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अंग 281

अंग
281
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
जिस नो क्रिपा करै तिसु आपन नामु देइ ॥
बडभागी नानक जन सेइ ॥8॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस जिस जीव पर मेहर करता है उस उस को अपना नाम बख्शता है; और हे नानक ! वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं। 8। 13।
सलोकु ॥
तजहु सिआनप सुरि जनहु सिमरहु हरि हरि राइ ॥
एक आस हरि मनि रखहु नानक दूखु भरमु भउ जाइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक ॥ हे भले मनुष्यो ! चतुराई त्यागो और अकाल-पुरख को सिमरो। केवल एक प्रभू की आशा मन में रखो। हे नानक ! (इस तरह) दुख वहिम और डर दूर हो जाता है। 1।
असटपदी ॥
मानुख की टेक ब्रिथी सभ जानु ॥
देवन कउ एकै भगवानु ॥
जिस कै दीऐ रहै अघाइ ॥
बहुरि न त्रिसना लागै आइ ॥
मारै राखै एको आपि ॥
मानुख कै किछु नाही हाथि ॥
तिस का हुकमु बूझि सुखु होइ ॥
तिस का नामु रखु कंठि परोइ ॥
सिमरि सिमरि सिमरि प्रभु सोइ ॥
नानक बिघनु न लागै कोइ ॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी ॥ (हे मन !) (किसी) मनुष्य का आसरा बिल्कुल ही व्यर्थ समझ। एक अकाल-पुरख ही (सब जीवों को) देने वाला है (स्मर्थ है)। जिसके देने से (मनुष्य) तृप्त रहता है और दुबारा उसे लालच आ के नहीं दबाती। प्रभू खुद ही (जीवों को) मारता है (अथवा) पालता है। मनुष्य के वश में कुछ भी नहीं। (इसलिए) उस मालिक का हुकम समझ के सुख होता है। (हे मन !) उसका नाम हर वक्त याद कर। उस प्रभू को सदा सिमर। हे नानक ! (सिमरन की बरकति से) (जिंदगी के सफर में) कोई रुकावट नहीं पड़ती। 1।
उसतति मन महि करि निरंकार ॥
करि मन मेरे सति बिउहार ॥
निरमल रसना अंम्रितु पीउ ॥
सदा सुहेला करि लेहि जीउ ॥
नैनहु पेखु ठाकुर का रंगु ॥
साधसंगि बिनसै सभ संगु ॥
चरन चलउ मारगि गोबिंद ॥
मिटहि पाप जपीऐ हरि बिंद ॥
कर हरि करम स्रवनि हरि कथा ॥
हरि दरगह नानक ऊजल मथा ॥2॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: अपने अंदर अकाल-पुरख की सिफत सलाह कर। हे मेरे मन ! ये सच्चा व्यवहार कर। जीभ से मीठा (नाम-) अमृत पी। (इस तरह) अपनी जान को सदा सुखी कर ले। आँखों से अकाल-पुरख का (जगत-) तमाशा देख। भलों की संगति में (टिकने से) और (कुटंब आदि का) मोह मिट जाता है। पैरों से ईश्वर के रास्ते पर चल। प्रभू को रक्ती भर भी जपें तो पाप दूर हो जाते हैं। हाथों से प्रभू (के राह) के काम कर और कानों से उसकी उपमा (सुन); (इस तरह) हे नानक ! प्रभू की दरगाह में सुर्ख-रू हो जाते हैं। 2।
बडभागी ते जन जग माहि ॥
सदा सदा हरि के गुन गाहि ॥
राम नाम जो करहि बीचार ॥
से धनवंत गनी संसार ॥
मनि तनि मुखि बोलहि हरि मुखी ॥
सदा सदा जानहु ते सुखी ॥
एको एकु एकु पछानै ॥
इत उत की ओहु सोझी जानै ॥
नाम संगि जिस का मनु मानिआ ॥
नानक तिनहि निरंजनु जानिआ ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: वह मनुष्य जगत में बड़े भाग्यशाली हैं। (जो मनुष्य) सदा ही प्रभू के गुण गाते हैं। जो अकाल-पुरख के नाम का ध्यान धरते हैं। वह मनुष्य जगत में धनवान हैं जो संतुष्ट हैं जो भले लोग मन तन और मुख से प्रभू का नाम उचारते हैं। उन्हें सदा सुखी जानो। जो मनुष्य केवल एक प्रभू को (हर जगह) पहिचानता है। उसे लोक परलोक की (भाव। जीवन के सारे सफर की) समझ पड़ जाती है। जिस मनुष्य का मन प्रभू के नाम से रच-मिच जाता है। हे नानक ! उसने प्रभू को पहिचान लिया है। 3।
गुर प्रसादि आपन आपु सुझै ॥
तिस की जानहु त्रिसना बुझै ॥
साधसंगि हरि हरि जसु कहत ॥
सरब रोग ते ओहु हरि जनु रहत ॥
अनदिनु कीरतनु केवल बख्यानु ॥
ग्रिहसत महि सोई निरबानु ॥
एक ऊपरि जिसु जन की आसा ॥
तिस की कटीऐ जम की फासा ॥
पारब्रहम की जिसु मनि भूख ॥
नानक तिसहि न लागहि दूख ॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को गुरू की कृपा से अपने आप की समझ आ जाती है। ये जान लो कि उसकी तृष्णा मिट जाती है। जो रॅब का प्यारा सत्संग में अकाल-पुरख की सिफत सालाह करता है। वह सारे रोगों से बच जाता है। जो मनुष्य हर रोज प्रभू का कीर्तन ही उचारता है। वह मनुष्य गृहस्त में (रहता हुआ भी) निर्लिप है। जिस मनुष्य की आस एक अकाल-पुरख पर है। उसके जमों की फासी काटी जाती है। जिस मनुष्य के मन में प्रभू (के मिलने) की तमन्ना है। हे नानक ! उस मनुष्य को कोई दुख नहीं छूता।
जिस कउ हरि प्रभु मनि चिति आवै ॥
सो संतु सुहेला नही डुलावै ॥
जिसु प्रभु अपुना किरपा करै ॥
सो सेवकु कहु किस ते डरै ॥
जैसा सा तैसा द्रिसटाइआ ॥
अपुने कारज महि आपि समाइआ ॥
सोधत सोधत सोधत सीझिआ ॥
गुर प्रसादि ततु सभु बूझिआ ॥
जब देखउ तब सभु किछु मूलु ॥
नानक सो सूखमु सोई असथूलु ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: जिस मनुष्य को हरी प्रभू मन में सदा याद रहता है। वह संत है सुखी है (वह कभी) घबराता नहीं। जिस मनुष्य पर प्रभू अपनी मेहर करता है। बताओ (प्रभू का) वह सेवक (और) किस से डर सकता है? (क्योंकि) उसे प्रभू वैसा ही दिखाई देता है जैसा वह (असल में) है। (ये दिख पड़ता है कि) अपने रचे हुए जगत में स्वयं व्यापक है। नित्य विचार करते हुए (उस सेवक को विचार में) सफलता मिल जाती है। गुरू की कृपा से (उसे) सारी अस्लियत की समझ आ जाती है। अब) मैं जग देखता हूँ तो हरेक चीज उस सब के आरम्भ (-प्रभू का रूप दिखती है)। हे नानक ! (मेरे ऊपर भी गुरू की मेहर हुई है। ये दिखता संसार भी वह स्वयं है और सब में व्यापक ज्योति भी खुद ही है। 5।
नह किछु जनमै नह किछु मरै ॥
आपन चलितु आप ही करै ॥
आवनु जावनु द्रिसटि अनद्रिसटि ॥
आगिआकारी धारी सभ स्रिसटि ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: ना कुछ पैदा होता है ना कुछ मरता है; (ये जनम मरन का तो) प्रभू स्वयं ही खेल कर रहा है। पैदा होना, मरना, दिखाई देता और ना दिखाई देता- ये सारा संसार प्रभू ने अपने हुकम में चलने वाला बना दिया है।

गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

गुरु अर्जन देव जी ने ही 1604 में आदि ग्रंथ का प्रथम संकलन तैयार किया, और हरमंदिर साहिब में स्थापित किया। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय। जहाँगीर के दरबार में 1606 में, चालीस-तीन वर्ष की आयु में, उन्हें यंत्रणा देकर मारा गया। वो सिख-इतिहास के पहले शहीद हैं।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जिस जिस जीव पर मेहर करता है उस उस को अपना नाम बख्शता है; और हे नानक ! वह मनुष्य बड़े भाग्यशाली हो जाते हैं।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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