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अंग 459

अंग
459
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
चरण कमल संगि प्रीति कलमल पाप टरे ॥
दूख भूख दारिद्र नाठे प्रगटु मगु दिखाइआ ॥
मिलि साधसंगे नाम रंगे मनि लोड़ीदा पाइआ ॥
हरि देखि दरसनु इछ पुंनी कुल संबूहा सभि तरे ॥
दिनसु रैणि अनंद अनदिनु सिमरंत नानक हरि हरे ॥4॥6॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: परमात्मा के सोहणे चरण कमलों से जिस मनुष्य की प्रीति बन जाती है उसके सारे पाप विकार दूर हो जाते हैं। जिस मनुष्य को (गुरू ने जीवन का) सीधा राह दिखा दिया।उसके दुख।उसकी भूख उसकी गरीबी सब दूर हो गए। जो मनुष्य गुरू की संगति में मिल के परमात्मा के नाम के प्रेम में मगन होता है वह अपने मन में सोचा हुआ फल पा लेता है। परमात्मा के दर्शन करके मनुष्य की हरेक इच्छा पूरी हो जाती है।उसकी सारी कुलों का भी उद्धार हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य सदा हरी-नाम सिमरते रहते हैं।उनकी हरेक रात उनका हरेक दिन हर समय आनंद में गुजरता है। 4। 6। 9।
आसा महला 5 छंत घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥
नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 छंत घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक॥ मैं सदा अच्छी सोचें ही सोचता रहूँ।मैं गोबिंद का नाम जपता रहूँ।मैं गुरू की पवित्र संगति करता रहूँ। हे नानक ! (कह) हे भगवान ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं एक घड़ी के वास्ते भी आपका नाम ना भूलूँ। 1।
छंत ॥
भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥
जागहि संत जना मेरे राम पिआरे ॥
राम पिआरे सदा जागहि नामु सिमरहि अनदिनो ॥
चरण कमल धिआनु हिरदै प्रभ बिसरु नाही इकु खिनो ॥
तजि मानु मोहु बिकारु मन का कलमला दुख जारे ॥
बिनवंति नानक सदा जागहि हरि दास संत पिआरे ॥1॥
मेरी सेजड़ीऐ आडंबरु बणिआ ॥
मनि अनदु भइआ प्रभु आवत सुणिआ ॥
प्रभ मिले सुआमी सुखह गामी चाव मंगल रस भरे ॥
अंग संगि लागे दूख भागे प्राण मन तन सभि हरे ॥
मन इछ पाई प्रभ धिआई संजोगु साहा सुभ गणिआ ॥
बिनवंति नानक मिले स्रीधर सगल आनंद रसु बणिआ ॥2॥
मिलि सखीआ पुछहि कहु कंत नीसाणी ॥
रसि प्रेम भरी कछु बोलि न जाणी ॥
गुण गूड़ गुपत अपार करते निगम अंतु न पावहे ॥
भगति भाइ धिआइ सुआमी सदा हरि गुण गावहे ॥
सगल गुण सुगिआन पूरन आपणे प्रभ भाणी ॥
बिनवंति नानक रंगि राती प्रेम सहजि समाणी ॥3॥
सुख सोहिलड़े हरि गावण लागे ॥ साजन सरसिअड़े दुख दुसमन भागे ॥
सुख सहज सरसे हरि नामि रहसे प्रभि आपि किरपा धारीआ ॥
हरि चरण लागे सदा जागे मिले प्रभ बनवारीआ ॥
सुभ दिवस आए सहजि पाए सगल निधि प्रभ पागे ॥
बिनवंति नानक सरणि सुआमी सदा हरि जन तागे ॥4॥1॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: छंद॥ (हे भाई !) ओस से भीगी रात में (आकाश में) तारे चम-चमाते हुए दिखते हैं (वैसे ही। परमात्मा के प्रेम में भीगे हुए हृदय वाले मनुष्यों के चित्त-आकाश में सुंदर आत्मिक गुण झिलमिलाते हैं)।मेरे राम के प्यारे संत-जन (सिमरन की बरकति से माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं। परमात्मा के प्यारे संत-जन सदा ही सुचेत रहते हैं।हर समय परमात्मा का नाम सिमरते रहते हैं। संत-जन अपने दिल में परमातमा के सोहाने चरण-कमलों का ध्यान धरते हैं (और।उसके दर पे अरदास करते हैं) हे प्रभू ! पल भर के लिए भी हमारे दिल से दूर ना होना। संत-जन अपने मन का मान छोड़ के।मोह और विकार दूर करके अपने सारे दुख और पाप जला लेते हैं। नानक बिनती करता है, (हे भाई !) परमात्मा के प्यारे संत परमात्मा के दास सदा (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं। 1। हे सखी ! मेरे हृदय की सोहानी सेज पर सजावट बन गई। जब मैंने प्रभू को (अपनी तरफ) आता सुना।तो मेरे मन में आनंद पैदा हो गया। हे सखी ! जिन भाग्शालियों को सुख देने वाले मालिक प्रभू जी मिल जाते हैं।उनके हृदय चावों से।खुशियों से आनंद से भर जाते हैं। वे प्रभू के अंक से।चरणों से जुड़े रहते हैं।उनके दुख दूर हो जाते हैं।उनकी जीवात्मा उनका मन उनका शरीर- सारे ही (आत्मिक जीवन से) हरे हो जाते हैं। (गुरू की शरण पड़ के) जो मनुष्य प्रभू का ध्यान धरते हैं।उनके मन की इच्छा पूरी हो जाती है (गुरू परमात्मा के साथ उनका मिलाप करवाने के लिए) शुभ संजोग बना देता है।शुभ महूरत निकाल देता है। नानक विनती करता है, जिन सौभाग्य-शालियों को प्रभू जी मिल जाते हैं।उनके हृदय में सारे आनंद बन जाते हैं।उल्लास बना रहता है। 2। सहेलियां मिल के (मुझे) पूछती हैं कि पति-प्रभू की कोई निशानी बता। मैं उसके मिलाप के आनंद में मगन तो हूँ।उसके प्रेम से मेरा हृदय भरा हुआ भी है।पर मैं उसकी कोई निशानी बताना नहीं जानती। (मेरे उस) करतार के गुण गहरे हैं गुप्त हैं बेअंत हैं।वेद भी उसके गुणों का अंत नहीं पा सकते। (उसके सेवक) उसकी भक्ति के रंग में उसके प्रेम में जुड़ के उसका ध्यान धर के सदा उस मालिक के गुण गाते रहते हैं। वह अपने उस प्रभू को प्यारी लगने लगती है जो सारे गुणों का मालिक है जो श्रेष्ठ ज्ञान वाला है जो सब में व्यापक है। नानक विनती करता है, जो जीव-स्त्री उस पति-प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी जाती है वह आत्मिक अडोलता में लीन रहती है। 3। हे भाई ! परमात्मा के भगत (हरी-जन) जब परमात्मा के सुखद सिफत सालाह के सोहाने गीत गाने लग जाते हैं तो (उनके अंदर शुभ गुण) मित्र बढ़ते-फूलते हैं। उनके दुख (और कामादिक) वैरी भाग जाते हैं। आत्मिक अडोलता के सुख उनके अंदर प्रफुल्लित होते हैं।परमात्मा के नाम की बरकति से वे प्रसन्न-चित्त रहते हैं।पर ये सारी मेहर प्रभू ने खुद ही की होती है। (अपने सेवकों पर प्रभू मेहर करता है) वह सेवक परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं (विकारों के हमलों से) सदा सुचेत रहते हैं।और जगत के मालिक प्रभू को मिल जाते हैं। हे भाई ! संत जनों के वास्ते (जीवन के यह) भले दिन आए होते हैं।वे आत्मिक अडोलता में टिक के सारे गुणों के खजाने प्रभू के चरन परसते रहते हैं। नानक विनती करता है – परमात्मा के सेवक मालिक प्रभू की शरण में आ के सदा के लिए उसके साथ प्रीति निबाहते हैं। 4। 1। 10।
आसा महला 5 ॥
उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥
मुहलति पुंनड़ीआ कितु कूड़ि लोभाइआ ॥
कूड़े लुभाइआ धोहु माइआ करहि पाप अमितिआ ॥
तनु भसम ढेरी जमहि हेरी कालि बपुड़ै जितिआ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भोले राही (जीव) ! उठ।चल (तैयार हो)।आप क्यों देर कर रहा है। आपको मिला उम्र का वक्त पूरा हैं रहा है।आप किस ठॅगी में फसा हुआ है।(ध्यान कर। ये) माया (निरी) धोखा है (आप इस की) ठॅगी में फसा हुआ है।और बेअंत पाप किए जा रहा है। ये शरीर (आखिर) मिट्टी की ढेरी (हो जाएगा)।जम ने इसे अपनी निगाह में रखा हुआ है।(पर जीव बिचारा करे भी तो क्या।इस)

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “परमात्मा के सोहणे चरण कमलों से जिस मनुष्य की प्रीति बन जाती है उसके सारे पाप विकार दूर हो जाते हैं।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।