Lulla Family

अंग 445

अंग
445
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आवण जाणा भ्रमु भउ भागा हरि हरि हरि गुण गाइआ ॥
जनम जनम के किलविख दुख उतरे हरि हरि नामि समाइआ ॥
जिन हरि धिआइआ धुरि भाग लिखि पाइआ तिन सफलु जनमु परवाणु जीउ ॥
हरि हरि मनि भाइआ परम सुख पाइआ हरि लाहा पदु निरबाणु जीउ ॥3॥
जिन॑ हरि मीठ लगाना ते जन परधाना ते ऊतम हरि हरि लोग जीउ ॥
हरि नामु वडाई हरि नामु सखाई गुर सबदी हरि रस भोग जीउ ॥
हरि रस भोग महा निरजोग वडभागी हरि रसु पाइआ ॥
से धंनु वडे सत पुरखा पूरे जिन गुरमति नामु धिआइआ ॥
जनु नानकु रेणु मंगै पग साधू मनि चूका सोगु विजोगु जीउ ॥
जिन॑ हरि मीठ लगाना ते जन परधाना ते ऊतम हरि हरि लोग जीउ ॥4॥3॥10॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) जिन मनुष्यों ने परमात्मा की सिफत सालाह की।उनका जनम-मरण।उनकी भटकना।उनका (हरेक किस्म का) डर दूर हो गया। जनम-जनमांतरों के किए हुए उनके पाप और दुख नाश हो गए।वे सदा के लिए परमात्मा में लीन हो गए। जिन्होंने धुर-दरगाह के लिखे भाग्यों के अनुसार नाम की दाति प्राप्त कर ली और हरि-नाम सिमरा उनका मानस जनम कामयाब हो गया वे प्रभू की दरगाह में कबूल हो गए। (हे भाई !) जिन मनुष्यों को परमात्मा (का नाम) मन में अच्छा लगने लगा उन्होंने सबसे उच्च आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया।उनहोंने वह आत्मिक अवस्था कमा ली जहाँ कोई वासना अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। 3। हे भाई ! जिन लोगों को परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है वे मनुष्य (जगत में) आदरणीय हो जाते हैं।वे ईश्वर के प्यारे लोग (और दुनिया से) श्रेष्ठ जीवन वाले बन जाते हैं। परमात्मा का नाम (उनके वास्ते) आदर-सत्कार है।परमात्मा का नाम उनका (सदा के लिए) साथी है।गुरू के शबद में जुड़ के वे परमात्मा के नाम-रस का आनंद लेते हैं। वे मनुष्य सदा हरि-नाम-रस भोगते हैं।जिसकी बरकति से वे बड़े निर्लिप रहते हैं।बड़ी किस्मत से उन्हे परमात्मा के नाम का आनंद मिला होता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की मति ले के प्रभू का नाम सिमरा।वह बहुत ही भाग्यशाली बन गए।वे ऊँचे और पूर्ण आत्मिक जीवन वाले बन गए। दास नानक (भी) गुरू के चरणों की धूड़ मांगता है (जिन्हें ये चरण-धूड़ प्राप्त हो जाती है।उनके) मन में बसा हुआ चिंता-फिक्र दूर हो जाता है उनके मन में बसता प्रभू-चरणों से विछोड़ा भी दूर हो जाता है। हे भाई ! जिन मनुष्यों को परमात्मा प्यारा लगने लग जाता है वे मनुष्य (जगत में) इज्जत वाले हो जाते हैं।वे ईश्वर के प्यारे लोग (और ख़लकत से) श्रेष्ठ जीवन वाले बन जाते हैं। 4। 3। 10।
आसा महला 4 ॥
सतजुगि सभु संतोख सरीरा पग चारे धरमु धिआनु जीउ ॥
मनि तनि हरि गावहि परम सुखु पावहि हरि हिरदै हरि गुण गिआनु जीउ ॥
गुण गिआनु पदारथु हरि हरि किरतारथु सोभा गुरमुखि होई ॥
अंतरि बाहरि हरि प्रभु एको दूजा अवरु न कोई ॥
हरि हरि लिव लाई हरि नामु सखाई हरि दरगह पावै मानु जीउ ॥
सतजुगि सभु संतोख सरीरा पग चारे धरमु धिआनु जीउ ॥1॥
तेता जुगु आइआ अंतरि जोरु पाइआ जतु संजम करम कमाइ जीउ ॥
पगु चउथा खिसिआ त्रै पग टिकिआ मनि हिरदै क्रोधु जलाइ जीउ ॥
मनि हिरदै क्रोधु महा बिसलोधु निरप धावहि लड़ि दुखु पाइआ ॥
अंतरि ममता रोगु लगाना हउमै अहंकारु वधाइआ ॥
हरि हरि क्रिपा धारी मेरै ठाकुरि बिखु गुरमति हरि नामि लहि जाइ जीउ ॥
तेता जुगु आइआ अंतरि जोरु पाइआ जतु संजम करम कमाइ जीउ ॥2॥
जुगु दुआपुरु आइआ भरमि भरमाइआ हरि गोपी कान॑ु उपाइ जीउ ॥
तपु तापन तापहि जग पुंन आरंभहि अति किरिआ करम कमाइ जीउ ॥
किरिआ करम कमाइआ पग दुइ खिसकाइआ दुइ पग टिकै टिकाइ जीउ ॥
महा जुध जोध बहु कीन॑े विचि हउमै पचै पचाइ जीउ ॥
दीन दइआलि गुरु साधु मिलाइआ मिलि सतिगुर मलु लहि जाइ जीउ ॥
जुगु दुआपुरु आइआ भरमि भरमाइआ हरि गोपी कान॑ु उपाइ जीउ ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ सतियुगी आत्मिक अवस्था में टिके हुए मनुष्य को हर जगह संतोष (आत्मिक सहारा) दिए रखता है।हर समय मुकम्मल धर्म उसके जीवन का निशाना होता है। (सत्युगी) आत्मिक अवस्था में टिके हुए (मनुष्य) अपने मन में हृदय में परमात्मा की सिफत सालाह करते रहते हैं।और सबसे ऊँचा आत्मिक आनंद लेते रहते हैं।उनके हृदय में परमात्मा के गुणों से गहरा अपनत्व बना रहता है। सतियुगी आत्मिक अवस्था में टिका हुआ मनुष्य परमात्मा के गुणों से गहरी समझ को कीमती वस्तु जानता है।हरि-नाम सिमरन में अपने जीवन को सफल समझता है।गुरू की शरण पड़ के उसे (हर जगह) शोभा मिलती है। उसे अपने अंदर और सारे जगत में एक परमात्मा ही बसता दिखता है।उसके बिना कोई और उसे नहीं दिखता। (हे भाई !) जो मनुष्य परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ता है।परमात्मा उसका (सदा के लिए) साथी बन जाता है।वह मनुष्य परमात्मा के दरबार में आदर पाता है। (हे भाई !) ऐसी सतियुगी आत्मिक अवस्था में टिके हुए मनुष्य को हर जगह संतोष (आत्मिक सहारा दिए रखता है) हर पक्ष से संपूर्ण धर्म उसके जीवन का निशाना बना रहता है। 1। (हे भाई !) जिस मनुष्य के अंदर (दूसरों पे) धक्का जोर जबर (करने का स्वभाव) आ बसता है।उसके लिए तो त्रेता युग आया समझो (उसके अंदर जैसे त्रेता युग चल रहा है।वह मनुष्य परमात्मा का सिमरन भुला के) वीर्य को रोकना (ही धर्म समझ लेता है) वह मनुष्य इन्द्रियों को वश करने वाले कर्म ही करता है। उस मनुष्य के अंदर से (धर्म रूपी बैल का) चौथा पैर खिसक जाता है (उसके अंदर धर्म बैल) तीन पैरों पर ही खड़ा है।उसके मन में उसके हृदय में क्रोध पैदा होता है जो उस (के आत्मिक जीवन) को जलाता है। (हे भाई !) उस मनुष्य के मन में हृदय में क्रोध पैदा हुआ रहता है।जो।जैसे एक बहुत बड़े विषौले वृक्ष के समान है।(जोर-जबरदस्ती के स्वभाव से पैदा हुए इस क्रोध के कारण ही) राजे एक-दूसरे पर हमले करते हैं।आपस में लड़-लड़ के दुख पाते हैं। जिस मनुष्य के अंदर ममता का रोग लग जाता है उसके अंदर अहंकार बढ़ता है।अहंम् बढ़ता ह।पर। जिस मनुष्य पर मेरे मालिक प्रभू ने मेहर की।गुरू की मति की बरकति से हरि-नाम की बरकति से उसके अंदर से ये जहर उतर जाती है। (हे भाई !) जिस मनुष्य के अंदर (दूसरों पर) धक्का (करने का स्वभाव) आ बसता है उसके अंदर।जैसे।त्रेता युग चल रहा है। 2। जो जो स्त्री-मर्द परमात्मा ने पैदा किए हैं (ये सारे स्त्री-मर्द जो हरी ने पैदा किए हैं इनमें से जो जो माया की) भटकना में भटक रहा है (। उसके लिए मानो) द्वापर युग आया हुआ है। (ऐसे लोग भटकना में पड़ के) तप साधते हैं।धूणियां तपाने का कष्ट सहते हैं।यज्ञ आदि निहित पुंन्न कर्म करते हैं। (जो भी मनुष्य परमात्मा का सिमरन छोड़ के और ही धार्मिक मिथे हुए) क्रिया-कर्म करता है (उसके अंदर से धर्म-बैल अपने दोनों) पैर खिसका लेता है (उसके अंदर धर्म-बैल) दो-पैरों के आसरे टिका रहता है। (ये द्वापर युग का प्रभाव ही समझो कि माया की भटकना में फंस के) बड़े-बड़े सूरमे बड़े-बड़े युद्ध मचा देते हैं।(माया की भटकना के कारण ही मनुष्य स्वयं) अहंकार में जलता है व औरों को जलाता है। दीनों पर दया करने वाले परमात्मा ने जिस मनुष्य को पूरा गुरू मिला दिया।गुरू को मिल के (उसके अंदर से माया की) मैल उतर जाती है। (हे भाई !) जो-जो स्त्री-मर्द परमात्मा ने पैदा किया है।जो-जो माया की भटकना में भटक रहा है (उसके वास्ते।जैसे) द्वापर युग आया हुआ है। 3।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जिन मनुष्यों ने परमात्मा की सिफत सालाह की।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।