बडभागी नानक जन सेइ ॥8॥13॥
तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥
एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु भउ जाइ ॥1॥
मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥
देवन कउ एकै भगवानु ॥
जिस कै दीऐ रहै अघाइ ॥
बहुरि न त्रिसना लागै आइ ॥
मारै राखै एको आपि ॥
मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ ॥
तिस का नामु रखु कंठि परोइ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ॥
नानक बिघनु न लागै कोइ ॥1॥
करि मन मेरे सति बिउहार ॥
निरमल रसना अंम्रितु पीउ ॥
सदा सुहेला करि लेहि जीउ ॥
नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ॥
साधसंगि बिनसै सभ संगु ॥
चरन चलउ मारगि गोबिंद ॥
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ॥
हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥2॥
सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
राम नाम जो करहि बीचार ॥
से धनवंत गनी संसार ॥
मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥
सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
एको एकु एकु पछानै ॥
इत उत की ओहु सोझी जानै ॥
नाम संगि जिस का मनु मानिआ ॥
नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥3॥
तिस की जानहु त्रिसना बुझै ॥
साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥
सरब रोग ते ओहु हरि जनु रहत ॥
अनदिनु कीरतनु केवल बख्यानु ॥
ग्रिहसत महि सोई निरबानु ॥
एक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥
पारब्रहम की जिसु मनि भूख ॥
नानक तिसहि न लागहि दूख ॥4॥
सो संतु सुहेला नही डुलावै ॥
जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ॥
सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ॥
अपुने कारज महि आपि समाइआ ॥
सोधत सोधत सोधत सीझिआ ॥
गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
जब देखउ तब सभु किछु मूलु ॥
नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥5॥
आपन चलितु आप ही करै ॥
आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ॥
आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।
इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस जिस जीव पर मेहर करता है उस उस को अपना नाम बख्शता है; और हे नानक ! वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।