दह दिस बूडी पवनु झुलावै डोरि रही लिव लाई ॥3॥ उनमनि मनूआ सुंनि समाना दुबिधा दुरमति भागी ॥ कहु कबीर अनभउ इकु देखिआ राम नामि लिव लागी ॥4॥2॥46॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: (दुनिया के काम-काज रूपी) हवा उसकी (जिंदगी की) पतंग को (चाहे देखने मात्र) को दशों-दिशाओं में उड़ाती है (भाव। चाहे जीवन-निर्वाह की खातिर वह काम-काज करता है)। पर। उसकी सुरति की डोर (प्रभू के साथ) जुड़ी रहती है। 3। हे कबीर ! कह, उस मनुष्य का मन बिरह अवस्था में पहुँच के उस हालत में लीन हो जाता है। जहाँ विकारों के फुरने नहीं उठते। उसकी दुविधा और उसकी बुरी मति सब नाश हो जाती है। वह एक आश्चर्यजनक करिश्मा अपने अंदर देख लेता है। उसकी सुरति प्रभू के नाम में जुड़ जाती है। 4। 2। 46।
गउड़ी बैरागणि तिपदे ॥ उलटत पवन चक्र खटु भेदे सुरति सुंन अनरागी ॥ आवै न जाइ मरै न जीवै तासु खोजु बैरागी ॥1॥ मेरे मन मन ही उलटि समाना ॥ गुर परसादि अकलि भई अवरै नातरु था बेगाना ॥1॥ रहाउ ॥ निवरै दूरि दूरि फुनि निवरै जिनि जैसा करि मानिआ ॥ अलउती का जैसे भइआ बरेडा जिनि पीआ तिनि जानिआ ॥2॥ तेरी निरगुन कथा काइ सिउ कहीऐ ऐसा कोइ बिबेकी ॥ कहु कबीर जिनि दीआ पलीता तिनि तैसी झल देखी ॥3॥3॥47॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी बैरागणि तिपदे ॥ मन की भटकना को पलटाते ही। (मानो।) (जोगियों के बताए हुए) छहों चक्र (एक साथ ही) भेदित हो जाते हैं। और सुरति उस अवस्था की आशिक हो जाती है जहाँ विकारों का कोई फुरना पैदा ही नहीं होता। (हे भाई ! वैरागी हो के) माया की तरफ से उपराम हो के उस प्रभू को तलाश। जो ना आता है। ना जाता है। ना मरता है। ना पैदा होता है। 1। हे मेरे मन ! जीव पहले तो प्रभू से बेगाना-बेगाना सा रहता है (भाव। परमात्मा के बारे में इसे कोई सूझ नहीं होती। पर) सतिगुरू की कृपा से जिस की समझ और तरह की हो जाती है। वह मन की विकारों की ओर की दौड़ को ही उलटा के प्रभू में लीन हो जाता है। 1। रहाउ। (इस तरह) जिस मनुष्य ने प्रभू को सही स्वरूप में समझ लिया है। उससे (वह कामादिक) जो पहले नजदीक थे। दूर हो जाते हैं। और जो प्रभू पहले कहीं दूर था (भाव। कभी याद ही नहीं था आता) अब अंग-संग प्रतीत होता है (पर ये एक ऐसा अनुभव है जो बयान नहीं किया जा सकता। सिर्फ इसकी अनुभूति ही की जा सकती है) जैसे मिश्री की शर्बत हो। उसका आनंद उसी मनुष्य ने जाना है जिसने (वह शर्बत) पीया है। 2। (हे प्रभू !) आपके उस स्वरूप की बातें किससे की जाएं जिस (स्वरूप) जैसा कहीं कुछ है ही नहीं? (क्योंकि एक तो) कोई विरला ही ऐसा विचारवान है (जो आपकी ऐसी बातें सुनने का चाहवान हैं। और दूसरा। ये आनंद लिया ही जा सकता है। बयान से परे है) हे कबीर ! कह, जिसने (जितना) प्रेम का पलीता लगाया है। उसने उतनी ही झलक देखी है। 3। 3। 47।
गउड़ी ॥ तह पावस सिंधु धूप नही छहीआ तह उतपति परलउ नाही ॥ जीवन मिरतु न दुखु सुखु बिआपै सुंन समाधि दोऊ तह नाही ॥1॥ सहज की अकथ कथा है निरारी ॥ तुलि नही चढै जाइ न मुकाती हलुकी लगै न भारी ॥1॥ रहाउ ॥ अरध उरध दोऊ तह नाही राति दिनसु तह नाही ॥ जलु नही पवनु पावकु फुनि नाही सतिगुर तहा समाही ॥2॥ अगम अगोचरु रहै निरंतरि गुर किरपा ते लहीऐ ॥ कहु कबीर बलि जाउ गुर अपुने सतसंगति मिलि रहीऐ ॥3॥4॥48॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ (वह अडोल अवस्था ऐसी है कि) उस में (पहुँच के मनुष्य को) इंद्रपुरी। विष्णुपुरी। सूर्यलोक। चंद्रलोक। ब्रहमपुरी। शिवपुरी – (किसी की भी चाहत) नहीं रहती। ना (और ज्यादा) जीने (की लालसा)। ना मौत (का डर)। ना कोई दुख। ना सुख (भाव। दुख से घबराहट अथवा सुख की चाहत)। सहज अवस्था में पहुँच के कुछ भी नहीं सताता। वह मन की एक ऐसी ठहराव वाली हालत होती है कि उसमें विकारों का कोई विचार उठता ही नहीं। ना ही कोई मेर-तेर रह जाती है। 1। मनुष्य के मन की अडोलता एक ऐसी हालत है जो (निराली) अपने जैसी खुद ही है। (इस वास्ते) उसका सही रूप बयान नहीं किया जा सकता। ये अवस्था किसी बढ़िया से बढ़िया सुख के बदले भी नापी-तोली नहीं जा सकती। (दुनिया में कोई ऐसा सुख-ऐश्वर्य नहीं है जिसके मुकाबले में ये कहा जा सके कि ‘सहज’ अवस्था इससे घटिया है या बढ़िया है)। ये नहीं कहा जा सकता कि (दुनिया के बढ़िया से बढ़िया किसी सुख से) ये हलके मेल की है अथपा ठीक है (भाव। दुनिया का कोई भी सुख इस अवस्था से बराबरी नहीं कर सकता)। 1। रहाउ। ‘सहज’ में पहुँच के नीच-ऊँच वाला कोई भेद-भाव नहीं रहता; (यहां पहुँचा मनुष्य) ना गफ़लत की नींद (सोता है)। ना माया की भटकना (में भटकता है) (क्योंकि) उस अवस्था में विषौ-विकार। चंचलता और तृष्णा – इनका नामो निशान नहीं रहता। (बस !) सतिगुरू ही सतिगुरू उस अवस्था में (मनुष्य के हृदय में) टिके होते हैं। 2। तब अपहुँच और अगोचर परमात्मा (भी मनुष्य के हृदय में) एक-रस सदा (प्रगट हुआ) रहता है। (पर) वह मिलता सतिगुरू की मेहर से ही है। हे कबीर ! (आप भी) कह, मैं अपने गुरू से सदके हूँ। मैं (अपने गुरू की) सोहानी संगत में ही जुड़ा रहूँ। 3। 4। 48।
गउड़ी ॥ पापु पुंनु दुइ बैल बिसाहे पवनु पूजी परगासिओ ॥ त्रिसना गूणि भरी घट भीतरि इन बिधि टांड बिसाहिओ ॥1॥ ऐसा नाइकु रामु हमारा ॥ सगल संसारु कीओ बनजारा ॥1॥ रहाउ ॥ कामु क्रोधु दुइ भए जगाती मन तरंग बटवारा ॥ पंच ततु मिलि दानु निबेरहि टांडा उतरिओ पारा ॥2॥ कहत कबीरु सुनहु रे संतहु अब ऐसी बनि आई ॥ घाटी चढत बैलु इकु थाका चलो गोनि छिटकाई ॥3॥5॥49॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ (सारे संसारी जीव-रूपी बंजारों ने) पाप और पुन्य दो बैल मूल्य लिए हैं। श्वासों की पूँजी ले के पैदा हुए हैं (भाव। मानो। जगत में व्यापार करने आए हैं)। (हरेक के) हृदय में तृष्णा की छॅट लदी हुई है। सो। इस तरह (इन जीवों ने) माल लादा है। 1। हमारा प्रभू कुछ ऐसा शाह है कि उसने सारे जगत (भाव।सारे संसारी जीवों) को व्यापारी बना (के जगत में) भेजा है। 1। रहाउ। काम क्रोध दोनों (इन जीव-व्यापारियों के) राह में महसूलिए बने बैठे हैं (भाव। श्वासों की पूँजी का कुछ हिस्सा काम और क्रोध में फंसने के कारण खत्म होता जा रहा है)। जीवों के मनों की तरंगे लुटेरे बन रही हैं (भाव। मन की कई किस्म की तरंगे उम्र का काफी हिस्सा खर्च किए जा रही हैं)। ये काम-क्रोध और मन की लहरें। शरीर के साथ मिल के सारी की सारी उम्र-रूपी राशि पूँजी को खत्म किए जा रहे हैं। और तृष्णा रूपी माल-असबाब (जो जीवों ने लादा हुआ है। हू-ब-हू) उस पार लांघता जा रहा है (भाव। जीव जगत से निरी तृष्णा ही अपने साथ लिए जाते हैं)। 2। कबीर कहता है, हे संत जनो ! सुनो। अब ऐसी हालत बन रही है कि प्रभू का सिमरन रूपी चढ़ाई का मुश्किल रास्ता तय करने वाले जीव-बनजारों का पाप-रूपी एक बैल थक गया है। वह बैल तृष्णा वाला माल असबाब फेंक के भाग गया है (भाव। जो जीव वणजारे नाम सिमरन वाले मुश्किल राह पर चलते हैं। वे पाप करने छोड़ देते हैं और उनकी तृष्णा समाप्त हो जाती है)। 3। 5। 49।
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी पंचपदा ॥ (जीव-स्त्री ने इस संसार-रूपी) पिता के घर में चार दिन (भाव। थोड़े दिन) ही रहना है। (हरेक ने परलोक रूपी) ससुराल घर (जरूर) जाना है। अंजान मूर्ख अंधा जगत नहीं जानता 1। बताओ ! (ये कैसी आश्चर्यजनक खेल है?) स्त्री अभी घर के काम-काज वाली आधी धोती ही बाँध के खड़ी है। तैयार हुए बगैर ही घूम रही है (भाव। जीव-स्त्री इस संसार के मोह में ही लापरवाह है)। मुकलावा (गउना) ले के जाने वाले मेहमान (भाव। जिंद को ले जाने वाले जम) घर में आए बैठे हैं। 1। रहाउ। ये जो सुंदर कूंई दिखाई दे रही है (भाव। ये जो सुंदर जगत दिख रहा है) इस में कौन सी स्त्री लॅज (रस्सी) बहा रही है (भाव। यहाँ जो भी आता है। अपनी उम्र संसारिक भोगों में गुजारने लग पड़ता है)। जिसकी रस्सी घड़े समेत टूट जाती है (भाव। जिसकी उम्र खत्म हो जाती है। और शरीर गिर पड़ता है) वह पानी भरने वाली (पनिहारिन) (भाव। भोगों में प्रवृत्त) यहाँ से उठ के (परलोक को) चल पड़ती है। 2। अगर प्रभू मालिक दयाल हो जाए। (जीव स्त्री पर) मेहर करे तो वह (जीव-स्त्री को संसार-कूप में से भोगों का पानी निकालने से बचाने का) काम अपना जान के खुद ही सिरे चढ़ाता है;
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
कबीर पन्द्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, मगर रामानन्द-शिष्य परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, ज़बान सीधी है, कई बार चुभने वाली। उनकी कुछ रचनाएँ बीजक में हैं, कुछ आदि ग्रंथ में, कुछ अनेक संप्रदायों में बिखरी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(दुनिया के काम-काज रूपी) हवा उसकी (जिंदगी की) पतंग को (चाहे देखने मात्र) को दशों-दिशाओं में उड़ाती है (भाव।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।