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अंग 332

अंग
332
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: Bhagat Kabeer Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
आंधी पाछे जो जलु बरखै तिहि तेरा जनु भीनां ॥
कहि कबीर मनि भइआ प्रगासा उदै भानु जब चीना ॥2॥43॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: कबीर कहता है, (ज्ञान की) अंधेरी के पीछे जो (‘नाम’ की) बरखा होती है। उस में (हे प्रभू ! आपकी भगती करने वाला) आपका भक्त भीग जाता है (भाव। ज्ञान की बरकति से वहिम-भरम खत्म हैं जाने तथा ज्यों-ज्यों मनुष्य नाम जपता है। उसके मन में शांति और टिकाव पैदा होता है)। जब (हे प्रभू ! आपका सेवक) अपने अंदर (आपके नाम का) सूरज चढ़ा हुआ देखता है तो उसके मन में प्रकाश (ही प्रकाश) हैं जाता है। 2। 43।
गउड़ी चेती
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि जसु सुनहि न हरि गुन गावहि ॥
बातन ही असमानु गिरावहि ॥1॥
ऐसे लोगन सिउ किआ कहीऐ ॥
जो प्रभ कीए भगति ते बाहज तिन ते सदा डराने रहीऐ ॥1॥ रहाउ ॥
आपि न देहि चुरू भरि पानी ॥
तिह निंदहि जिह गंगा आनी ॥2॥
बैठत उठत कुटिलता चालहि ॥
आपु गए अउरन हू घालहि ॥3॥
छाडि कुचरचा आन न जानहि ॥
ब्रहमा हू को कहिओ न मानहि ॥4॥
आपु गए अउरन हू खोवहि ॥
आगि लगाइ मंदर मै सोवहि ॥5॥
अवरन हसत आप हहि कांने ॥
तिन कउ देखि कबीर लजाने ॥6॥1॥44॥
कबीर पंद्रहवीं सदी के बनारस के जुलाहे थे, एक मुस्लिम घर में पले-बढ़े, और रामानन्द-शिष्य-परम्परा से जुड़े। उनकी वाणी विरोधाभास से नहीं डरती, और ज़बान सीधी है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी चेती ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। (कई मनुष्य खुद) ना कभी प्रभू की सिफत सालाह सुनते हैं। ना हरी के गुण गाते हैं। पर शेखी भरी बातों से (जैसे) आसमान गिरा लेते हैं। 1। ऐसे लोगों को समझाने का भी कोई फायदा नहीं। जिन्हें प्रभू ने भगती से वंचित रखा है (उन्हें समझाने की जगह बल्कि) उनसे सदा दूर-दूर ही रहना चाहिए। 1। रहाउ। (वह लोग) खुद तो (किसी को) एक चुल्ली जितना पानी भी नहीं देते। पर निंदा उनकी करते हैं जिन्होंने गंगा बहा दी हो। 2। बैठते-उठते (हर समय वे) टेढ़ी चालें ही चलते हैं। वे अपने आप से तो गए-गुजरे हैं ही। औरों को भी गलत रास्ते पर डालते हैं। 3। फोकी बहिस के बिना वे और कुछ करना जानते ही नहीं। किसी बड़े से बड़े जाने-माने सयाने की बात नहीं मानते। 4। अपने आप से गए-गुजरे वे लोग औरों को भी भटकाते हैं। वे (मानो। अपने ही घर को) आग लगा के घर में ही सो रहे हैं। 5। वे खुद तो काणे हैं (कई तरह के विकारों में फंसे हुए हैं) पर औरों का मजाक उड़ाते हैं। ऐसे लोगों को देख के। हे कबीर ! शर्म आती है। 6। 1। 14।
रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
जीवत पितर न मानै कोऊ मूएं सिराध कराही ॥
पितर भी बपुरे कहु किउ पावहि कऊआ कूकर खाही ॥1॥
मो कउ कुसलु बतावहु कोई ॥
कुसलु कुसलु करते जगु बिनसै कुसलु भी कैसे होई ॥1॥ रहाउ ॥
माटी के करि देवी देवा तिसु आगै जीउ देही ॥
ऐसे पितर तुमारे कहीअहि आपन कहिआ न लेही ॥2॥
सरजीउ काटहि निरजीउ पूजहि अंत काल कउ भारी ॥
राम नाम की गति नही जानी भै डूबे संसारी ॥3॥
देवी देवा पूजहि डोलहि पारब्रहमु नही जाना ॥
कहत कबीर अकुलु नही चेतिआ बिखिआ सिउ लपटाना ॥4॥1॥45॥
कबीर की पहचान उनके ‘उलट-बाँसी’ हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी।

हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी बैरागणि कबीर जी ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। लोग जीवित माता-पिता का तो आदर-मान नहीं करते। पर मर गए पित्रों के नमित्त भोजन खिलाते हैं। विचारे पित्र भला वह श्राद्धों का भोजन कैसे हासिल करें? उसे तो कौए-कुत्ते खा जाते हैं। 1। मुझे कोई बताए कि (पित्रों के नमित श्राद्ध खिलाने से पीछे घर में) कुशल-मंगल कैसे हो जाता है? सारा संसार (इसी वहिम-भरम में) खप रहा है कि (पित्रों के नमित श्राद्ध करने से घर में) सुख-आनंद बना रहता है।1। रहाउ। मिट्टी के देवी-देवते बना के लोग उस देवी या देवते के आगे (बकरे आदि की) कुर्बानी देते हैं। (हे भाई ! इस तरह) के (मिट्टी के बनाए हुए) आपके पित्र कहलाते हैं (उनके आगे भी जो आपका चित्त करता है। रख देते हो) वे अपना मुंह मांगा कुछ नहीं ले सकते। 2। जीते जी को (देवी-देवतों के आगे भेटा करने के लिए) मारते हैं (और इस तरह मिट्टी आदि के बनाए हुए) निर्जीव देवतों को पूजते हैं। लोग लोकाचार की रस्मों में ग़र्क हो रहे हैं। अपना भविष्य बर्बाद किए जा रहे हैं (ऐसे लोगों को) उस आत्मिक अवस्था की समझ नहीं पड़ती जो प्रभू का नाम सिमरने से बनती है। 3। कबीर कहता है, (ऐसे लोग मिट्टी के बनाए हुए) देवी-देवताओं को पूजते हैं और सहमें भी रहते हैं (क्योंकि असल ‘कुशल’ देने वाले) अकाल-पुरख को वे जानते ही नहीं हैं। वे जाति-कुल रहित प्रभू को नहीं सिमरते। वे (सदा) माया के साथ लिपटे रहते हैं। 4। 1। 45।
गउड़ी ॥
जीवत मरै मरै फुनि जीवै ऐसे सुंनि समाइआ ॥
अंजन माहि निरंजनि रहीऐ बहुड़ि न भवजलि पाइआ ॥1॥
मेरे राम ऐसा खीरु बिलोईऐ ॥
गुरमति मनूआ असथिरु राखहु इन बिधि अंम्रितु पीओईऐ ॥1॥ रहाउ ॥
गुर कै बाणि बजर कल छेदी प्रगटिआ पदु परगासा ॥
सकति अधेर जेवड़ी भ्रमु चूका निहचलु सिव घरि बासा ॥2॥
तिनि बिनु बाणै धनखु चढाईऐ इहु जगु बेधिआ भाई ॥
कबीर के बारह-सौ से अधिक शबद और सलोक आदि ग्रंथ में हैं। उनकी रचनाएँ बीजक में भी हैं, और कई अन्य संप्रदायों में बिखरी हैं, मगर ग्रंथ का संग्रह विशेष है क्योंकि वो विधि-शास्त्रीय की परम्परा के बाहर खड़ा है।

हिन्दी अर्थ: गउड़ी ॥ जो मनुष्य बार-बार यतन करके मन को विकारों के विचारों से हटा लेता है। वह फिर (असल जीवन) जीता है और उस अवस्था में जहाँ विकारों के फुरने नहीं उठते। ऐसे लीन हो जाता है कि माया में रहते हुए भी वह माया-रहित प्रभू में टिका रहता है और दुबारा (माया के) बवंडर में नहीं फंसता। 1। हे प्रभू ! तब ही दूध मथा जा सकता है (भाव। सिमरन का सफल उद्यम किया जा सकता है)। हे प्यारे प्रभू ! मुझे गुरू की मति दे के मेरे कमजोर मन को (माया की ओर से) अडोल रख। और इसी तरीके से ही (भाव। अगर आप मेरे मन को अडोल रखे) आपका नाम-अमृत पीया जा सकता है। 1। रहाउ। जिस मनुष्य ने सतिगुरू के (शबद रूप) तीर से बज्र रूपी कठोर मनो कल्पना भेद ली है (भाव। मन के विकारों की दौड़ रोक ली है) उसके अंदर प्रकाश-पद पैदा हो जाता है (भाव। उसके अंदर वह अवस्था बन जाती है जहाँ ऐसा आत्मिक प्रकाश हो जाता है कि माया के अंधेरे में नहीं फंसता)। (जैसे अंधकार में) रस्सी (को साँप समझने) का भुलेखा (पड़ता है और रोशनी होने पर वह भुलेखा मिट जाता है वैसे ही) माया के (प्रभाव-रूपी) अंधेरे में (विकारों को ही सही समझ लेने का भुलेखा) ‘नाम’ के प्रकाश के साथ मिट जाता है। और उस मनुष्य का निवास सदा-आनंदित रहने वाले प्रभू के चरणों में सदा के लिए हैं जाता है। 2। हे सज्जन ! (जिस मनुष्य ने गुरू के शबद रूपी तीर का आसरा लिया है) उसने (मानो) तीर-कमान चलाए बिना ही इस जगत को जीत लिया है (भाव।माया का जोर अपने ऊपर नहीं पड़ने दिया);

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

कबीर की पहचान उनके उलट-बाँसी हैं, ऐसी पंक्तियाँ जो प्रचलित अर्थ को पलट देती हैं। एक जुलाहे की उँगलियाँ ताने-बाने में जो बुनती थीं, उसी सूक्ष्मता की भाषा उन्होंने वाणी में बुनी। आज भी, बनारस के अस्सी-घाट के पास उनकी समाधि है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “कबीर कहता है, (ज्ञान की) अंधेरी के पीछे जो (‘नाम’ की) बरखा होती है।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।