ए मन रूड़॑े रंगुले तूं सचा रंगु चड़ाइ ॥ रूड़ी बाणी जे रपै ना इहु रंगु लहै न जाइ ॥1॥ रहाउ ॥ हम नीच मैले अति अभिमानी दूजै भाइ विकार ॥ गुरि पारसि मिलिऐ कंचनु होए निरमल जोति अपार ॥2॥ बिनु गुर कोइ न रंगीऐ गुरि मिलिऐ रंगु चड़ाउ ॥ गुर कै भै भाइ जो रते सिफती सचि समाउ ॥3॥ भै बिनु लागि न लगई ना मनु निरमलु होइ ॥ बिनु भै करम कमावणे झूठे ठाउ न कोइ ॥4॥ जिस नो आपे रंगे सु रपसी सतसंगति मिलाइ ॥ पूरे गुर ते सतसंगति ऊपजै सहजे सचि सुभाइ ॥5॥ बिनु संगती सभि ऐसे रहहि जैसे पसु ढोर ॥ जिनि॑ कीते तिसै न जाणन॑ी बिनु नावै सभि चोर ॥6॥ इकि गुण विहाझहि अउगण विकणहि गुर कै सहजि सुभाइ ॥ गुर सेवा ते नाउ पाइआ वुठा अंदरि आइ ॥7॥ सभना का दाता एकु है सिरि धंधै लाइ ॥ नानक नामे लाइ सवारिअनु सबदे लए मिलाइ ॥8॥9॥31॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे सोहणे मन ! हे रंगीले मन ! (आप अपने पर) सदा कायम रहने वाला नाम-रंग चढ़ा। (हे भाई !) अगर (ये मन) सोहणी सिफत सालाह की बाणी से रंगा जाए।तो (इस का) ये रंग कभी नहीं उतरता कभी दूर नहीं होता। 1।रहाउ। हे भाई ! माया के प्यार में विकारों में फस के हम जीव नीच गंदे आचरण वाले और अहंकारी बन जाते हैं। पारस गुरू को मिल के हम सोना बन जाते हैं।हमारे अंदर बेअंत प्रभू की पवित्र ज्योति जाग पड़ती है। 2। हे भाई ! गुरू की शरण पड़े बिना कोई मनुष्य (नाम-रंग से) रंगा नहीं जा सकता।अ्रगर गुरू मिल जाए तो ही नाम-रंग चढ़ता है। जो मनुष्य गुरू के भय-अदब से गुरू के प्रेम के द्वारा रंगे जाते हैं।सिफत सालाह की बरकति से सदा-स्थिर प्रभू में उनकी लीनता हैं जाती है। 3। हे भाई ! डर-अदब के बिना (मन रूपी कपड़े को) पाह नहीं लग सकती (पाह के बिना मन-कपड़े को पक्का प्रेम रंग नहीं चढ़ता) मन साफ-सुथरा नहीं हो सकता। इस डर-अदब के बिना (निहित धार्मिक) कर्म किए भी जाएं तो भी (मनुष्य झूठ का प्रेमी ही रहता है।और झूठे को प्रभू की हजूरी में) जगह नहीं मिलती। 4। हे भाई ! साध-संगति में ला के जिस मनुष्य (के मन) को परमात्मा स्वयं ही नाम-रंग चढ़ाता है वही रंगा जाएगा। साध-संगति पूरे गुरू के द्वारा ही मिलती है (जिसे मिलती है वह) आत्मिक अडोलता में।सदा स्थिर प्रभू में।प्रभू प्रेम में (मस्त रहता है)। 5। साध-संगति के बिना सारे मनुष्य पशुओं की तरह घूमते फिरते हैं। जिस परमात्मा ने उन्हें पैदा किया है उसके साथ सांझ नहीं डालते।उसके नाम के बिना सारे उसके चोर हैं। 6। (हे भाई !) कई मनुष्य ऐसे भी हैं जो गुरू के द्वारा आत्मिक अडोलता में टिके रहते हैं।प्रभू प्रेम में जुड़ते हैं।वे परमात्मा के गुण खरीदते हैं (गुणों के बदले) उनके अवगुण बिक जाते हैं (दूर हो जाते हैं)। गुरू की बताई सेवा की बरकति से वे प्रभू का नाम-सौदा प्राप्त कर लेते हैं।परमात्मा उनके अंदर आ बसता है। 7। (पर हे भाई ! किसी के वश की बात नहीं) परमात्मा खुद ही सब जीवों को सब कुछ देने वाला है।वह खुद ही हरेक जीव को धंधे में लगाता है। हे नानक ! उसने खुद ही अपने नाम में जोड़ के जीवों के जीवन सुंदर बनाए हैं उसने आप ही गुरू के शबद द्वारा जीवों को अपने चरणों में जोड़ा है। 8। 9। 31।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ (हे भाई ! दुखों में घबरा के) सारी दुनिया हरि-नाम की चाहत करती है।पर वही मनुष्य हरि-नाम प्राप्त करता है जिस पर प्रभू स्वयं मेहर करता है। हरि-नाम से टूटने पर (जगत में) निरा दुख ही दुख है।सुख सिर्फ उसे है जिसके मन में प्रभू अपना नाम बसाता है। 1। हे प्रभू ! आप बेअंत है।आप दया का श्रोत है।मैं आपकी शरण आया हूँ। (अगर आपकी मेहर हैं तो आपका नाम) पूरे गुरू से मिलता है।और आपके नाम की बरकति से (लोक-परलोक में) आदर मिलता है। 1।रहाउ। हे भाई ! परमात्मा ने ये कई रंगों की दुनिया पैदा की हुई है।हरेक के अंदर और सारी दुनिया में वह स्वयं ही बसता है। प्रभू अपने हुकम अनुसार ही सब जीवों से काम करवाता है।कोई और ऐसी समर्था वाला नहीं। 2। हे प्रभू ! समझ और बेसमझी।ये खेल तूने ही रची है।हरेक जीव ने वही करना है जो (आपकी सिर कार लिखी है) तूने उसके लिए फरमाया है (आपके ही हुकम में कोई समझ वाला और कोई बेसमझी वाला काम करता है)। कई जीवों पर आप बख्शिश करता है (और अपने चरणों में जोड़ लेता है) कई माया-ग्रसित जीवों को अपनी हजूरी में से धक्के मार के बाहर निकाल देता है। 3। हे प्रभू ! कई ऐसे हैं जिन्हें तूने धुर से ही पवित्र जीवन वाले बना दिया है।तूने उन्हें अपने नाम में जोड़ा हुआ है। गुरू की बताई सेवा से उन्हें आत्मिक आनंद मिलता है।गुरू उन्हें सदा-स्थिर हरि-नाम में जोड़ के (सही जीवन की) समझ बख्शता है। 4। हे भाई ! कई ऐसे मनुष्य हैं जो कुचरित्र हैं गंदे हैं दुराचारी हैं।उन्हें परमात्मा ने अपने नाम से तोड़ा हुआ है।उन्होंने जिंदगी में कामयाबी नहीं पाई। सद्-बुद्धि नहीं सीखी।वे अच्छी रहन-सहन (रहणी) वाले नहीं बने।डावाँ-डोल भटकते फिरते हैं। 5। हे भाई ! जिस मनुष्य पर प्रभू मेहर की निगाह करता है उसके अंदर अपने नाम की श्रद्धा पैदा करता है।उसको (गुरू के माध्यम से अपनी सिफत सालाह का) शबद सुनाता है। उसका मन पवित्र हो जाता है।सेवा करनी।संतोषी होना- वह मनुष्य इस किस्म की रहणी वाला बन जाता है। 6। (हे भाई ! प्रभू बेअंत गुणों का मालिक है उसके गुणों का) हिसाब करके (गुणों के आखीर तक कोई) पहुँच नहीं सकता।उसके गुण गिन-गिन के बयान कर-कर के गुणों की गिनती खत्म नहीं की जा सकती। उस प्रभू की कद्र-कीमति (सिर्फ) गुरू से ही मिलती है (कि वह बेअंत है बेअंत है)।गुरू अपने शबद में जोड़ता है।गुरू सदा-स्थिर हरि-नाम में जोड़ता है।और सूझ बख्शता है। 7। हे भाई ! आप अपने इस मन को खोज।अपने शरीर को खोज।गुरू के शबद में जुड़ के विचार कर। सारे सुखों का खजाना हरि-नाम शरीर में ही है।गुरू की अपार मेहर से ही मिलता है। 8। 10। 32।
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ जिन सुहागिन जीव-सि्त्रयों ने गुरू के शबद द्वारा अपना जीवन सुंदर बना लिया।वह सदा-स्थिर प्रभू के नाम-रंग में रंगी गई।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे सोहणे मन ! हे रंगीले मन ! (आप अपने पर) सदा कायम रहने वाला नाम-रंग चढ़ा।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।