घर ही सो पिरु पाइआ सचै सबदि वीचारि ॥1॥ अवगण गुणी बखसाइआ हरि सिउ लिव लाई ॥ हरि वरु पाइआ कामणी गुरि मेलि मिलाई ॥1॥ रहाउ ॥ इकि पिरु हदूरि न जाणन॑ी दूजै भरमि भुलाइ ॥ किउ पाइनि॑ डोहागणी दुखी रैणि विहाइ ॥2॥ जिन कै मनि सचु वसिआ सची कार कमाइ ॥ अनदिनु सेवहि सहज सिउ सचे माहि समाइ ॥3॥ दोहागणी भरमि भुलाईआ कूड़ु बोलि बिखु खाहि ॥ पिरु न जाणनि आपणा सुंञी सेज दुखु पाहि ॥4॥ सचा साहिबु एकु है मतु मन भरमि भुलाहि ॥ गुर पूछि सेवा करहि सचु निरमलु मंनि वसाहि ॥5॥ सोहागणी सदा पिरु पाइआ हउमै आपु गवाइ ॥ पिर सेती अनदिनु गहि रही सची सेज सुखु पाइ ॥6॥ मेरी मेरी करि गए पलै किछु न पाइ ॥ महलु नाही डोहागणी अंति गई पछुताइ ॥7॥ सो पिरु मेरा एकु है एकसु सिउ लिव लाइ ॥ नानक जे सुखु लोड़हि कामणी हरि का नामु मंनि वसाइ ॥8॥11॥33॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: सदा स्थिर हरी की सिफतसालाह वाले गुर-शबद के द्वारा (प्रभू के गुणों को) विचार के उन्होंने प्रभू पति को अपने हृदय घर में ही पा लिया। 1। जिस जीव-स्त्री ने परमात्मा के चरणों में सुरति जोड़ ली उसने अपने (पहले किए) अवगुण।गुणों की बरकति से बख्शवा लिए। उस जीव-स्त्री ने प्रभू-पति का मिलाप हासिल कर लिया।गुरू ने उसको प्रभू चरणों में जोड़ दिया। 1।रहाउ। जो जीव-सि्त्रयां माया की भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ के प्रभू-पति को अंग-संग बसता नहीं समझतीं। वह दुर्भाग्यनियां प्रभू-पति को नहीं मिल सकतीं।उनकी (जिंदगी की सारी) रात दुखों में बीत जाती है। 2। सदा-स्थिर हरी की सिफत सालाह की कार कमा के जिनके मन में सदा-स्थिर हरी आ बसता है वह सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू में लीन हो के आत्मिक अडोलता से हर वक्त उस प्रभू की सेवा-भक्ति करती रहती हैं। 3। दुर्भाग्यशाली जीव-सि्त्रयां माया की भटकना के कारण गलत रास्ते पर पड़ जाती है वह (माया के मोह वाला ही) व्यर्थ बोल-बोल के (माया के मोह का) जहर खाती रहती है (जो उनके आत्मिक जीवन को समाप्त कर देता है)। वे कभी अपने प्रभू के साथ गहरी सांझ नहीं डालती।उनके हृदय की सेज सदा खाली पड़ी रहती है। 4। हे मेरे मन ! कहीं ऐसा ना हो कि आप माया की भटकना में पड़ के गलत रास्ते पर पड़ जाए (याद रख) सदा कायम रहने वाला सिर्फ एक मालिक प्रभू ही है। अगर आप गुरू की शिक्षा ले के उसकी सेवा-भक्ति करेगा।तो उस सदा-स्थिर पवित्र प्रभू को अपने अंदर बसा लेगा। 5। अच्छे भाग्यों वाली जीव-स्त्री अपने अंदर से अहंकार गवा के सदा-स्थिर प्रभू-पति को मिल जाती है। वह हर समय प्रभू-पति के चरणों से जुड़ी रहती है। उस (के हृदय) की सेज अडोल हो जाती है वह सदा आत्मिक आनंद पाती है। 6। हे भाई ! जो लोग यही कहते-कहते जगत से चले गए कि ये मेरी माया है ये मेरी मल्कियत है उनके हाथ-पल्ले कुछ भी ना पड़ा। दुर्भाग्यपूर्ण जीव-स्त्री को परमात्मा के चरणों में ठिकाना नहीं मिलता।वह दुनिया से आखिर हाथ मलती ही जाती है। 7। हे जीव-स्त्री ! सदा कायम रहने वाला प्रभू-पति सिर्फ एक ही है।उस एक के चरणों में सुरति जोड़े रख। हे नानक ! (कह) हे जीव-स्त्री ! अगर आप सुख हासिल करना चाहती है तो उस परमात्मा का नाम अपने मन में बसाए रख। 8। 11। 33।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ जिन्हें आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल परमात्मा ने (गुरू के द्वारा) खुद चखाया।उन्हें आत्मिक अडोलता में प्रेम में टिक के उसका स्वाद आ गया (उन्हें ये भी समझ आ गई कि) वह सदा-स्थिर प्रभू बे-मुथाज है उसे रत्ती भर भी (किसी किस्म की कोई) लालच नहीं। 1। हे भाई ! सदा-स्थिर रहने वाला और आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल (हर जगह) बरस रहा है।पर ये पड़ता है उन मनुष्यों के मुंह में जो गुरू के सन्मुख रहते हैं। आत्मिक अडोलता में टिक के हरी के गुण गा-गा के उनका मन सदा खिला रहता है। 1।रहाउ। (हे भाई !) अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-सि्त्रयां सदा दुर्भाग्यशाली रहतीं हैं वह प्रभू के दर पर खड़ी (हुई भी) बिलकती हैं। जिन्हें प्रभू पति के मिलाप का कभी स्वाद नहीं आया वे वही मनमुखता वाले कर्म कमाती रहती हैं जो धुर-दरगाह से उनके पिछले किए कर्मों के अनुसार उनके माथे पर लिखे हुए हैं। 2। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम (अपने हृदय-खेत में) बीजता है ये नाम ही वहीं पर उगता है।सदा स्थिर नाम को हीवह अपना वणज-व्यापार बनाता है। जिन मनुष्यों को प्रभू ने इस लाभशाली काम में लगाया है उन्हें अपनी भक्ति के खजाने दे देता है। 3। गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-सि्त्रयां सदा सौभाग्यशाली होती हैं।वे प्रभू के डर-अदब में रह कर प्रभू की भक्ति के द्वारा अपना आत्मिक जीवन सोहणा बनाती हैं। वे हर समय प्रभू-पति के मिलाप का आनंद लेती हैं।वे सदा-स्थिर हरी-नाम को अपने हृदय में टिका के रखती हैं। 4। हे भाई ! मैं कुर्बान जाता हूँ उनसे जिन्होंने प्रभू-पति के मिलाप को सदा पाया है। वे अपने अंदर से स्वै-भाव दूर करके सदा प्रभू-पति के चरणों में जुड़ी रहती हैं। 5। प्रभू-पति के प्रेम में प्यार में रहने वालियों का मन और हृदय ठंडा-ठार रहता है उनके मुंह (लोक-परलोक में) रौशन हो जाते हैं। अपने अंदर से अहंकार को तृष्णा को मार के उनकी हृदय सेज सुखदाई हो जाती है।प्रभू-पति (उस सेज पर) सदा आ के टिके रहते हैं। 6। गुरू की अपार मेहर की बरकति से प्रभू कृपा करके जिस जीव-स्त्री के हृदय-घर में आ बसता है वह सौभाग्यवती उस प्रभू-पति को मिल जाती है जो अपने जैसा एक स्वयं ही है। 7। हे भाई ! गुरू की शरण पड़ के जिस मनुष्य ने प्रभू की सिफत सालाह की।उसने (पिछले किए अपने) सारे पाप बख्शवा लिए।मिलाने की समर्था रखने वाले प्रभू ने उसे अपने चरणों में मिला लिया। हे नानक ! (कह,हे भाई ! प्रभू की सिफत सालाह के) बोल ही बोलने चाहिए जिसे सुन के वह प्रभू (हमारे साथ) प्यार करे। 8। 12। 34।
आसा महला 3 ॥ सतिगुर ते गुण ऊपजै जा प्रभु मेलै सोइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ जब प्रभू उस गुरू से मिला देता है तब गुरू से गुणों की दाति मिलती है।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “सदा स्थिर हरी की सिफतसालाह वाले गुर-शबद के द्वारा (प्रभू के गुणों को) विचार के उन्होंने प्रभू पति को अपने हृदय घर में ही पा लिया।”
इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।