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अंग 366

अंग
366
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रागु आसा घरु 2 महला 4 ॥
किस ही धड़ा कीआ मित्र सुत नालि भाई ॥
किस ही धड़ा कीआ कुड़म सके नालि जवाई ॥
किस ही धड़ा कीआ सिकदार चउधरी नालि आपणै सुआई ॥
हमारा धड़ा हरि रहिआ समाई ॥1॥
हम हरि सिउ धड़ा कीआ मेरी हरि टेक ॥
मै हरि बिनु पखु धड़ा अवरु न कोई हउ हरि गुण गावा असंख अनेक ॥1॥ रहाउ ॥
जिन॑ सिउ धड़े करहि से जाहि ॥
झूठु धड़े करि पछोताहि ॥
थिरु न रहहि मनि खोटु कमाहि ॥
हम हरि सिउ धड़ा कीआ जिस का कोई समरथु नाहि ॥2॥
एह सभि धड़े माइआ मोह पसारी ॥
माइआ कउ लूझहि गावारी ॥
जनमि मरहि जूऐ बाजी हारी ॥
हमरै हरि धड़ा जि हलतु पलतु सभु सवारी ॥3॥
कलिजुग महि धड़े पंच चोर झगड़ाए ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु वधाए ॥
जिस नो क्रिपा करे तिसु सतसंगि मिलाए ॥
हमरा हरि धड़ा जिनि एह धड़े सभि गवाए ॥4॥
मिथिआ दूजा भाउ धड़े बहि पावै ॥
पराइआ छिद्रु अटकलै आपणा अहंकारु वधावै ॥
जैसा बीजै तैसा खावै ॥
जन नानक का हरि धड़ा धरमु सभ स्रिसटि जिणि आवै ॥5॥2॥54॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। रागु आसा घरु 2 महला 4 ॥ किसी मनुष्य ने अपने मित्र से पुत्र से भाई से साथ बनाया हुआ है। किसी ने अपने सके संबंधी के साथ जवाई के साथ धड़ा बनाया हुआ है। किसी मनुष्य ने अपनी गरज़ की खातिर (गाँव के) सरदार चौधरी के साथ धड़ा बनाया हुआ है; पर मेरा साथी वह परमात्मा है जो हर जगह मौजूद है। 1। हमने परमात्मा के साथ। साथ बनाया है। परमात्मा ही मेरा आसरा है। परमात्मा के बिना मेरा और कोई पक्ष नहीं धड़ा नहीं। मैं परमात्मा के ही अनेकों और अनगिनत गुण गाता रहता हूँ। 1। रहाउ। लोग जिनके साथ धड़े बनाते हैं वह (आख़िर जगत से) कूच कर जाते हैं। (धड़े बनाने वाले ये) झूठा आडंबर करके ये धड़े बना के (उनके मरने पे) पछताते हैं। (धड़े बनाने वाले खुद भी) सदा (दुनिया में) टिके नहीं रहते। (व्यर्थ ही धड़ों की खातिर अपने) मन में ठॅगी-फरेब करते रहते हैं। पर। मैंने तो उस परमात्मा के साथ अपना साथ बनाया है जिसके बराबर की ताकत रखने वाला और कोई नहीं। 2। (हे भाई ! दुनिया के) ये सारे धड़े माया का पसारा हैं। (धड़े बनाने वाले) मूर्ख लोग माया की खातिर ही (आपस में) लड़ते रहते हैं। (इस कारण वह बार-बार) पैदा होते हैं मरते हैं। वह (मानो) जूए में ही (मानस जीवन की) बाजी हार के चले जाते हैं (जिस में से हासिल कुछ नहीं होता)। पर मेरे साथ तो साथी है परमात्मा। जो मेरा लोक और परलोक सब कुछ सँवारने वाला है। 3। परमात्मा से विछुड़ के (कलियुगी स्वभाव में फंस के) मनुष्यों के धड़े बनते हैं। कामादिक पाँचों चोरों के कारण झगड़े पैदा होते हैं। (परमात्मा से विछोड़ा मनुष्यों के अंदर) काम-क्रोध-लोभ-मोह व अहंकार को बढ़ाता है। जिस मनुष्य पर परमात्मा मेहर करता है उसे साध-संगति में मिलाता है (और वह इन पाँचों चोरों की मार से बचता है)। (हे भाई !) मेरी मदद के लिए परमात्मा स्वयं है जिसने (मेरे अंदर से) ये सारे धड़े खत्म कर दिए हैं। 4। (परमात्मा को छोड़ के) माया का झूठा प्यार (मनुष्य के अंदर) टिक के धड़े (-बाजियां) पैदा करता है (माया के मोह के प्रभाव तले मनुष्य) औरों के ऐब जाँचता-फिरता है और (इस तरह अपने आप को अच्छा समझ के) अपना ही अहंकार बढ़ाता है। (औरों के ऐब फरोल के और अपने आप को नेक साबित कर-करके मनुष्य अपने आत्मिक जीवन के वास्ते) जैसा बीज बीजता है वैसे ही फल हासिल करता है। दास नानक का पक्ष करने वाला साथी तो परमात्मा है (परमात्मा का आसरा ही नानक का) धरम है (जिसकी बरकति से मनुष्य) सारी सृष्टि को जीत के आ सकता है। 5। 2। 54।
आसा महला 4 ॥
हिरदै सुणि सुणि मनि अंम्रितु भाइआ ॥
गुरबाणी हरि अलखु लखाइआ ॥1॥
गुरमुखि नामु सुनहु मेरी भैना ॥
एको रवि रहिआ घट अंतरि मुखि बोलहु गुर अंम्रित बैना ॥1॥ रहाउ ॥
मै मनि तनि प्रेमु महा बैरागु ॥
सतिगुरु पुरखु पाइआ वडभागु ॥2॥
दूजै भाइ भवहि बिखु माइआ ॥
भागहीन नही सतिगुरु पाइआ ॥3॥
अंम्रितु हरि रसु हरि आपि पीआइआ ॥
गुरि पूरै नानक हरि पाइआ ॥4॥3॥55॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे बहनो !) गुरू की बाणी सुन के जिस मनुष्य के हृदय में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल प्यारा लगने लग जाता है। गुरबाणी की बरकति से वह मनुष्य अदृष्ट परमात्मा के दर्शन कर लेता है। 1। हे मेरी बहनो ! गुरू की शरण पड़ के उस परमात्मा का नाम सुना करो जो स्वयं ही हरेक जीव के शरीर में मौजूद है। (हे मेरी बहनो !) मुंह से आत्मिक जीवन देने वाले शबद बोला करो। 1। रहाउ। मेरे मन में हृदय में परमात्मा के लिए प्यार पैदा हो गया है परमात्मा के लिए बड़ी लगन पैदा हो गई है (हे बहनो !) परमात्मा का रूप व भाग्यशाली सतिगुरू तो मुझे भी मिल गया है । 2। (पर। हे बहनो !) वे माया के मोह में फंस के माया की खातिर भटकते फिरते हैं जो उनके लिए आत्मिक मौत का कारण बनती है बद-नसीब हैं वे मनुष्य जिन्हें गुरू नहीं मिला । 3। हे नानक ! (जीव के वश की बात नहीं) परमात्मा ने स्वयं ही जिस मनुष्य को आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल हरि-नाम-रस पिला दिया उ सने पूरे गुरू के द्वारा उस परमात्मा को ढूँढ लिया। 4। 3। 55।
आसा महला 4 ॥
मेरै मनि तनि प्रेमु नामु आधारु ॥
नामु जपी नामो सुख सारु ॥1॥
नामु जपहु मेरे साजन सैना ॥
नाम बिना मै अवरु न कोई वडै भागि गुरमुखि हरि लैना ॥1॥ रहाउ ॥
नाम बिना नही जीविआ जाइ ॥
वडै भागि गुरमुखि हरि पाइ ॥2॥
नामहीन कालख मुखि माइआ ॥
नाम बिना ध्रिगु ध्रिगु जीवाइआ ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 ॥ (हे मेरे सज्जनों मित्रो !) परमात्मा का प्यार और परमात्मा का नाम (ही) मेरे मन का मेरे हृदय का आसरा है। मैं (सदा प्रभू का) नाम जपता रहता हूँ। नाम ही (मेरे वास्ते सारे) सुखों का मूल है। 1। हे मेरे सज्जनों ! हे मेरे मित्रो ! परमात्मा का नाम जपा करो। परमात्मा के नाम के बिना मुझे (तो जिंदगी का) और कोई (आसरा) दिखाई नहीं देता। ये हरी-नाम बड़ी किस्मत से गुरू के द्वारा ही मिल सकता है। 1। रहाउ। (हे मेरे मित्रो !) परमात्मा का नाम जपे बिना आत्मिक जीवन नहीं मिल सकता। ये हरी-नाम बड़ी ही किस्मत से गुरू के माध्यम से ही मिलता है। 2। परमात्मा के नाम से वंचित रहने से माया के (मोह के) कारण मुंह पर कालिख़ लगती है। (हे मेरे मित्रो !) परमात्मा को सिमरे बिना जीवन धिक्कारयोग्य है। 3।

आसा राग सुबह की पहली रोशनी का है, उम्मीद से भरा, चलने को तैयार। आसा का अर्थ ही ‘आशा’ है। ‘आसा दी वार’ सिख परम्परा की सुबह-कीर्तन का केन्द्र-स्तम्भ रही है, चार-पाँच सदियों से। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।