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अंग 363

अंग
363
राग आसा
राग: आसा · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तनु मनु अरपे सतिगुर सरणाई ॥
हिरदै नामु वडी वडिआई ॥
सदा प्रीतमु प्रभु होइ सखाई ॥1॥
सो लाला जीवतु मरै ॥
सोगु हरखु दुइ सम करि जाणै गुर परसादी सबदि उधरै ॥1॥ रहाउ ॥
करणी कार धुरहु फुरमाई ॥
बिनु सबदै को थाइ न पाई ॥
करणी कीरति नामु वसाई ॥
आपे देवै ढिल न पाई ॥2॥
मनमुखि भरमि भुलै संसारु ॥
बिनु रासी कूड़ा करे वापारु ॥
विणु रासी वखरु पलै न पाइ ॥
मनमुखि भुला जनमु गवाइ ॥3॥
सतिगुरु सेवे सु लाला होइ ॥
ऊतम जाती ऊतमु सोइ ॥
गुर पउड़ी सभ दू ऊचा होइ ॥
नानक नामि वडाई होइ ॥4॥7॥46॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: अपना मन अपना शरीर गुरू के हवाले करके और गुरू की शरण पड़ के प्रभु का नाम (प्रभू को बिका हुआ) दास अपने दिल में बसाए रखता है, यही उसके वास्ते सबसे बड़ी इज्जत है परमात्मा सब का प्यारा है और सबका साथी मित्र है । 1। (हे भाई !) असली दास वह है (असल में बिका हुआ वह मनुष्य है) जो दुनिया की किरत-कार करता हुआ दुनिया की वासनाओं से मरा हुआ है। (ऐसा दास) खुशी-ग़मी दोनों को एक जैसा ही समझता है। और गुरू की किरपा से वह गुरू के शबद में जुड़ के (दुनियां की वासनाओं से) बचा रहता है। 1। रहाउ। परमात्मा ने अपने दास को सिमरन का ही करने-योग्य काम अपनी हजूरी से बताया है (परमात्मा ने उसे हुकम किया हुआ है कि) गुरू के शबद (में जुड़े) बिना कोई मनुष्य (उसके दर पर) कबूल नहीं हो सकता। इस वास्ते सेवक उसकी सिफत सालाह करता है। उसका नाम (अपने मन में) बसाए रखता है,यही उसके वास्ते करने योग्य कार्य है। (पर ये दाति प्रभू) खुद ही (अपने दास को) देता है (और देते हुए) समय नहीं लगाता। 2। अपने मन के पीछे चलने वाला जगत माया की भटकना में पड़ के कुमार्ग पर पड़ा रहता है (जैसे कोई व्यापारी) पूँजी के बगैर ठॅगी का ही व्यापार करता है। जिसके पास राशि नहीं है उसे सौदा नहीं मिल सकता। (इसी तरह) अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (सही जीवन-राह से) वंचित हुआ अपनी जिंदगी बरबाद करता है। 3। (प्रभू के दर पर बिका हुआ असली) दास वही है जो सतिगुरू की शरण पड़ता है। वही उच्च हस्ती वाला बन जाता है वही ऊँचे जीवन वाला हो जाता है। गुरू की (दी हुई नाम सिमरन की) सीढ़ी का आसरा ले के वह सबसे ऊँचा हो जाता है (महान बन जाता है)। हे नानक ! परमात्मा के नाम सिमरन में ही इज्जत है। 4। 7। 46।
आसा महला 3 ॥
मनमुखि झूठो झूठु कमावै ॥
खसमै का महलु कदे न पावै ॥
दूजै लगी भरमि भुलावै ॥
ममता बाधा आवै जावै ॥1॥
दोहागणी का मन देखु सीगारु ॥
पुत्र कलति धनि माइआ चितु लाए झूठु मोहु पाखंड विकारु ॥1॥ रहाउ ॥
सदा सोहागणि जो प्रभ भावै ॥
गुर सबदी सीगारु बणावै ॥
सेज सुखाली अनदिनु हरि रावै ॥
मिलि प्रीतम सदा सुखु पावै ॥2॥
सा सोहागणि साची जिसु साचि पिआरु ॥
अपणा पिरु राखै सदा उर धारि ॥
नेड़ै वेखै सदा हदूरि ॥
मेरा प्रभु सरब रहिआ भरपूरि ॥3॥
आगै जाति रूपु न जाइ ॥
तेहा होवै जेहे करम कमाइ ॥
सबदे ऊचो ऊचा होइ ॥
नानक साचि समावै सोइ ॥4॥8॥47॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाली जीव-स्त्री सदा वही कुछ करती है जो उस के (आत्मिक जीवन के) किसी काम नहीं आ सकता। (उन उद्यमों से वह जीव-स्त्री) पति-प्रभू का ठिकाना कभी भी नहीं ढूँढ सकती। माया के मोह में फंसी हुई। माया की भटकना में पड़ के वह कुमार्ग पर पड़ी रहती है। (हे मन !) अपनत्व के बंधनों में बंधा हुआ जगत जनम-मरण के चक्करों में पड़ा रहता है। 1। हे मन ! (पति द्वारा त्यागी हुई) मंद-कर्मी स्त्री के श्रृंगार देख। निरा पाखण्ड है निरा विकार है। (इसी तरह) जो मनुष्य पुत्रों में। स्त्री में। धन में। माया में चित्त जोड़ता है। उसका ये सारा मोह व्यर्थ है। 1। रहाउ। जो जीव-स्त्री प्रभू-पति को प्यारी लगती है वह सदा अच्छे भाग्यों वाली है वह गुरू के शबद के द्वारा (प्रभू-मिलाप को अपना आत्मिक) सोहज बनाती है। उसके हृदय की सेज सुखदाई हो जाती है क्योंकि वह हर समय प्रभू-पति का मिलाप का सुख पाती है। प्रभू-प्रीतम को मिल के वह सदा आत्मिक आनंद लेती है। 2। (हे मन !) जिस जीव-स्त्री का प्यार सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा में पड़ जाता है वह सदा के लिए अच्छे भाग्यों वाली बन जाती है। वह अपने प्रभू-पति को हमेशा अपने दिल में टिकाए रखती है। वह प्रभू को सदा अपने नजदीक अपने अंग-संग देखती है। उसे प्यारा प्रभू सबमें व्यापक दिखाई देता है। 3। (हे मन ! ऊँची जाति और सुंदर रूप का क्या गुमान।) परलोक में ना ये (ऊँची) जाति जाती है ना ही ये (सुंदर) रूप जाता है। (इस लोक में मनुष्य) जैसे कर्म करता है वैसा ही उसका जीवन बन जाता है (बस ! यही है मनुष्य की जाति और मनुष्य का रूप)। हे नानक ! (जैसे जैसे मनुष्य) गुरू के शबद की बरकति से (आत्मिक जीवन में) और ऊँचा और ऊँचा होता जाता है वैसे वैसे वह सदा कायम रहने वाले परमात्मा में लीन होता जाता है। 4। 8। 47।
आसा महला 3 ॥
भगति रता जनु सहजि सुभाइ ॥
गुर कै भै साचै साचि समाइ ॥
बिनु गुर पूरे भगति न होइ ॥
मनमुख रुंने अपनी पति खोइ ॥1॥
मेरे मन हरि जपि सदा धिआइ ॥
सदा अनंदु होवै दिनु राती जो इछै सोई फलु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर पूरे ते पूरा पाए ॥
हिरदै सबदु सचु नामु वसाए ॥
अंतरु निरमलु अंम्रित सरि नाए ॥
सदा सूचे साचि समाए ॥2॥
हरि प्रभु वेखै सदा हजूरि ॥
गुर परसादि रहिआ भरपूरि ॥
जहा जाउ तह वेखा सोइ ॥
गुर बिनु दाता अवरु न कोइ ॥3॥
गुरु सागरु पूरा भंडार ॥
ऊतम रतन जवाहर अपार ॥
गुर परसादी देवणहारु ॥
नानक बखसे बखसणहारु ॥4॥9॥48॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ जो मनुष्य परमात्मा की भक्ति के रंग में रंगा जाता है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है वह प्रभू के प्रेम में मगन रहता है। गुरू के अदब में रहके सदा स्थिर परमात्मा के भय में रहके वह सदा स्थिर परमात्मा में लीन हो जाता है। (पर) पूरे गुरू की शरण पड़े बिना प्रभू की भक्ति नहीं हो सकती। जो मनुष्य (गुरू की ओट-आस त्याग के) अपने मन के पीछे चलते हैं वह (अंत में) अपनी इज्जत गवा के पछताते हैं। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा के गुण याद कर। सदा परमात्मा का ध्यान धर। (जो मनुष्य परमात्मा का नाम जपता है उसके अंदर) दिन-रात सदा आत्मिक चाव बना रहता है। वह जिस फल की इच्छा करता है। वही फल हासिल कर लेता है। 1। रहाउ। पूरे गुरू के द्वारा ही सारे गुणों का मालिक परमात्मा मिलता है। (पूरे गुरू की शरण पड़ने वाला मनुष्य अपने) हृदय में गुरू का शबद बसाता है। प्रभू का सदा स्थिर नाम बसाता है। (ज्यों-ज्यों) वह आत्मिक जीवन देने वाले नाम-जल के सरोवर में स्नान करता है उसका हृदय पवित्र होता जाता है। (हे भाई !) सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा (की याद) में लीन हो के मनुष्य सदा के लिए पवित्र हो जाते हैं। 2। उस परमात्मा को अंग संग देखता हूँ। हे मेरे मन ! मेरे पर भी गुरू ने मेहर की है। मैं जिधर जाता हूँ उस परमात्मा को ही देखता हूँ। (पर) गुरू के बिना कोई और ये (ऊँची) दाति देने के लायक नहीं। 3। हे नानक ! गुरू समुंद्र है जिस में परमात्मा और सिफत सालाह के बेअंत बेश-कीमती रत्न जवाहर भरे पड़े हैं। गुरू की किरपा से वह प्रभू-दातार सिफत सालाह के कीमती रतन-जवाहर देता है। जीवों पर बख्शिश करने वाला परमात्मा बख्शिश करता है 4। 9। 48।
आसा महला 3 ॥
गुरु साइरु सतिगुरु सचु सोइ ॥
पूरै भागि गुर सेवा होइ ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: आसा महला 3 ॥ (हे भाई !) गुरू (गुणों का) समुंद्र है। गुरू उस सदा स्थिर रहने वाले परमात्मा का रूप है। बड़ी किस्मत से ही गुरू की (बताई हुई) सेवा होसकती है।

आसा राग में एक भोर की हलकी ताज़गी है। आसा दी वार इसी राग में बँधी, और सिख-संगीत के परिदृश्य को आकार दिया। हर सुबह, अमृतसर के हरमंदिर साहिब में, यही राग खुलता है। आसा राग का क्षेत्र है। ‘आसा दी वार’ की रचना गुरु नानक की है, बाद में गुरु अंगद और गुरु अर्जन के साथ संगठित हुई।

गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अपना मन अपना शरीर गुरू के हवाले करके और गुरू की शरण पड़ के प्रभु का नाम (प्रभू को बिका हुआ) दास अपने दिल में बसाए रखता है, यही उसके वास्ते सबसे बड़ी इज्जत है परमात्मा सब का प्यारा ।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।