अंग
365
आसा
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एहा भगति जनु जीवत मरै ॥
एहा भगति जनु जीवत मरै ॥
गुर परसादी भवजलु तरै ॥
गुर कै बचनि भगति थाइ पाइ ॥
हरि जीउ आपि वसै मनि आइ ॥4॥
हरि क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥
निहचल भगति हरि सिउ चितु लाए ॥
भगति रते तिन॑ सची सोइ ॥
नानक नामि रते सुखु होइ ॥5॥12॥51॥
गुर परसादी भवजलु तरै ॥
गुर कै बचनि भगति थाइ पाइ ॥
हरि जीउ आपि वसै मनि आइ ॥4॥
हरि क्रिपा करे सतिगुरू मिलाए ॥
निहचल भगति हरि सिउ चितु लाए ॥
भगति रते तिन॑ सची सोइ ॥
नानक नामि रते सुखु होइ ॥5॥12॥51॥
हिन्दी अर्थ: असल भक्ति यही है कि (जिसकी बरकति से) मनुष्य दुनिया की किरत-कार करता हुआ ही माया के मोह से अछोह हो जाता है। और गुरू की कृपा से संसार-समुंद्र (के विकारों की लहरों) से पार लांघ जाता है। गुरू के उपदेश अनुसार की हुई भगती (प्रभू के दर पर) परवान होती है। प्रभू स्वयं ही मनुष्य के मन में आ बसता है। 4। (पर।जीव के भी क्या वश। जिस मनुष्य पर) परमात्मा मेहर करता है उसे गुरू मिलाता है (गुरू की सहायता से) वह ना डोलने वाली भक्ति करता है और परमात्मा से अपना चित्त जोड़े रखता है। हे नानक ! जो मनुष्य (परमात्मा की) भक्ति (के रंग) में रंगे जाते हैं उन्हें सदा कायम रहने वाली शोभा मिलती है। परमात्मा के नाम-रंग में रंगे हुओं को आत्मिक आनंद मिलता है। 5। 12। 51।
हरि कै भाणै सतिगुरु मिलै सचु सोझी होई ॥
आसा घरु 8 काफी महला 3
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि कै भाणै सतिगुरु मिलै सचु सोझी होई ॥
गुर परसादी मनि वसै हरि बूझै सोई ॥1॥
मै सहु दाता एकु है अवरु नाही कोई ॥
गुर किरपा ते मनि वसै ता सदा सुखु होई ॥1॥ रहाउ ॥
इसु जुग महि निरभउ हरि नामु है पाईऐ गुर वीचारि ॥
बिनु नावै जम कै वसि है मनमुखि अंध गवारि ॥2॥
हरि कै भाणै जनु सेवा करै बूझै सचु सोई ॥
हरि कै भाणै सालाहीऐ भाणै मंनिऐ सुखु होई ॥3॥
हरि कै भाणै जनमु पदारथु पाइआ मति ऊतम होई ॥
नानक नामु सलाहि तूं गुरमुखि गति होई ॥4॥39॥13॥52॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि कै भाणै सतिगुरु मिलै सचु सोझी होई ॥
गुर परसादी मनि वसै हरि बूझै सोई ॥1॥
मै सहु दाता एकु है अवरु नाही कोई ॥
गुर किरपा ते मनि वसै ता सदा सुखु होई ॥1॥ रहाउ ॥
इसु जुग महि निरभउ हरि नामु है पाईऐ गुर वीचारि ॥
बिनु नावै जम कै वसि है मनमुखि अंध गवारि ॥2॥
हरि कै भाणै जनु सेवा करै बूझै सचु सोई ॥
हरि कै भाणै सालाहीऐ भाणै मंनिऐ सुखु होई ॥3॥
हरि कै भाणै जनमु पदारथु पाइआ मति ऊतम होई ॥
नानक नामु सलाहि तूं गुरमुखि गति होई ॥4॥39॥13॥52॥
हिन्दी अर्थ: आसा घरु 8 काफी महला 3 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे भाई !) परमात्मा की रजा अनुसार गुरू मिलता है (जिसे गुरू मिल जाता है। उसे) सदा कायम रहने वाला प्रभू मिल जाता है। (और उसे सही जीवन-जुगति की) समझ आ जाती है। जिस मनुष्य के मन में गुरू की किरपा से परमातमा आ बसता है। वही मनुष्य परमात्मा के साथ सांझ पाता है। 1। (हे भाई !) एक परमात्मा ही मेरा पति रक्षक है और मुझे सब दातें देने वाला है। उसके बिना मेरा और कोई नहीं। पर गुरू की मेहर से हीवह मन में बस सकता है (और जब वह प्रभू मन में आ बसता है) तब सदा के लिए आनंद बन जाता है। 1। रहाउ। (हे भाई !) इस जगत में परमात्मा का नाम ही है जो (जगत के) सारे डरों से बचाने वाला है। पर ये नाम गुरू की बताई हुई विचार की बरकति से मिलता है। परमात्मा के नाम के बिना अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री आत्मिक मौत के काबू में रहती है। माया के मोह में अंधी हुई रहती है और मूर्खता में टिकी रहती है। 2। जो मनुष्य परमात्मा की रज़ा में चलता है वही मनुष्य परमात्मा की सेवा-भक्ति करता है। वही उस सदा स्थिर प्रभू को समझता है। परमात्मा की रजा में चलने से ही परमात्मा की सिफत सालाह हो सकती है। अगर परमात्मा की रजा में चलें तो ही आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। 3। (हे भाई ! जिस मनुष्य ने) परमात्मा की रज़ा में चल के मानस जन्म का मनोरथ हासिल कर लिया उसकी बुद्धि उत्तम बन गई। हे नानक ! (गुरू की शरण पड़ के) आप भी परमात्मा के नाम का गुणगान कर। गुरू की शरण पड़ने से ही उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त हो जाती है। 4। 39। 13। 52।
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
आसा महला 4 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥
जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥
गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥
तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥1॥
तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥
तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥
जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥
विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥2॥
जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥
हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥3॥
तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥
तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥
तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥
जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥1॥53॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तूं करता सचिआरु मैडा सांई ॥
जो तउ भावै सोई थीसी जो तूं देहि सोई हउ पाई ॥1॥ रहाउ ॥
सभ तेरी तूं सभनी धिआइआ ॥
जिस नो क्रिपा करहि तिनि नाम रतनु पाइआ ॥
गुरमुखि लाधा मनमुखि गवाइआ ॥
तुधु आपि विछोड़िआ आपि मिलाइआ ॥1॥
तूं दरीआउ सभ तुझ ही माहि ॥
तुझ बिनु दूजा कोई नाहि ॥
जीअ जंत सभि तेरा खेलु ॥
विजोगि मिलि विछुड़िआ संजोगी मेलु ॥2॥
जिस नो तू जाणाइहि सोई जनु जाणै ॥
हरि गुण सद ही आखि वखाणै ॥
जिनि हरि सेविआ तिनि सुखु पाइआ ॥
सहजे ही हरि नामि समाइआ ॥3॥
तू आपे करता तेरा कीआ सभु होइ ॥
तुधु बिनु दूजा अवरु न कोइ ॥
तू करि करि वेखहि जाणहि सोइ ॥
जन नानक गुरमुखि परगटु होइ ॥4॥1॥53॥
हिन्दी अर्थ: आसा महला 4 घरु 2 ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (हे प्रभू !) आप (सारे जगत के) रचनहार हैं। आप सदैव कायम रहने वाले हैं। आप (ही) मेरे पति हैं। हे प्रभू ! (जगत में) वही कुछ घटित हो रहा है जो आपको अच्छा लगता है। (हे प्रभू !) मैं वही कुछ हासिल कर सकता हूँ जो कुछ आप (मुझे) देते हैं। 1। रहाउ। (हे प्रभू !) सारी दुनिया आपकी (रची हुई) है। सब जीवों ने (अच्छे-बुरे वक्त में) आपको ही सिमरा है। जिस पर आप मेहर करते हैं उस मनुष्य ने आपका नाम-रत्न ढूँढ लिया। (पर) ढूँढा उसने जो गुरू की शरण पड़ा। और गवाया उसने जो अपने मन के पीछे चला। (जीवों के भी क्या वश। मनमुख को) आपने खुद ही (अपने चरणों से) विछोड़े रखा है और (गुरमुखि को) आपने स्वयं ही (अपने चरणों में) जगह दी हुई है। 1। (हे प्रभू !) आप (जिंदगी का एक बड़ा) दरिया हैं। सारी सृष्टि आपके में (जी रही) है। (आप स्वयं ही स्वयं हैं) आपके बिना और कोई दूसरी हस्ती नहीं। (जगत के ये) सारे जीव-जन्तु आपका (रचा हुआ) तमाशा हैं (आपकी ही धुर दरगाह से मिले) वियोग के कारण मिला हुआ जीव भी विछुड़ जाता है और संजोग के कारण पुनर्मिलाप हासिल कर लेता है। 2। (हे प्रभू !) जिस मनुष्य को आप समझ देते हैं वही मनुष्य (जीवन-उद्देश्य को) समझता है और वह मनुष्य हरी प्रभू के गुण सदा कह के बयान करता है। (हे भाई !) जिस मनुष्य ने परमात्मा की सेवा-भक्ति की उसने आत्मिक आनंद पाया; वह मनुष्य (सिमरन-भक्ति के कारण) आत्मिक अडोलता में टिक के परमात्मा में लीन हो गया। 3। (हे प्रभू !) आप स्वयं ही (जगत को) रचने वाले हैं (जगत में) सब कुछ आपका किया ही हो रहा है। आपके बिना कोई और कुछ करने वाला नहीं। आप खुद ही (जगत रचना) कर-करके (सबकी) संभाल करते हैं। आप खुद ही इस सारे भेद को जानते हैं। हे दास नानक ! गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य को ये सारी बात समझ आ जाती है। 4। 1। 53।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी; महला ४: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३६५ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।