अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: असल भक्ति यही है कि (जिसकी बरकति से) मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के मोह से अछोह हो जाता है। और गुरू की कृपा से संसार-समुंद्र (के विकारों की लहरों) से पार लांघ जाता है। गुरू के उपदेश अनुसार की हुई भगती (प्रभू के दर पर) परवान होती है। प्रभू स्वयं ही मनुष्य के मन में आ बसता है। 4। (पर।जीव के भी क्या वश। जिस मनुष्य पर) परमात्मा मेहर करता है उसे गुरू मिलाता है (गुरू की सहायता से) वह ना डोलने वाली भक्ति करता है और परमात्मा से अपना चित्त जोड़े रखता है। हे नानक ! जो मनुष्य (परमात्मा की) भक्ति (के रंग) में रंगे जाते हैं उन्हें सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। परमात्मा के नाम-रंग में रंगे हुओं को आत्मिक आनंद मिलता है। 5। 12। 51।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: आसा घरु 8 काफी महला 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) परमात्मा की रजा अनुसार गुरू मिलता है (जिसे गुरू मिल जाता है। उसे) सदा कायम रहने वाला प्रभू मिल जाता है। (और उसे सही जीवन-जुगति की) समझ आ जाती है। जिस मनुष्य के मन में गुरू की किरपा से परमातमा आ बसता है। वही मनुष्य परमात्मा के साथ सांझ पाता है। 1। (हे भाई !) एक परमात्मा ही मेरा पति रक्षक है और मुझे सब दातें देने वाला है। उसके बिना मेरा और कोई नहीं। पर गुरू की मेहर से हीवह मन में बस सकता है (और जब वह प्रभू मन में आ बसता है) तब सदा के लिए आनंद बन जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) इस जगत में परमात्मा का नाम ही है जो (जगत के) सारे डरों से बचाने वाला है। पर ये नाम गुरू की बताई हुई विचार की बरकति से मिलता है। परमात्मा के नाम के बिना अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री आत्मिक मौत के काबू में रहती है। माया के मोह में अंधी हुई रहती है और मूर्खता में टिकी रहती है। 2। जो मनुष्य परमात्मा की रज़ा में चलता है वही मनुष्य परमात्मा की सेवा-भक्ति करता है। वही उस सदा स्थिर प्रभू को समझता है। परमात्मा की रजा में चलने से ही परमात्मा की सिफत सालाह हो सकती है। अगर परमात्मा की रजा में चलें तो ही आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 3। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) परमात्मा की रज़ा में चल के मानस जन्म का मनोरथ हासिल कर लिया उसकी बुद्धि उत्तम बन गई। हे नानक ! (गुरू की शरण पड़ के) आप भी परमात्मा के नाम का गुणगान कर। गुरू की शरण पड़ने से ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है। 4। 39। 13। 52।
आसा महला 4 घरु 2 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥ जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥1॥ रहाउ ॥ सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥ जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥ गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥ तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥1॥ तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥ तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥ जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥ विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥2॥ जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥ हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥ जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥ सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥3॥ तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥ तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥ तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥ जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥1॥53॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे प्रभू !) आप (सारे जगत का) रचनहार है। आप सदैव कायम रहने वाला है। आप (ही) मेरा पति है। हे प्रभू ! (जगत में) वही कुछ घटित हो रहा है जो आपको अच्छा लगता है। (हे प्रभू !) मैं वही कुछ हासिल कर सकता हूँ जो कुछ आप (मुझे) देता है। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) सारी दुनिया आपकी (रची हुई) है। सब जीवों ने (अच्छे-बुरे वक्त में) आपको ही सिमरा है। जिस पर आप मेहर करता है उस मनुष्य ने आपका नाम-रत्न ढूँढ लिया। (पर) ढूँढा उसने जो गुरू की शरण पड़ा। और गवाया उसने जो अपने मन के पीछे चला। (जीवों के भी क्या वश। मनमुख को) तूने खुद ही (अपने चरणों से) विछोड़े रखा है और (गुरमुखि को) तूने स्वयं ही (अपने चरणों में) जगह दी हुई है। 1। (हे प्रभू !) आप (जिंदगी का एक बड़ा) दरिया है। सारी सृष्टि आपके में (जी रही) है। (आप स्वयं ही स्वयं है) आपके बिना और कोई दूसरी हस्ती नहीं। (जगत के ये) सारे जीव-जन्तु आपका (रचा हुआ) तमाशा हैं (आपकी ही धुर दरगाह से मिले) वियोग के कारण मिला हुआ जीव भी विछुड़ जाता है और संजोग के कारण पुनर्मिलाप हासिल कर लेता है। 2। (हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आप समझ देता है वही मनुष्य (जीवन-उद्देश्य को) समझता है और वह मनुष्य हरी प्रभू के गुण सदा कह के बयान करता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा की सेवा-भक्ति की उसने आत्मिक आनंद पाया; वह मनुष्य (सिमरन-भक्ति के कारण) आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा में लीन हो गया। 3। (हे प्रभू !) आप स्वयं ही (जगत को) रचने वाला है (जगत में) सब कुछ आपका किया ही हैं रहा है। आपके बिना कोई और कुछ करने वाला नहीं। आप खुद ही (जगत रचना) कर-करके (सबकी) संभाल करता है। आप खुद ही इस सारे भेद को जानता है। हे दास नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को ये सारी बात समझ आ जाती है। 4। 1। 53।
आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “असल भक्ति यही है कि (जिसकी बरकति से) मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के मोह से अछोह हो जाता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।