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अंग 294

अंग
294
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
बनि तिनि परबति है पारब्रहमु ॥
जैसी आगिआ तैसा करमु ॥
पउण पाणी बैसंतर माहि ॥
चारि कुंट दह दिसे समाहि ॥
तिस ते भिंन नही को ठाउ ॥
गुर प्रसादि नानक सुखु पाउ ॥2॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वह पारब्रहम जंगल में है घास (आदि) में है और पर्वत में है; जैसा वह हुकम करता है वैसा ही (जीव) काम करता है। पवन में पानी में आग में चहुँ कुंटों में दसों दिशाओं में (सब जगह) समाया हुआ है। कोई (भी) जगह उस प्रभू से अलग नहीं है; (पर) हे नानक ! (इस निश्चय का) आनंद गुरू की कृपा से ही मिलता है।2।
बेद पुरान सिंम्रिति महि देखु ॥
ससीअर सूर नख्यत्र महि एकु ॥
बाणी प्रभ की सभु को बोलै ॥
आपि अडोलु न कबहू डोलै ॥
सरब कला करि खेलै खेल ॥
मोलि न पाईऐ गुणह अमोल ॥
सरब जोति महि जा की जोति ॥
धारि रहिओ सुआमी ओति पोति ॥
गुर परसादि भरम का नासु ॥
नानक तिन महि एहु बिसासु ॥3॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: वेदों में, पुराणों में, स्मृतियों में (उसी प्रभू को) देखो; चंद्रमा, सूरज, तारों में भी एक वही है। हरेक जीव अकाल-पुरख की ही बोली बोलता है; (पर सब में विद्यमान होते हुए भी) वह आप अडोल है कभी डोलता नहीं। सारी ताकतें रच के (जगत की) खेलें खेल रहा है। (पर वह) किसी मूल्य से नहीं मिलता (क्योंकि) अमूल्य गुणों वाला है। जिस प्रभू की ज्योति सारी ही ज्योतियों में (जल रही है) वह मालिक ताने बाने की तरह (सबको) आसरा दे रहा है। जिनका भरम गुरू की कृपा से मिट जाता है। (पर) हे नानक ! (अकाल-पुरख की इस सर्व-व्यापक हस्ती का) ये यकीन उन मनुष्यों के अंदर बनता है 3।
संत जना का पेखनु सभु ब्रहम ॥
संत जना कै हिरदै सभि धरम ॥
संत जना सुनहि सुभ बचन ॥
सरब बिआपी राम संगि रचन ॥
जिनि जाता तिस की इह रहत ॥
सति बचन साधू सभि कहत ॥
जो जो होइ सोई सुखु मानै ॥
करन करावनहारु प्रभु जानै ॥
अंतरि बसे बाहरि भी ओही ॥
नानक दरसनु देखि सभ मोही ॥4॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: संत जन हरेक जगह अकाल-पुरख को ही देखते हैं। उनके हृदय में सारे (विचार) धर्म के ही (उठते हैं)। संत जन भले वचन ही सुनते हैं और सर्व-व्यापक अकाल-पुरख के साथ जुड़े रहते हैं। जिस जिस संत जन ने (प्रभू को) जान लिया है उसकी रहनी ही ये हो जाती है कि वह सदा सच्चे वचन बोलता है। (और) जो कुछ (प्रभू के द्वारा) होता है उसी को सुख मानता है। सब काम करने वाला और (जीवों से) करवाने वाला प्रभू को ही जानता है। (साधु जनों के लिए) अंदर बाहर (सब जगह) वही प्रभू बसता है। (प्रभू के सर्व-व्यापी) दर्शन करके सारी सृष्टि मस्त हो जाती है। 4।
आपि सति कीआ सभु सति ॥
तिसु प्रभ ते सगली उतपति ॥
तिसु भावै ता करे बिसथारु ॥
तिसु भावै ता एकंकारु ॥
अनिक कला लखी नह जाइ ॥
जिसु भावै तिसु लए मिलाइ ॥
कवन निकटि कवन कहीऐ दूरि ॥
आपे आपि आप भरपूरि ॥
अंतरगति जिसु आपि जनाए ॥
नानक तिसु जन आपि बुझाए ॥5॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: प्रभू स्वयं हस्ती वाला है। जो कुछ उसने पैदा किया है वह सब अस्तित्व वाला है (भाव- भरम भुलेखा नहीं) सारी सृष्टि उस प्रभू से हुई है। अगर उसकी रजा हो तो जगत का पसारा कर देता है। अगर उसे भाए तो फिर एक खुद ही खुद हो जाता है। उसकी अनेक ताकतें हैं किसी का बयान नहीं हो सकता। जिस पर प्रसन्न होता है उसे अपने साथ मिला लेता है। वह प्रभू कितनों के नजदीक और कितनों से दूर कहा जा सकता है? वह प्रभू खुद ही हर जगह मौजूद है। जिस मनुष्य को प्रभू स्वयं ही अंदर की उच्च अवस्था सुझाता है। हे नानक ! उस मनुष्य को (अपनी इस सर्व-व्यापक की) समझ बख्शता है। 5।
सरब भूत आपि वरतारा ॥
सरब नैन आपि पेखनहारा ॥
सगल समग्री जा का तना ॥
आपन जसु आप ही सुना ॥
आवन जानु इकु खेलु बनाइआ ॥
आगिआकारी कीनी माइआ ॥
सभ कै मधि अलिपतो रहै ॥
जो किछु कहणा सु आपे कहै ॥
आगिआ आवै आगिआ जाइ ॥
नानक जा भावै ता लए समाइ ॥6॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: सारे जीवों में प्रभू स्वयं ही बरत रहा है। (उन जीवों की) सारी आँखों में से प्रभू खुद ही देख रहा है। (जगत के) सारे पदार्थ जिस प्रभू के शरीर हैं। (सब में व्यापक हो के) वह अपनी शोभा आप ही सुन रहा है। (जीवों का) पैदा होना मरना प्रभू ने एक खेल बनाई है और अपने हुकम में चलने वाली माया बना दी है। वह सब (माया के पसारे) के बिच में रह के भी इस से अलिप्त रहता है जो कुछ भी कहना है वह स्वं ही कहता है हे नानक ! (जीव) अकाल-पुरख के हुकम में पैदा होता है और हुकम में मरता है। जब उसकी रजा होती है तो उनको अपने में लीन कर लेता है। 6।
इस ते होइ सु नाही बुरा ॥
ओरै कहहु किनै कछु करा ॥
आपि भला करतूति अति नीकी ॥
आपे जानै अपने जी की ॥
आपि साचु धारी सभ साचु ॥
ओति पोति आपन संगि राचु ॥
ता की गति मिति कही न जाइ ॥
दूसर होइ त सोझी पाइ ॥
तिस का कीआ सभु परवानु ॥
गुर प्रसादि नानक इहु जानु ॥7॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जो कुछ प्रभू की ओर से होता है (जीवों के लिए) बुरा नहीं होता; और प्रभू के बिना बताओ किसी ने कुछ कर दिखाया है? प्रभू खुद ठीक है उसका काम भी ठीक है। अपने दिल की बात वह खुद ही जानता है। स्वयं हस्ती वाला है। सारी रचना जो उसके आसरे है। वह भी अस्तित्व वाली है (भरम नहीं)। ताने-पेटे की तरह उसने अपने साथ मिलाई हुई है। वह प्रभू कैसा है और कितना बड़ा है, ये बात बयान नहीं हो सकती। कोई दूसरा (अलग) हो तो समझ सके। प्रभू का किया हुआ सब कुछ (जीवों को) सिर-माथे मानना पड़ता है। (पर) हे नानक ! यह पहिचान गुरू की कृपा से आती है। 7।
जो जानै तिसु सदा सुखु होइ ॥
आपि मिलाइ लए प्रभु सोइ ॥
ओहु धनवंतु कुलवंतु पतिवंतु ॥
जीवन मुकति जिसु रिदै भगवंतु ॥
धंनु धंनु धंनु जनु आइआ ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य प्रभू से सांझ पा लेता है उसे सदा सुख होता है। प्रभू उसे अपने साथ आप मिला लेता है। वह धन वाला कुल वाला और इज्ज़त वाला बन जाता है। जिस मनुष्य के हृदय में भगवान बसता है वह जीवित ही मुक्त हो जाता है। उसका (जगत में) आना मुबारक है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 7 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “वह पारब्रहम जंगल में है घास (आदि) में है और पर्वत में है; जैसा वह हुकम करता है वैसा ही (जीव) काम करता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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