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अंग ३१ · सिरी राग

अंग
31
सिरी राग
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  1. अंम्रितु छोडि बिखिआ लोभाणे सेवा करहि विडाणी ॥
  2. मनमुख करम कमावणे जिउ दोहागणि तनि सीगारु ॥
  3. जा पिरु जाणै आपणा तनु मनु अगै धरेइ ॥

अंम्रितु छोडि बिखिआ लोभाणे सेवा करहि विडाणी ॥

सिरीरागु महला 3 ॥
अंम्रितु छोडि बिखिआ लोभाणे सेवा करहि विडाणी ॥
आपणा धरमु गवावहि बूझहि नाही अनदिनु दुखि विहाणी ॥
मनमुख अंध न चेतही डूबि मुए बिनु पाणी ॥1॥
मन रे सदा भजहु हरि सरणाई ॥
गुर का सबदु अंतरि वसै ता हरि विसरि न जाई ॥1॥ रहाउ ॥
इहु सरीरु माइआ का पुतला विचि हउमै दुसटी पाई ॥
आवणु जाणा जंमणु मरणा मनमुखि पति गवाई ॥
सतगुरु सेवि सदा सुखु पाइआ जोती जोति मिलाई ॥2॥
सतगुर की सेवा अति सुखाली जो इछे सो फलु पाए ॥
जतु सतु तपु पवितु सरीरा हरि हरि मंनि वसाए ॥
सदा अनंदि रहै दिनु राती मिलि प्रीतम सुखु पाए ॥3॥
जो सतगुर की सरणागती हउ तिन कै बलि जाउ ॥
दरि सचै सची वडिआई सहजे सचि समाउ ॥
नानक नदरी पाईऐ गुरमुखि मेलि मिलाउ ॥4॥12॥45॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाले लोग आत्मिक जीवन देने वाला नाम-रस छोड़ के माया में मस्त रहते हैं। (और माया की खातिर) औरों की (सेवा खुशामद) करते फिरते हैं। (इस तरह वह) अपना (मनुष्य जनम का) फर्ज भुला बैठते हैं।और (उनकी उम्र) हर वक्त दुख में बीतती जाती है। (माया के मोह में) अंधे हुए मनमुख परमात्मा को नहीं याद करते। पानी के बिना ही डूब मरते हैं। (भाव, विकारों में गलतान हो के आत्मिक मौत मरते हैं और प्राप्त भी कुछ नहीं होता)।1। हे (मेरे) मन! सदा परमात्मा की शरण पड़ा रह। (पर परमात्मा की शरण गुरू के शबद द्वारा ही प्राप्त होती है) जब गुरू का शबद हृदय में आ बसे, तब परमात्मा (हृदय में से) नहीं बिसरता ।1।रहाउ। मनमुख का ये शरीर माया का पुतला बना रहता है (भाव, मनमुख माया के हाथों में नाचता रहता है)। मनमुख के हृदय में अहम् भाव टिका रहता है और विकारों की बुराई टिकी रहती है। उसका जगत में आना जाना पैदा होना मरना हमेशा बना रहता है। मनमुख ने (लोक परलोक में) आदर-सत्कार भी गवा लिया। जिस ने सत्गुरू की बताई हुई सेवा की, उसने आत्मक आनन्द प्राप्त कर लिया। उसकी जोति प्रभू की जोति में मिली रहती है।2। सतगुय की बताई हुई सेवा बहुत सुख देने वाली है (जो मनुष्य सेवा करता है वह) जो कुछ इच्छा करता है वही फल हासिल कर लेता है। गुरू की बताई सेवा ही जत सत तप (का मूल) है। (गुरमुख का) शरीर पवित्र हो जाता है। वह परमात्मा के नाम को अपने मन में बसा लेता है। गुरमुख दिन रात हर वक्त आत्मिक आनन्द में टिका रहता है, प्रीतम प्रभू को मिल के वह आत्मक सुख भोगता है।3। जो मनुष्य सत्गुरू की शरण पड़ते हैं, मैं उनसे कुर्बान जाता हूँ। उनको सदा स्थिर प्रभू के दर पे सदा ही आदर-सत्कार मिलता है। आत्मिक अडोलता की बरकति से उनको सदा स्थिर प्रभू में लीनता प्राप्त हो जाती है। हे नानक! ऐसे गुरमुखों की संगति में मिलाप परमात्मा की मेहर की नजर से ही मिलता है।4।12।45।

मनमुख करम कमावणे जिउ दोहागणि तनि सीगारु ॥

सिरीरागु महला 3 ॥
मनमुख करम कमावणे जिउ दोहागणि तनि सीगारु ॥
सेजै कंतु न आवई नित नित होइ खुआरु ॥
पिर का महलु न पावई ना दीसै घरु बारु ॥1॥
भाई रे इक मनि नामु धिआइ ॥
संता संगति मिलि रहै जपि राम नामु सुखु पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि सदा सोहागणी पिरु राखिआ उर धारि ॥
मिठा बोलहि निवि चलहि सेजै रवै भतारु ॥
सोभावंती सोहागणी जिन गुर का हेतु अपारु ॥2॥
पूरै भागि सतगुरु मिलै जा भागै का उदउ होइ ॥
अंतरहु दुखु भ्रमु कटीऐ सुखु परापति होइ ॥
गुर कै भाणै जो चलै दुखु न पावै कोइ ॥3॥
गुर के भाणे विचि अंम्रितु है सहजे पावै कोइ ॥
जिना परापति तिन पीआ हउमै विचहु खोइ ॥
नानक गुरमुखि नामु धिआईऐ सचि मिलावा होइ ॥4॥13॥46॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य के (धार्मिक) कार्य करने यूँ हैं जैसे कोई त्यागी हुई स्त्री (अपने) शरीर का श्रृंगार करती है। उस का पति (उस की) सेज पर कभी नहीं आता, (वह व्यर्थ श्रृंगार करके) सदा खुआर होती है। (इस तरह मनमुख मनुष्य दिखावे के धार्मिक कामों से) प्रभू-पति की हजूरी प्राप्त नहीं कर सकता, उसे प्रभू का दर-घर नहीं दिखता।1। हे भाई! एकाग्र मन हो के परमात्मा का नाम सिमर। जो मनुष्य साध-संगति में टिका रहता है वह परमात्मा का नाम सिमर के सुख प्राप्त करता है।1। सदा गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य सुहागनों (की तरह) हैं, वे प्रभू पति को अपने हृदय में बसा के रखते हैं। वे (सभी से) मीठे बोल बोलते हैं। झुक के (अहम् भाव से हट के, गरीब स्वभाव में) चलते हैं, उनकी हृदय सेज को प्रभू-पति भोगता है। जिन मनुष्यों ने गुरू का अटॅुट प्यार (अपने हृदय में बसाया है) वह उन सुहागनों की तरह हैं जिन्होंने शोभा कमाई है।2। जब किसी मनुष्य के भाग्य जाग पड़ें, तो अति किस्मत से उसे सत्गुरू मिल जाता है। (गुरू के मिलने से) हृदय में से दुख काटा जाता है, भटकन दूर हो जाती है, आत्मिक आनन्द की प्राप्ति होती है। जो भी मनुष्य गुरू के हुकम में है, वह कभी भी दुख नहीं पाता।3। गुरू की रजा में नाम-अमृत है (जो रजा में चलता है) वह आत्मिक अडोलता में टिक के अंम्रित पीता है। जिन मनुष्यों को अमृत मिल गया, उन्होंने अपने अंदर के अहंकार को दूर करके ही इसे पीया। हे नानक! गुरू की शरण पड़ कर प्रभू का नाम सिमरना चाहिए। (सिमरन की बरकति से) सदा स्थिर प्रभू में मेल हो जाता है।4।13।46।

जा पिरु जाणै आपणा तनु मनु अगै धरेइ ॥

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सिरीरागु महला 3 ॥
जा पिरु जाणै आपणा तनु मनु अगै धरेइ ॥
सोहागणी करम कमावदीआ सेई करम करेइ ॥
सहजे साचि मिलावड़ा साचु वडाई देइ ॥1॥
भाई रे गुर बिनु भगति न होइ ॥
बिनु गुर भगति न पाईऐ जे लोचै सभु कोइ ॥1॥ रहाउ ॥
लख चउरासीह फेरु पइआ कामणि दूजै भाइ ॥
बिनु गुर नीद न आवई दुखी रैणि विहाइ ॥
बिनु सबदै पिरु न पाईऐ बिरथा जनमु गवाइ ॥2॥

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 3 ॥ जब (कोई जीव-स्त्री) प्रभू-पति को अपना समझ लेती है (भाव, प्रभु-पति के साथ याद कर करके गहरा अपनत्व डाल लेती है) तो वह अपना मन उस के हवाले कर देती है (भाव, अपने मन के पीछे चलना छोड़ देती है)। अपना शरीर भी हवाले कर देती है। (भाव, ज्ञानेन्द्रियां माया की ओर से हट जाती हैं)। वह जीव-स्त्री वही उद्यम करती है जो भगत जन करते हैं। (इस तरह) आत्मक अडोलता में टिकने से सदा स्थिर प्रभु में उसका मिलाप हो जाता है, सदा स्थिर परमात्मा उसे (अपने घर में) आदर-सत्कार देता है।1। हे भाई! गुरू की शरण पड़ने के बिना परमात्मा की भक्ति नहीं हो सकती। अगर हरेक जीव भी (परमात्मा की भक्ति वास्ते) लालसा करे, तो भी गुरू की शरण के, बिना भक्ति (की दात) नहीं मिल सकती।1। पर, जो जीव स्त्री माया के प्यार में रहती है। उसे चौरासी लाख योनियों का फेरा भुगतना पड़ता है । गुरू की शरण पड़ने के बिना आत्मिक शान्ति प्राप्त नहीं होती। उसकी (जिंदगी की रात) दुखों में गुजरती है। गुरू के शबद के बिना प्रभु-पति नहीं मिलता। (जो मनुष्य गुरू के शबद से वंचित रहता है) वह अपना मानव जीवन व्यर्थ कर लेता है।2।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला ३: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग ३१ खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।

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