अंग
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आसा
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चरण कमल संगि प्रीति कलमल पाप टरे ॥
चरण कमल संगि प्रीति कलमल पाप टरे ॥
दूख भूख दारिद्र नाठे प्रगटु मगु दिखाइआ ॥
मिलि साधसंगे नाम रंगे मनि लोड़ीदा पाइआ ॥
हरि देखि दरसनु इछ पुंनी कुल संबूहा सभि तरे ॥
दिनसु रैणि अनंद अनदिनु सिमरंत नानक हरि हरे ॥4॥6॥9॥
दूख भूख दारिद्र नाठे प्रगटु मगु दिखाइआ ॥
मिलि साधसंगे नाम रंगे मनि लोड़ीदा पाइआ ॥
हरि देखि दरसनु इछ पुंनी कुल संबूहा सभि तरे ॥
दिनसु रैणि अनंद अनदिनु सिमरंत नानक हरि हरे ॥4॥6॥9॥
हिन्दी अर्थ: परमात्मा के सोहणे चरण कमलों से जिस मनुष्य की प्रीति बन जाती है उसके सारे पाप विकार दूर हो जाते हैं। जिस मनुष्य को (गुरू ने जीवन का) सीधा राह दिखा दिया।उसके दुख।उसकी भूख उसकी गरीबी सब दूर हो गए। जो मनुष्य गुरू की संगति में मिल के परमात्मा के नाम के प्रेम में मगन होता है वह अपने मन में सोचा हुआ फल पा लेता है। परमात्मा के दर्शन करके मनुष्य की हरेक इच्छा पूरी हो जाती है।उसकी सारी कुलों का भी उद्धार हो जाता है। हे नानक ! जो मनुष्य सदा हरी-नाम सिमरते रहते हैं।उनकी हरेक रात उनका हरेक दिन हर समय आनंद में गुजरता है। 4। 6। 9।
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥
आसा महला 5 छंत घरु 7
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥
नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोकु ॥
सुभ चिंतन गोबिंद रमण निरमल साधू संग ॥
नानक नामु न विसरउ इक घड़ी करि किरपा भगवंत ॥1॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 छंत घरु 7 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक॥ मैं सदा अच्छी सोचें ही सोचता रहूँ।मैं गोबिंद का नाम जपता रहूँ।मैं गुरू की पवित्र संगति करता रहूँ। हे नानक ! (कह) हे भगवान ! (मेरे पर) मेहर कर।मैं एक घड़ी के वास्ते भी आपका नाम ना भूलूँ। 1।
छंत ॥
छंत ॥
भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥
जागहि संत जना मेरे राम पिआरे ॥
राम पिआरे सदा जागहि नामु सिमरहि अनदिनो ॥
चरण कमल धिआनु हिरदै प्रभ बिसरु नाही इकु खिनो ॥
तजि मानु मोहु बिकारु मन का कलमला दुख जारे ॥
बिनवंति नानक सदा जागहि हरि दास संत पिआरे ॥1॥
मेरी सेजड़ीऐ आडंबरु बणिआ ॥
मनि अनदु भइआ प्रभु आवत सुणिआ ॥
प्रभ मिले सुआमी सुखह गामी चाव मंगल रस भरे ॥
अंग संगि लागे दूख भागे प्राण मन तन सभि हरे ॥
मन इछ पाई प्रभ धिआई संजोगु साहा सुभ गणिआ ॥
बिनवंति नानक मिले स्रीधर सगल आनंद रसु बणिआ ॥2॥
मिलि सखीआ पुछहि कहु कंत नीसाणी ॥
रसि प्रेम भरी कछु बोलि न जाणी ॥
गुण गूड़ गुपत अपार करते निगम अंतु न पावहे ॥
भगति भाइ धिआइ सुआमी सदा हरि गुण गावहे ॥
सगल गुण सुगिआन पूरन आपणे प्रभ भाणी ॥
बिनवंति नानक रंगि राती प्रेम सहजि समाणी ॥3॥
सुख सोहिलड़े हरि गावण लागे ॥ साजन सरसिअड़े दुख दुसमन भागे ॥
सुख सहज सरसे हरि नामि रहसे प्रभि आपि किरपा धारीआ ॥
हरि चरण लागे सदा जागे मिले प्रभ बनवारीआ ॥
सुभ दिवस आए सहजि पाए सगल निधि प्रभ पागे ॥
बिनवंति नानक सरणि सुआमी सदा हरि जन तागे ॥4॥1॥10॥
भिंनी रैनड़ीऐ चामकनि तारे ॥
जागहि संत जना मेरे राम पिआरे ॥
राम पिआरे सदा जागहि नामु सिमरहि अनदिनो ॥
चरण कमल धिआनु हिरदै प्रभ बिसरु नाही इकु खिनो ॥
तजि मानु मोहु बिकारु मन का कलमला दुख जारे ॥
बिनवंति नानक सदा जागहि हरि दास संत पिआरे ॥1॥
मेरी सेजड़ीऐ आडंबरु बणिआ ॥
मनि अनदु भइआ प्रभु आवत सुणिआ ॥
प्रभ मिले सुआमी सुखह गामी चाव मंगल रस भरे ॥
अंग संगि लागे दूख भागे प्राण मन तन सभि हरे ॥
मन इछ पाई प्रभ धिआई संजोगु साहा सुभ गणिआ ॥
बिनवंति नानक मिले स्रीधर सगल आनंद रसु बणिआ ॥2॥
मिलि सखीआ पुछहि कहु कंत नीसाणी ॥
रसि प्रेम भरी कछु बोलि न जाणी ॥
गुण गूड़ गुपत अपार करते निगम अंतु न पावहे ॥
भगति भाइ धिआइ सुआमी सदा हरि गुण गावहे ॥
सगल गुण सुगिआन पूरन आपणे प्रभ भाणी ॥
बिनवंति नानक रंगि राती प्रेम सहजि समाणी ॥3॥
सुख सोहिलड़े हरि गावण लागे ॥ साजन सरसिअड़े दुख दुसमन भागे ॥
सुख सहज सरसे हरि नामि रहसे प्रभि आपि किरपा धारीआ ॥
हरि चरण लागे सदा जागे मिले प्रभ बनवारीआ ॥
सुभ दिवस आए सहजि पाए सगल निधि प्रभ पागे ॥
बिनवंति नानक सरणि सुआमी सदा हरि जन तागे ॥4॥1॥10॥
हिन्दी अर्थ: छंद॥ (हे भाई !) ओस से भीगी रात में (आकाश में) तारे चम-चमाते हुए दिखते हैं (वैसे ही। परमात्मा के प्रेम में भीगे हुए हृदय वाले मनुष्यों के चित्त-आकाश में सुंदर आत्मिक गुण झिलमिलाते हैं)।मेरे राम के प्यारे संत-जन (सिमरन की बरकति से माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं। परमात्मा के प्यारे संत-जन सदा ही सुचेत रहते हैं।हर समय परमात्मा का नाम सिमरते रहते हैं। संत-जन अपने दिल में परमातमा के सोहाने चरण-कमलों का ध्यान धरते हैं (और।उसके दर पे अरदास करते हैं) हे प्रभू ! पल भर के लिए भी हमारे दिल से दूर ना होना। संत-जन अपने मन का मान छोड़ के।मोह और विकार दूर करके अपने सारे दुख और पाप जला लेते हैं। नानक बिनती करता है, (हे भाई !) परमात्मा के प्यारे संत परमात्मा के दास सदा (माया के हमलों से) सुचेत रहते हैं। 1। हे सखी ! मेरे हृदय की सोहानी सेज पर सजावट बन गई। जब मैंने प्रभू को (अपनी तरफ) आता सुना।तो मेरे मन में आनंद पैदा हो गया। हे सखी ! जिन भाग्शालियों को सुख देने वाले मालिक प्रभू जी मिल जाते हैं।उनके हृदय चावों से।खुशियों से आनंद से भर जाते हैं। वे प्रभू के अंक से।चरणों से जुड़े रहते हैं।उनके दुख दूर हो जाते हैं।उनकी जीवात्मा उनका मन उनका शरीर- सारे ही (आत्मिक जीवन से) हरे हो जाते हैं। (गुरू की शरण पड़ के) जो मनुष्य प्रभू का ध्यान धरते हैं।उनके मन की इच्छा पूरी हो जाती है (गुरू परमात्मा के साथ उनका मिलाप करवाने के लिए) शुभ संजोग बना देता है।शुभ महूरत निकाल देता है। नानक विनती करता है, जिन सौभाग्य-शालियों को प्रभू जी मिल जाते हैं।उनके हृदय में सारे आनंद बन जाते हैं।उल्लास बना रहता है। 2। सहेलियां मिल के (मुझे) पूछती हैं कि पति-प्रभू की कोई निशानी बता। मैं उसके मिलाप के आनंद में मगन तो हूँ।उसके प्रेम से मेरा हृदय भरा हुआ भी है।पर मैं उसकी कोई निशानी बताना नहीं जानती। (मेरे उस) करतार के गुण गहरे हैं गुप्त हैं बेअंत हैं।वेद भी उसके गुणों का अंत नहीं पा सकते। (उसके सेवक) उसकी भक्ति के रंग में उसके प्रेम में जुड़ के उसका ध्यान धर के सदा उस मालिक के गुण गाते रहते हैं। वह अपने उस प्रभू को प्यारी लगने लगती है जो सारे गुणों का मालिक है जो श्रेष्ठ ज्ञान वाला है जो सब में व्यापक है। नानक विनती करता है, जो जीव-स्त्री उस पति-प्रभू के प्रेम-रंग में रंगी जाती है वह आत्मिक अडोलता में लीन रहती है। 3। हे भाई ! परमात्मा के भगत (हरी-जन) जब परमात्मा के सुखद सिफत सालाह के सोहाने गीत गाने लग जाते हैं तो (उनके अंदर शुभ गुण) मित्र बढ़ते-फूलते हैं। उनके दुख (और कामादिक) वैरी भाग जाते हैं। आत्मिक अडोलता के सुख उनके अंदर प्रफुल्लित होते हैं।परमात्मा के नाम की बरकति से वे प्रसन्न-चित्त रहते हैं।पर ये सारी मेहर प्रभू ने खुद ही की होती है। (अपने सेवकों पर प्रभू मेहर करता है) वह सेवक परमात्मा के चरणों में जुड़े रहते हैं (विकारों के हमलों से) सदा सुचेत रहते हैं।और जगत के मालिक प्रभू को मिल जाते हैं। हे भाई ! संत जनों के वास्ते (जीवन के यह) भले दिन आए होते हैं।वे आत्मिक अडोलता में टिक के सारे गुणों के खजाने प्रभू के चरन परसते रहते हैं। नानक विनती करता है - परमात्मा के सेवक मालिक प्रभू की शरण में आ के सदा के लिए उसके साथ प्रीति निबाहते हैं। 4। 1। 10।
उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥
आसा महला 5 ॥
उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥
मुहलति पुंनड़ीआ कितु कूड़ि लोभाइआ ॥
कूड़े लुभाइआ धोहु माइआ करहि पाप अमितिआ ॥
तनु भसम ढेरी जमहि हेरी कालि बपुड़ै जितिआ ॥
उठि वंञु वटाऊड़िआ तै किआ चिरु लाइआ ॥
मुहलति पुंनड़ीआ कितु कूड़ि लोभाइआ ॥
कूड़े लुभाइआ धोहु माइआ करहि पाप अमितिआ ॥
तनु भसम ढेरी जमहि हेरी कालि बपुड़ै जितिआ ॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 5 ॥ हे भोले राही (जीव) ! उठ।चल (तैयार हो)।आप क्यों देर कर रहे हैं। आपको मिला उम्र का वक्त पूरा हो रहा है।आप किस ठॅगी में फँसे हुए हैं।(ध्यान कर। ये) माया (निरी) धोखा है (आप इस की) ठॅगी में फँसे हुए हैं।और बेअंत पाप किए जा रहे हैं। ये शरीर (आखिर) मिट्टी की ढेरी (हो जाएगा)।जम ने इसे अपनी निगाह में रखा हुआ है।(पर जीव बिचारा करे भी तो क्या।इस)
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ५: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ४५९ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।