गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: जो परमात्मा (शुद्ध) सोने जैसी पवित्र हस्ती वाला है।जो सिर्फ प्रकाश ही प्रकाश है। जिस जैसा और कोई नहीं।जो तीन भवनों का मालिक है।ये सारा आकार जिस का (सरगुण) स्वरूप है। उस परमात्मा का सदा-स्थिर और कभी ना समाप्त होने वाला नाम-धन मुझे (गुरू-सर्राफ से) प्राप्त हुआ है। 4। जो परमात्मा पाँचों तत्वों में।माया के तीनों गुणों में।नौ खण्डों में और चारें कुंटों में व्यापक है। जो धरती और आकाश को अपनी सत्ता के आसरे (अपनी जगह पर) टिकाए रखता है। गुरू सर्राफ मनुष्य के बाहर दिखाई देते आकार की ओर दौड़ते मन को उस परमात्मा की ओर पलट के लाता है। 5। (गुरू-सर्राफ बताता है कि परमात्मा सारी सृष्टि में रमा हुआ है।पर) वह मनुष्य मूर्ख है जिसे आँखों से (प्रभू) नहीं दिखाई देता। जिसकी जीभ में (प्रभू का) नाम-रस नहीं आया।जो गुरू के बताए उपदेश को नहीं समझता। वह मनुष्य विषौली माया में मस्त हो के जगत से झगड़े मोल लेता है। 6। गुरू की श्रेष्ठ संगति की बरकति से मनुष्य श्रेष्ठ जीवन वाला बन जाता है। आत्मिक गुणों की प्राप्ति के लिए दौड़-भाग करता है और (अपने अंदर से नाम-अमृत की सहायता से) अवगुणों को धो देता है। (ये बात यकीनन है कि) गुरू द्वारा बताई हुई सेवा किए बिना (अवगुणों से निजात नहीं मिलती।और) अडोल आत्मिक अवस्था नहीं मिलती। 7। हीरा-जवाहर और लाल मोती (जैसा सुच्चा-स्वच्छ) मन परमात्मा का नाम उस मनुष्य की राशि-पूँजी बन जाती है। हे नानक ! गुरू-सर्राफ जिस मनुष्य को मेहर की नजर से देखता है वह निहाल हो जाता है। 8। 5।
आसा महला 1 ॥ गुरमुखि गिआनु धिआनु मनि मानु ॥ गुरमुखि महली महलु पछानु ॥ गुरमुखि सुरति सबदु नीसानु ॥1॥ ऐसे प्रेम भगति वीचारी ॥ गुरमुखि साचा नामु मुरारी ॥1॥ रहाउ ॥ अहिनिसि निरमलु थानि सुथानु ॥ तीन भवन निहकेवल गिआनु ॥ साचे गुर ते हुकमु पछानु ॥2॥ साचा हरखु नाही तिसु सोगु ॥ अंम्रितु गिआनु महा रसु भोगु ॥ पंच समाई सुखी सभु लोगु ॥3॥ सगली जोति तेरा सभु कोई ॥ आपे जोड़ि विछोड़े सोई ॥ आपे करता करे सु होई ॥4॥ ढाहि उसारे हुकमि समावै ॥ हुकमो वरतै जो तिसु भावै ॥ गुर बिनु पूरा कोइ न पावै ॥5॥ बालक बिरधि न सुरति परानि ॥ भरि जोबनि बूडै अभिमानि ॥ बिनु नावै किआ लहसि निदानि ॥6॥ जिस का अनु धनु सहजि न जाना ॥ भरमि भुलाना फिरि पछुताना ॥ गलि फाही बउरा बउराना ॥7॥ बूडत जगु देखिआ तउ डरि भागे ॥ सतिगुरि राखे से वडभागे ॥ नानक गुर की चरणी लागे ॥8॥6॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ (हे भाई ! आप) गुरू के सन्मुख हैं के अपने मन में परमात्मा के साथ गहरी सांझ और परमात्मा में जुड़ी सुरति (का आनंद) ले। गुरू की शरण पड़ के आप अपने अंदर प्रभू का ठिकाना पहचान। गुरू के सन्मुख रहके आप गुरू के शबद को अपने सोच-मण्डल में टिका।(ये आपकी जीवन-यात्रा के लिए) राहदारी है। 1। इस तरह प्रभू चरणों से प्रेम और परमात्मा की भक्ति करके वह ऊँचे विचारों का मालिक बन जा गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम प्राप्त हो जाता है। 1।रहाउ। (जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रहता है वह) दिन-रात अपने हृदय-स्थल में परमात्मा का पवित्र श्रेष्ठ डेरा बनाए रखता है। तीनों भवनों में व्यापक और वासना-रहित प्रभू के साथ उसकी गहरी सांझ पड़ जाती है। (हे भाई ! आप भी) अभॅुल गुरू से (भाव।शरण पड़ के) परमात्मा की रजा को समझ। 2। (जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है उसके) अंदर स्थिर आनंद बनारहता है।उसे कभी कोई चिंता नहीं छूती। परमात्मा का आत्मिक जीवन देने वाले श्रेष्ठ रस का नाम और परमात्मा के साथ गहरी सांझ उस मनुष्य का आत्मिक भोजन बन जाता है। (अगर गुरू की शरण पड़ के) जगत कामादिक पाँचों को खत्म कर दे तो सारा जगत ही सुखी हो जाए। 3। (गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य इस प्रकार अरदास करता है, हे प्रभू !) सारी सृष्टि में आपकी ही ज्योति (प्रकाश कर रही है।हरेक जीव आपका ही पैदा किया हुआ) है। (गुरमुखि को ये पक्का निश्चय होता है कि) परमात्मा स्वयं ही जीवों के संजोग बनाता है।और स्वयं ही फिर विछोड़े डाल देता है। जो कुछ करतार स्वयं ही करता है वही होता है। 4। (गुरमुखि को यकीन हो जाता है कि) परमात्मा स्वयं ही सारी सृष्टि को गिरा के स्वयं ही दुबारा उसकी सृजना करता है।उसके हुकम के अनुसार ही जगत दुबारा उसमें लीन हो जाता है। जो उसको अच्छा लगता है उसके अनुसार उसका हुकम चलता है। गुरू की शरण आए बिना कोई भी जीव पूरन परमात्मा को प्राप्त नहीं कर सकता। 5। (जिस प्राणी की सुरति) ना बाल अवस्था में ना वृद्ध अवस्था में (और ना ही जवानी के समय) कभी भी परमात्मा में नहीं जुड़ती। (बल्कि) भरी-जवानी में वह (जवानी के) अहंकार में डूबा रहता है। वह परमात्मा के नाम से टूट के आखिर (यहाँ से) क्या कमाएगा। 6। जिस परमात्मा का दिया हुआ अंन्न और धन जीव इस्तेमाल करता रहता है। अगर अडोल अवस्था में टिक के उससे कभी भी सांझ भी नहीं डालता और माया की भटकना में असल जीवन-राह भटका रहता है।तो आखिर पछताता है। उसके गले में मोह की फांसी लगी रहती है।मोह में ही वह सदा झल्ला हुआ फिरता है। 7। वह जगत को (मोह में) डूबता देख के (मोह से) डर के भाग जाते हैं। वह बड़े भाग्यशाली हैं।सतिगुरू ने उन्हें (मोह की कैद से) बचा लिया है। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू के चरणों में लगते हैं।8। 6।
आसा महला 1 ॥ गावहि गीते चीति अनीते ॥ राग सुणाइ कहावहि बीते ॥ बिनु नावै मनि झूठु अनीते ॥1॥ कहा चलहु मन रहहु घरे ॥ गुरमुखि राम नामि त्रिपतासे खोजत पावहु सहजि हरे ॥1॥ रहाउ ॥ कामु क्रोधु मनि मोहु सरीरा ॥ लबु लोभु अहंकारु सु पीरा ॥ राम नाम बिनु किउ मनु धीरा ॥2॥ अंतरि नावणु साचु पछाणै ॥ अंतर की गति गुरमुखि जाणै ॥ साच सबद बिनु महलु न पछाणै ॥3॥ निरंकार महि आकारु समावै ॥ अकल कला सचु साचि टिकावै ॥ सो नरु गरभ जोनि नही आवै ॥4॥ जहां नामु मिलै तह जाउ ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 1 ॥ जो मनुष्य (दूसरों को सुनाने के लिए ही भक्ति के) गीत गाते हैं,पर उनके चित्त में बुरे ख्याल (मौजूद) हैं; जो (औरों को) राग (द्वैष से बचने की बातें) सुना के कहलवाते हैं कि हम राग-द्वैष से बचे हुए हैं। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना उनके मन में झूठ (बसता) है।उनके मन में कुकर्म (टिके हुए) हैं। 1। (औरों को समझ देने वाले) हे मन ! आप (कुकर्मों में) क्यूँ भटक रहा है।अपने अंदर ही टिका रह। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख होते हैं वे परमात्मा के नाम में जुड़ के (विकारों की ओर से) हट जाते हैं।हे मन ! आप भी गुरू के द्वारा तलाश करके सहज अवस्था में टिक के परमात्मा को पा लेगा। 1।रहाउ। जिस मनुष्य के मन में शरीर में काम है।क्रोध है मोह है। जिसके अंदर लब (लालच) है।लोभ है अहंकार है (जिसके अंदर इन विकारों का) कलेश है। परमात्मा का नाम सिमरन के बिना उसका मन (इनका मुकाबला करने का) कैसे हौसला कर सकता है। 2। जो मनुष्य अपने अंदर सदा स्थिर प्रभू के साथ सांझ पा लेता है।वह अपनी आत्मा में (तीर्थ-) स्नान कर रहा है। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ के अपनी अंदरूनी आत्मिक अवस्था को समझ लेता है। (पर गुरू के) सच्चे शबद के बिना परमात्मा का ठिकाना कोई मनुष्य नहीं पहचान सकता। 3। जो मनुष्य दिखाई देते संसार को अदृश्य प्रभू में लीन कर लेता है (भावअपनी बिरती को बाहर से रोक के अंदर ले आता है;) जिस प्रभू की सत्ता गिनती-मिनती से परे है वह सदा स्थिर प्रभू को जो मनुष्य सिमरन द्वारा अपने हृदय में टिकाता है। वह मनुष्य जनम-मरण के चक्कर में नहीं आता। 4। (इस वास्ते मेरी ये अरदास है कि) जहाँ (गुरू की संगति में से) मुझे परमातमा का नाम मिल जाए।मैं वहीं जाऊँ।
आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो परमात्मा (शुद्ध) सोने जैसी पवित्र हस्ती वाला है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।