Lulla Family

अंग 444

अंग
444
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सफलु जनमु सरीरु सभु होआ जितु राम नामु परगासिआ ॥
नानक हरि भजु सदा दिनु राती गुरमुखि निज घरि वासिआ ॥6॥
जिन सरधा राम नामि लगी तिन॑ दूजै चितु न लाइआ राम ॥
जे धरती सभ कंचनु करि दीजै बिनु नावै अवरु न भाइआ राम ॥
राम नामु मनि भाइआ परम सुखु पाइआ अंति चलदिआ नालि सखाई ॥
राम नाम धनु पूंजी संची ना डूबै ना जाई ॥
राम नामु इसु जुग महि तुलहा जमकालु नेड़ि न आवै ॥
नानक गुरमुखि रामु पछाता करि किरपा आपि मिलावै ॥7॥
रामो राम नामु सते सति गुरमुखि जाणिआ राम ॥
सेवको गुर सेवा लागा जिनि मनु तनु अरपि चड़ाइआ राम ॥
मनु तनु अरपिआ बहुतु मनि सरधिआ गुर सेवक भाइ मिलाए ॥
दीना नाथु जीआ का दाता पूरे गुर ते पाए ॥
गुरू सिखु सिखु गुरू है एको गुर उपदेसु चलाए ॥
राम नाम मंतु हिरदै देवै नानक मिलणु सुभाए ॥8॥2॥9॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: उनका मानस जनम कामयाब हो जाता है उनका शरीर भी सफल हो जाता है क्योंकि उनके शरीर में परमात्मा का नाम प्रकाशमान हो जाता है। हे नानक ! आप भी सदा दिन-रात हर वक्त परमात्मा का नाम सिमरता रह।गुरू की शरण पड़ कर (परमात्मा का नाम सिमरने से) परमात्मा के चरणों में जगह मिली रहती है। 6। (हे भाई !) जिन मनुष्यों ने परमात्मा का नाम सिमरने में अपना निष्चय पक्का कर लिया।वह (हरि-नाम का प्यार छोड़ के) किसी और पदार्थ में अपना ध्यान नहीं जोड़ते। अगर सारी धरती सोना बना के भी उनके आगे रख दें।तो भी परमात्मा के नाम के बगैर और कोई पदार्थ उन्हें प्यारा नहीं लगता। उनके मन को परमात्मा का नाम ही भाता है (नाम की बरकति से) वे सबसे श्रेष्ठ आत्मिक आनंद भोगते हैं।आखिरी समय में दुनिया से रवानगी के वक्त भी यही हरि-नाम उनका साथी बनता है। वे सदा परमात्मा का नाम-धन नाम-पूँजी एकत्र करते रहते हैं।ये धन ये सरमाया ना पानी में डूबता है ना ही गायब होता है। हे भाई ! (संसार-नदी से पार लांघने के लिए) परमात्मा का नाम इस जगत में (मानो) तुलहा है।(जो मनुष्य नाम सिमरता रहता है) आत्मिक मौत उसके नजदीक नहीं फटकती। हे नानक ! जिस मनुष्य ने गुरू की शरण में आकर परमात्मा के साथ गहरी नजदीकी बना ली।परमात्मा मेहर करके स्वयं उसे अपने चरणों में जोड़ लेता है। 7। (हे भाई !) परमात्मा का नाम सदा कायम रहने वाला है परमात्मा का नाम सदा स्थिर रहने वाला है।जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है वह उस परमात्मा के साथ गहरा अपनत्व बना लेता है। (पर) वही (मनुष्य) सेवक (बन के) गुरू की बताई हुई सेवा में लगता है जिसने अपना मन अपना तन भेटा करके चढ़ावे के तौर पे (गुरू के आगे) रख दिया है। जिस मनुष्य ने अपना मन अपना तन गुरू के हवाले कर दिया।उसके मन में गुरू के वासते अपार श्रद्धा पैदा हो जाती है (गुरू उसको) उस प्रेम की बरकति से (प्रभू चरणों में) मिला देता है (जो प्रेम) गुरू के सेवक के हृदय में होना चाहिए। (हे भाई !) परमात्मा गरीबों का पति है (मालिक है रखवाला है) सब जीवों को दातें देने वाला है।वह परमात्मा पूरे गुरू से मिलता है। (प्रेम की बरकति से) गुरू सिख (के साथ एक-रूप हो जाता) है और सिख गुरू (में लीन हो जाता) है।सिख भी गुरू वाले उपदेश (की लड़ी) को आगे चलाता रहता है। हे नानक ! जिस मनुष्य को गुरू परमात्मा के नाम का मंत्र हृदय में (बसाने के लिए) देता है।प्रेम के सदका उसका मिलाप (परमात्मा के साथ) हो जाता है। 8। 2। 9।
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
आसा छंत महला 4 घरु 2 ॥
हरि हरि करता दूख बिनासनु पतित पावनु हरि नामु जीउ ॥
हरि सेवा भाई परम गति पाई हरि ऊतमु हरि हरि कामु जीउ ॥
हरि ऊतमु कामु जपीऐ हरि नामु हरि जपीऐ असथिरु होवै ॥
जनम मरण दोवै दुख मेटे सहजे ही सुखि सोवै ॥
हरि हरि किरपा धारहु ठाकुर हरि जपीऐ आतम रामु जीउ ॥
हरि हरि करता दूख बिनासनु पतित पावनु हरि नामु जीउ ॥1॥
हरि नामु पदारथु कलिजुगि ऊतमु हरि जपीऐ सतिगुर भाइ जीउ ॥
गुरमुखि हरि पड़ीऐ गुरमुखि हरि सुणीऐ हरि जपत सुणत दुखु जाइ जीउ ॥
हरि हरि नामु जपिआ दुखु बिनसिआ हरि नामु परम सुखु पाइआ ॥
सतिगुर गिआनु बलिआ घटि चानणु अगिआनु अंधेरु गवाइआ ॥
हरि हरि नामु तिनी आराधिआ जिन मसतकि धुरि लिखि पाइ जीउ ॥
हरि नामु पदारथु कलिजुगि ऊतमु हरि जपीऐ सतिगुर भाइ जीउ ॥2॥
हरि हरि मनि भाइआ परम सुख पाइआ हरि लाहा पदु निरबाणु जीउ ॥
हरि प्रीति लगाई हरि नामु सखाई भ्रमु चूका आवणु जाणु जीउ ॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। आसा छंत महला 4 घरु 2 ॥ (हे भाई !) जगत का रचयता परमात्मा (जीवों के) दुखों का नाश करने वाला है।उस परमात्मा का नाम विकारों में गिरे हुए जीवों को पवित्र करने वाला है। जिस मनुष्य को परमात्मा की सेवा-भक्ति प्यारी लगती है वह सबसे उच्च आत्मिक अवस्था हासिल कर लेता है।(हे भाई !) हरि नाम सिमरना सबसे श्रेष्ठ काम है।हरि-नाम सिमरना चाहिए। परमात्मा का नाम सिमरना सबसे उत्तम काम है।हरी-नाम सिमरना चाहिए (जो मनुष्य हरि-नाम सिमरता है वह विकारों के हमलों की ओर से) अडोल-चित्त हो जाता है। वह मनुष्य जनमों के चक्रों का दुख आत्मिक मौत का दुख- ये दोनों ही दुख मिटा लेता है।वह सदा आत्मिक अडोलता में आत्मिक आनंद में लीन रहता है। हे हरी ! हे मालिक ! कृपा कर।(हे भाई ! अगर परमात्मा कृपा करे तो) उस सर्व-व्यापक परमात्मा (का नाम) जपा जा सकता है। (हे भाई !) जगत को रचने वाला परमात्मा (जीवों के) दुख नाश करने वाला है।उस परमात्मा का नाम विकारों में गिरे हुए जीवों को पवित्र करने के योग्य है। 1। (हे भाई !) इस माया-ग्रसित जगत में (अन्य सभी पदार्थों के मुकाबले) परमात्मा का नाम श्रेष्ठ पदार्थ है।पर।ये हरि-नाम।गुरू के प्रेम में टिक के ही जपा जा सकता है। गुरू की शरण पड़ कर ही परमात्मा की सिफत सालाह वाली बाणी पढ़ी जा सकती है।गुरू की शरण में आ के ही सिफत सालाह की बाणी सुनी जा सकती है।परमात्मा का नाम जपते-सुनते हुए हरेक दुख दूर हो जाते हैं। जिस मनुष्य ने परमात्मा का नाम जपा उसके दुख नाश हो गए।जिस ने हरि-नाम (धन प्राप्त कर लिया) उसने सबसे ऊँचा आनंद पा लिया। गुरू की दी हुई आत्मिक जीवन की समझ जिस मनुष्य के अंदर जाग पड़ी (चमक गई) उसके हृदय में (सही जीवन का) प्रकाश हो गया।उसने अपने अंदर से अज्ञानता का अंधेरा दूर कर लिया। हे भाई ! उन मनुष्यों ने ही परमात्मा का नाम सिमरा है जिनके माथे पर परमात्मा ने धुर से सिमरन का लेख लिख के रख दिया है। (हे भाई !) इस माया-ग्रसित संसार में (अन्य सभी पदार्थों से) उत्तम परमात्मा का नाम है।पर ये हरि-नाम गुरू के प्यार में जुड़ के ही जपा जा सकता है। 2। (हे भाई !) जिस मनुष्य को परमात्मा (का नाम) मन में प्यारा लगने लगा उसने सबसे ऊँचा आत्मिक आनंद प्राप्त कर लिया।उसने वह आत्मिक अवस्था कमा ली जहाँ कोई वासना अपना असर नहीं डाल सकती। जिस मनुष्य ने प्रभू चरणों में प्रीति जोड़ी।हरि-नाम उसका सदा के लिए साथी बन गया।उसकी (माया वाली) भटकना समाप्त हो गई।उसके जनम-मरण का चक्र खत्म हो गया।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “उनका मानस जनम कामयाब हो जाता है उनका शरीर भी सफल हो जाता है क्योंकि उनके शरीर में परमात्मा का नाम प्रकाशमान हो जाता है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।