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अंग 276

अंग
276
राग Gauree
राग: Gauree · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सुखमनी साहिब का हिस्सा। पूरी 24 अष्टपदियों की हिन्दी टीका /sukhmani-sahib/ पर है।
कई कोटि देव दानव इंद्र सिरि छत्र ॥
सगल समग्री अपनै सूति धारै ॥
नानक जिसु जिसु भावै तिसु तिसु निसतारै ॥3॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: करोड़ों देवते और इंद्र हैं जिनके सिर पर छत्र हैं। (इन) सारे (जीव-जंतुओं और) पदार्थों को (प्रभू ने) अपने (हुकम के) सूत्र में परोया हुआ है। हे नानक ! जो जो उसे भाता है। उस उसको (प्रभू) तार लेता है। 3।
कई कोटि राजस तामस सातक ॥
कई कोटि बेद पुरान सिम्रिति अरु सासत ॥
कई कोटि कीए रतन समुद ॥
कई कोटि नाना प्रकार जंत ॥
कई कोटि कीए चिर जीवे ॥
कई कोटि गिरी मेर सुवरन थीवे ॥
कई कोटि जख्य किंनर पिसाच ॥
कई कोटि भूत प्रेत सूकर म्रिगाच ॥
सभ ते नेरै सभहू ते दूरि ॥
नानक आपि अलिपतु रहिआ भरपूरि ॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: करोड़ों जीव (माया के तीनों गुणों) रजो तमों और सतो में हैं। करोड़ों (बंदे) वेद पुरान स्मृतियों व शास्त्रों (के पढ़ने वाले) हैं। समुंद्र में करोड़ों रत्न पैदा कर दिए हैं और कई किस्म के जीव जंतु बना दिए हैं। करोड़ों जीव लंबी उम्र (दीर्घायु) वाले पैदा किए हैं। करोड़ों ही सोने के सुमेर पर्वत बन गए हैं। करोड़ों ही यक्ष किन्नर व पिशाच हैं और करोड़ों ही भूत, प्रेत, सूअर व शेर हैं। (प्रभू) इन सबके नजदीक भी है और दूर भी। हे नानक ! प्रभू हर जगह व्यापक भी है और है भी निर्लिप। 4।
कई कोटि पाताल के वासी ॥
कई कोटि नरक सुरग निवासी ॥
कई कोटि जनमहि जीवहि मरहि ॥
कई कोटि बहु जोनी फिरहि ॥
कई कोटि बैठत ही खाहि ॥
कई कोटि घालहि थकि पाहि ॥
कई कोटि कीए धनवंत ॥
कई कोटि माइआ महि चिंत ॥
जह जह भाणा तह तह राखे ॥
नानक सभु किछु प्रभ कै हाथे ॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: करोड़ों जीव पाताल में बसने वाले हैं और करोड़ों ही नर्कों व स्वर्गों में बसते हें (भाव। दुखी व सुखी हैं)। करोड़ों जीव पैदा होते हैं मरते है और करोड़ों जीव कई जूनियों में भटक रहे हैं। करोड़ों जीव बैठे ही खाते हैं और करोड़ों (ऐसे हैं जो रोटी की खातिर) मेहनत करते हैं और थक टूट जाते हैं। करोड़ों जीव (प्रभू ने) धन वान बनाए हैं और करोड़ों (ऐसे हैं जिन्हें) माया की चिंता लगी हुई है। जहाँ जहाँ चाहता है जीवों को वहीं वहीं ही रखता है। हे नानक ! हरेक बात प्रभू के अपने हाथ में है। 5।
कई कोटि भए बैरागी ॥
राम नाम संगि तिनि लिव लागी ॥
कई कोटि प्रभ कउ खोजंते ॥
आतम महि पारब्रहमु लहंते ॥
कई कोटि दरसन प्रभ पिआस ॥
तिन कउ मिलिओ प्रभु अबिनास ॥
कई कोटि मागहि सतसंगु ॥
पारब्रहम तिन लागा रंगु ॥
जिन कउ होए आपि सुप्रसंन ॥
नानक ते जन सदा धनि धंनि ॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (इस रचना में) करोड़ों जीव वैरागी हैं। जिनकी सुरति अकाल-पुरख के नाम के साथ लगी रहती है। करोड़ों लोग प्रभू को खोजते हैं। अपने अंदर अकाल-पुरख को तलाशते हैं। करोड़ों जीवों को प्रभू के दीदार की तमन्ना लगी रहती है। उन्हें अविनाशी प्रभू मिल जाता है। करोड़ों मनुष्य सत्संग मांगते हैं। उन्हें अकाल-पुरख से इश्क रहता है। जिनपे प्रभू स्वयं मेहरवान होता है। हे नानक ! वे मनुष्य सदा भाग्यशाली हैं। 6।
कई कोटि खाणी अरु खंड ॥
कई कोटि अकास ब्रहमंड ॥
कई कोटि होए अवतार ॥
कई जुगति कीनो बिसथार ॥
कई बार पसरिओ पासार ॥
सदा सदा इकु एकंकार ॥
कई कोटि कीने बहु भाति ॥
प्रभ ते होए प्रभ माहि समाति ॥
ता का अंतु न जानै कोइ ॥
आपे आपि नानक प्रभु सोइ ॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: (धरती के नौ) खण्डों (चारों) खाणियों के द्वारा करोड़ों ही जीव उत्पन्न हुए हैं। सारे आकाशों ब्रहमण्डों में करोड़ों ही जीव हैं। करोड़ों ही प्राणी पैदा हो रहे हैं। कई तरीकों से प्रभू ने जगत की रचना की है। (प्रभू ने) कई बार जगत रचना की है; (दुबारा इसे समेट के) सदा एक स्वयं ही हो जाता है। प्रभू ने कई किस्मों के करोड़ों ही जीव पैदा किए हुए हैं। जो प्रभू से पैदा हो के फिर प्रभू में ही लीन हो जाते हैं। उस प्रभू का अंत कोई भी नहीं जानता; (क्योंकि) हे नानक ! वह प्रभू (अपने जैसा) स्वयं ही है। 7।
कई कोटि पारब्रहम के दास ॥
तिन होवत आतम परगास ॥
कई कोटि तत के बेते ॥
सदा निहारहि एको नेत्रे ॥
कई कोटि नाम रसु पीवहि ॥
अमर भए सद सद ही जीवहि ॥
कई कोटि नाम गुन गावहि ॥
आतम रसि सुखि सहजि समावहि ॥
अपुने जन कउ सासि सासि समारे ॥
नानक ओइ परमेसुर के पिआरे ॥8॥10॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: (इस जगत रचना में) करोड़ों जीव प्रभू के सेवक (भगत) हैं। उनके आतम में (प्रभू का) प्रकाश हो जाता है। करोड़ों जीव (जगत की) अस्लियत (अकाल-पुरख) के महरम हैं जो सदा एक प्रभू को आँखों से (हर जगह) देखते हैं। करोड़ों लोग प्रभू नाम का आनंद लेते हैं। वे जनम मरन से रहित हो के सदा ही जीते रहते हैं करोड़ों मनुष्य प्रभू नाम के गुण गाते हैं। वे आत्मिक आनंद में सुख में व अडोल अवस्था में टिके रहते हैं। प्रभू अपने भक्तों को हर दम याद रखता है। (क्योंकि) हे नानक ! वह भगत प्रभू के प्यारे होते हैं। 8। 10।
सलोकु ॥
करण कारण प्रभु एकु है दूसर नाही कोइ ॥
नानक तिसु बलिहारणै जलि थलि महीअलि सोइ ॥1॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: श्लोक॥ (इस सारे) जगत का (मूल-) कारण (भाव- बनाने वाला) एक अकाल-पुरख ही है, कोई दूसरा नहीं। हे नानक ! (मैं) उस प्रभू से सदके (हूँ), जो जल में थल में और धरती के तल पर (भाव। आकाश में मौजूद है)। 1।
असटपदी ॥
करन करावन करनै जोगु ॥
जो तिसु भावै सोई होगु ॥
खिन महि थापि उथापनहारा ॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: अष्टपदी। प्रभू (सब कुछ) करने की स्मर्था रखता है। और (जीवों को) काम करने के लिए प्रेरित करने के स्मर्थ भी है। वही कुछ होता है जो कुछ उसे अच्छा लगता है। आँख की झपक में जगत को पैदा करके नाश भी करने वाला है।

गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 8 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “करोड़ों देवते और इंद्र हैं जिनके सिर पर छत्र हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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