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अंग 421

अंग
421
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जेही सेव कराईऐ करणी भी साई ॥
आपि करे किसु आखीऐ वेखै वडिआई ॥7॥
गुर की सेवा सो करे जिसु आपि कराए ॥
नानक सिरु दे छूटीऐ दरगह पति पाए ॥8॥18॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: (पर जीवों के भी क्या वश।) परमात्मा ने जिस तरह के काम में जीव को लगाना है।जीव ने उसी काम में लगना है। परमात्मा खुद ही (सृष्टि) रच के खुद ही इसकी संभाल करता है।ये उसकी अपनी ही बुजुर्गीयत है।(उसके बिना) और किसी के आगे पुकार नहीं की जा सकती। 7। हे नानक ! गुरू की बताई सेवा भी वही मनुष्य करता है जिससे परमात्मा खुद ही कराता है (नहीं तो ये माया का मोह बड़ा ही प्रबल है) स्वैभाव गवा के ही इससे छुटकारा मिलता है। जो मनुष्य अपना सिर (गुरू के) हवाले करता है।वह परमात्मा की हजूरी में आदर-मान प्राप्त करता है। 8। 18।
आसा महला 1 ॥
रूड़ो ठाकुर माहरो रूड़ी गुरबाणी ॥
वडै भागि सतिगुरु मिलै पाईऐ पदु निरबाणी ॥1॥
मै ओल॑गीआ ओल॑गी हम छोरू थारे ॥
जिउ तूं राखहि तिउ रहा मुखि नामु हमारे ॥1॥ रहाउ ॥
दरसन की पिआसा घणी भाणै मनि भाईऐ ॥
मेरे ठाकुर हाथि वडिआईआ भाणै पति पाईऐ ॥2॥
साचउ दूरि न जाणीऐ अंतरि है सोई ॥
जह देखा तह रवि रहे किनि कीमति होई ॥3॥
आपि करे आपे हरे वेखै वडिआई ॥
गुरमुखि होइ निहालीऐ इउ कीमति पाई ॥4॥
जीवदिआ लाहा मिलै गुर कार कमावै ॥
पूरबि होवै लिखिआ ता सतिगुरु पावै ॥5॥
मनमुख तोटा नित है भरमहि भरमाए ॥
मनमुखु अंधु न चेतई किउ दरसनु पाए ॥6॥
ता जगि आइआ जाणीऐ साचै लिव लाए ॥
गुर भेटे पारसु भए जोती जोति मिलाए ॥7॥
अहिनिसि रहै निरालमो कार धुर की करणी ॥
नानक नामि संतोखीआ राते हरि चरणी ॥8॥19॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ हे ठाकुर ! आप सुन्दर है।आप सयाना है।गुरू की सुंदर बाणी से (आपकी प्राप्ति हैं सकती है)। बड़ी किस्मत से गुरू मिलता है।(और गुरू के मिलने से) वासना-रहित आत्मिक अवस्था मिलती है। 1। (हे प्रभू !) मैं आपके दासों का दास हूँ।मैं आपका छोटा सा सेवक हूँ। (मेहर कर) मैं उसी तरह जीऊँ जैसे आपकी रजा हैं।मेरे मुँह में अपना नाम दे। 1।रहाउ। प्रभू की रजा में (जीव के अंदर) उसके दर्शन की तीव्र चाहत पैदा होती है।उसकी रजा के अनुसार ही वह जीव के मन को प्यारा लगने लग जाता है। प्यारे ठाकुर के हाथ में ही सारी वडिआईआं है।उसकी रजा अनुसार ही (जीव को उसके दर पर) इज्जत मिलती है। 2। सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा को (कहीं) दूर (बैठा) नहीं समझना चाहिए।हरेक जीव के अंद रवह खुद ही (बस रहा) है। मैं जिधर देखता हूँ।उधर ही प्रभू भरपूर है।पर किसी जीव द्वारा उसका मूल्य नहीं आँका जा सकता। 3। परमात्मा खुद ही उसारता है खुद ही गिराता है।(अपनी ये) ताकत वह खुद ही देख रहा है। गुरू के सन्मुख हो के उसका दर्शन कर सकते हैं और इस तरह उसका मूल्य पड़ सकता है (कि वह हर जगह मौजूद है)। 4। जो मनुष्य गुरू की बताई हुई कार कता है उसको इसी जीवन में परमात्मा का नाम-लाभ मिल जाता है।पर। गुरू भी तब ही मिलता है यदि पिछले जन्मों में किए हुए अच्छे कर्मों के संस्कार (अंदर) मौजूद हों। 5। अपने मन के पीछे चलने वाले बंदों के आत्मिक गुणों में नित्य कमी होती रहती है।(माया के) भटकाए हुए वह (नित्य) भटकते रहते हैं। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया में) अंधा हो जाता है।वह परमात्मा को याद नहीं करता।उसे परमात्मा के दर्शन कैसे हों। 6। तब ही किसी को जगत में जन्मा समझो।जब वह सदा स्थिर प्रभू (के चरणों में) सुरति जोड़ता हैं। जो मनुष्य गुरू को मिल जाते हैं वह पारस बन जाते हैं।उनकी ज्योति परमात्मा की ज्योति में मिली रहती है। 7। हे नानक ! प्रभू के नाम में जुड़े हुए बंदे संतोष वाला जीवन गुजारते हैं।उस परमात्मा के चरणों में रंगे रहते हैं। जो जो मनुष्य धुर से मिली (सिमरन की) कार करते हैं वह सदा निर्मल अवस्था में रहते हैं। 8। 19।
आसा महला 1 ॥
केता आखणु आखीऐ ता के अंत न जाणा ॥
मै निधरिआ धर एक तूं मै ताणु सताणा ॥1॥
नानक की अरदासि है सच नामि सुहेला ॥
आपु गइआ सोझी पई गुर सबदी मेला ॥1॥ रहाउ ॥
हउमै गरबु गवाईऐ पाईऐ वीचारु ॥
साहिब सिउ मनु मानिआ दे साचु अधारु ॥2॥
अहिनिसि नामि संतोखीआ सेवा सचु साई ॥
ता कउ बिघनु न लागई चालै हुकमि रजाई ॥3॥
हुकमि रजाई जो चलै सो पवै खजानै ॥
खोटे ठवर न पाइनी रले जूठानै ॥4॥
नित नित खरा समालीऐ सचु सउदा पाईऐ ॥
खोटे नदरि न आवनी ले अगनि जलाईऐ ॥5॥
जिनी आतमु चीनिआ परमातमु सोई ॥
एको अंम्रित बिरखु है फलु अंम्रितु होई ॥6॥
अंम्रित फलु जिनी चाखिआ सचि रहे अघाई ॥
तिंना भरमु न भेदु है हरि रसन रसाई ॥7॥
हुकमि संजोगी आइआ चलु सदा रजाई ॥
अउगणिआरे कउ गुणु नानकै सचु मिलै वडाई ॥8॥20॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (परमात्मा बेअंत गुणों का मालिक है) उसके गुणों का भले ही कितना ही बयान किया जाए।मैं अंत नहीं जान सकता। (हे प्रभू ! मेरी तो नित्य यही अरदास है) कि निआसरे का सिर्फ आप ही आसरा है।और आप ही मुझ शक्तिहीन (निताणे) का तगड़ा ताण (मजबूत शक्ति) है। 1। (प्रभू की हजूरी में) नानक की ये अरदास है, मैं सदा स्थिर प्रभू के नाम में (जुड़ के) सुखी रहूँ (भाव।मैं परमात्मा की याद में रहके आत्मिक आनंद हासिल करूँ)। जो मनुष्य अपने अंदर से स्वैभाव (अहंकार का भाव) गवाता है उसे (इस तरह की अरदास करने की) समझ पड़ जाती है और गुरू के शबद के द्वारा (परमात्मा से उसका) मिलाप हो जाता है। 1।रहाउ। ‘मैं बड़ा मैं बड़ा’-जब ये अहंकार (अपने अंदर से) दूर कर दें।तब (परमात्मा के दर पर अरदास करने की) समझ पड़ती है। जब परमात्मा के साथ जीव का मन लग जाता है।तब वह प्रभू उसको अपना सदा-स्थिर नाम (का जीवन के वास्ते) आसरा देता है। 2। सदा स्थिर प्रभू वही सेवा (कबूल करता है।जिसकी बरकति से जीव) दिन-रात प्रभू के नाम में (जुड़ के) संतोषी जीवन बनाता है। जो मनुष्य रजा के मालिक प्रभू के हुकम में चलता है।उसे (जीवन सफर में माया के मोह आदि की) कोई रोक नहीं पड़ती। 3। जो मनुष्य रजा के मालिक परमात्मा के हुकम में चलता है वह (खरा सिक्का बन के) प्रभू के खजाने में पड़ता है। खोटे सिक्कों को (खोटे जीवन वालों को प्रभू के खजाने में) जगह नहीं मिलती।वह तो खोटों में मिले रहते हैं। 4। (हे भाई !) सदा ही उस परमात्मा को अपने दिल में संभाल के रखो जिस पर माया के मोह की रत्ती भर भी मैल नहीं।इस तरह वह सौदा (खरीद) लेते हैं जो हमेशा के लिए है।जो हमेशा मिला रहता है। खोटे सिक्के परमात्मा की नजर नहीं चढ़ते।खोटे सिक्कों को उनकी सिलावट आदि की मैल जलाने के लिए आग में डाल के तपाते हैं। 5। जिन लोगों ने अपने आत्मिक जीवन को परखा-पहचाना है वही लोग परमात्मा को पहचान लेते हैं। (वे समझ लेते हैं कि) एक परमात्मा ही आत्मिक जीवन रूपी फल देने वाला वृक्ष है।उस प्रभू-वृक्ष का फल सदा अमृत-रूप है। 6। जिन मनुष्यों ने आत्मिक जीवन देने वाला नाम-फल चख लिया।वह (सदा) सदा स्थिर प्रभू के नाम में जुड़ के (और स्वादों से) तृप्त रहते हैं। उन्हें (माया आदि की कोई) भटकना नहीं रहती। उनकी परमात्मा से कोई दूरी नहीं रहती।उनकी जीभ परमात्मा के नाम रस में रसी रहती है। 7। (हे जीव !) आप परमात्मा के हुकम में (अपने किए कर्मों के) संजोगों के अनुसार (जगत में) आया है।सदा उसकी रजा में ही चल (और नाम की दाति मांग।इसी में आपकी भलाई है)। (मुझे) गुण-हीन नानक को सदा-स्थिर परमात्मा (का सिमरन रूप) गुण मिल जाए (मैं नानक इसी बख्शिश को सबसे ऊँची) बडिआई समझता हूँ। 8। 20।
आसा महला 1 ॥
मनु रातउ हरि नाइ सचु वखाणिआ ॥
लोका दा किआ जाइ जा तुधु भाणिआ ॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जिस मनुष्य का मन परमात्मा के नाम (-रंग) में रंगा जाए।जो मनुष्य सदा कायम रहने वाले परमात्मा की सिफत सालाह करे (वह परमात्मा को प्यारा लगता है)।(और। हे प्रभू !) जब (आपकी सेवा-भक्ति के कारण कोई भाग्यशाली जीव) आपको प्यारा लगने लग पड़े तो इसमें लोगों का कुछ नहीं बिगड़ता (क्योंकि आपकी सिफत सालाह करने वाला आपके पैदा किए बंदों का दोखी हैं ही नहीं सकता)। 1।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे।

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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