ इह अचरज है रीति ॥1॥
मन मूरख अजहू नह समझत सिख दै हारिओ नीत ॥
नानक भउजलु पारि परै जउ गावै प्रभ के गीत ॥2॥3॥6॥38॥47॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। ग्रंथ के मध्य के राग, गुजरी से लेकर सोरठ तक। सोलहवीं सदी के अंत और सत्रहवीं के प्रारम्भ की रचनाएँ।
तेग बहादुर जी की रचनाएँ ग्रंथ के अंतिम पन्नों पर हैं, गुरु गोबिंद सिंह द्वारा 1706 में जोड़ी गयीं। वैराग्य, क्षणिकता, और मरण-चेतना उनकी वाणी के केन्द्रीय धागे हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे दास नानक ! (कह, हे प्रभू !) मुझे अपने दासों का दास बना ले।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।