गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी छंत महला 1 ॥ हे प्रभू पति जी ! (मेरी विनती) सुनो। (आपके बिना) मैं जीव-स्त्री इस संसार-जंगल में अकेली हूँ। हे बेपरवाह प्रभू ! आप पति के बगैर मेरी जीवात्मा धैर्य नहीं पा सकती। जीव-स्त्री प्रभू-पति के बिना रह नहीं सकती (प्रभू-पति के बिना इसकी) जिंदगी की रात बहुत ही मुश्किल में गुजरती है। हे पति प्रभू ! मेरी विनती सुन। मुझे आपका प्यार अच्छा लगता है (आपके विछोड़े में) मुझे शांति नहीं आ सकती। प्यारे प्रभू-पति के बिना (इस जीवात्मा की) कोई बात नहीं पूछता। ये अकेली ही (इस संसार-जंगल में) पुकारती फिरती है। (पर) हे नानक ! जीव स्त्री तभी प्रभू-पति को मिल सकती है। यदि इसे गुरू मिलवा दे। वरना प्रीतम प्रभू के बिना दुख ही दुख बर्दाश्त करती है। 1। हे सहेलियो ! जिसे पति ने भुला दिया उसे और कौन (पति-प्रभू के साथ) मिला सकता है? हे सहेलियो ! जो जीव-दुल्हन गुरू के शबद द्वारा प्रभू के नाम-रस में प्रभू के प्रेम-रस में जुड़ती है। वह (अंतरात्मे) सुंदर हो जाती है। जब गुरू के शबद द्वारा जीव-स्त्री (अंतरात्मा में) सुंदर हो जाती है। तब (लोक-परलोक में) इज्जत कमाती है; ज्ञान का दीपक इसके शरीर में (हृदय में) प्रकाश कर देता है। हे सहेली ! सुन ! जो जीव-स्त्री सदा स्थिर रहने वाले प्रभू के गुण याद करती है। वह सदा स्थिर प्रभू में जुड़ के सुखी हो जाती है। जब सतिगुरू ने उसे अपने शबद में जोड़ा। तब प्रभू पति ने उसे अपने चरणों में मिला लिया। आत्मिक जीवन देने वाली बाणी की बरकति से उसका हृदय-कमल फूल खिल जाता है। हे नानक ! जीव-स्त्री तभी प्रभू-पति को मिलती है। जब (गुरू के शबद द्वारा) ये प्रभू पति के मन को प्यारी लगती है। 2। हे सहेली ! जिस जीव-स्त्री को मोहनी माया ने मोह लिया। जिसे नाशवंत पदार्थों के प्यार ने ठॅग लिया। वह नाशवंत पदार्थों के वणज में लग गई। (उसके गले में मोह की फाही पड़ जाती है) उसके गले की ये फाही अति प्यारे गुरू (की सहायता) के बिना नहीं खुल सकती। जो आदमी प्रभू से प्रीत डालता है। गुरू के शबद द्वारा प्रभू के गुणों को विचारता है। वह प्रभू का सेवक हो जाता है। (सिमरन के बिना सिफत सालाह के बिना) अनेकों पुन्न-दान करने से। अनेकों तीर्थ-स्नान करने से कोई जीव अपने अंदर की (विकारों की) मैल नहीं धो सकता। हठ करके इंद्रियों को रोकने का प्रयत्न करके जंगल में जाकर बैठने से कोई मनुष्य उच्च आत्मिक अवस्था प्राप्त नहीं कर सकता। हे नानक ! सदा स्थिर रहने वाले प्रभू का दरबार गुरू के शबद के द्वारा पहिचाना जा सकता है। प्रभू के बिना किसी और आसरे की झाक से उस दरबार को नहीं पाया जा सकता। 3। हे प्रभू जी ! आपका नाम सदा स्थिर रहने वाला है। आपकी सिफत सालाह की बाणी अटल है। आपके गुणों की विचार सदा स्थिर (कर्म) है। हे प्रभू ! आपका दरबार सदा-स्थिर है। आपका नाम और आपके नाम का व्यापार सदा साथ निभने वाला व्यापार है। परमात्मा के नाम का व्यापार स्वादिष्ट व्यापार है। भक्ती के व्यापार से सदा मुनाफा बढ़ता ही रहता है। प्रभू के नाम के बिना और कोई ऐसा सौदा नहीं जो सदा लाभ ही लाभ दे। हे भाई ! सदा छिन-छिन पल-पल नाम जपो। जिस मनुष्य ने नाम-व्यापार के लेखे की परख की। उस पर प्रभू की अटल मेहर की निगाह हुई। प्रभू की पूरी मेहर से उसने नाम-वखर (नाम-धन) हासिल कर लिया। हे नानक ! प्रभू का नाम सदा स्थिर रहने वाला और बहुत ही मीठे स्वाद वाला पदार्थ है। पूरे गुरू के द्वारा ही ये पदार्थ मिलता है। 4। 2।
रागु गउड़ी पूरबी छंत महला 3 ੴ सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥ सा धन बिनउ करे जीउ हरि के गुण सारे ॥ खिनु पलु रहि न सकै जीउ बिनु हरि पिआरे ॥ बिनु हरि पिआरे रहि न साकै गुर बिनु महलु न पाईऐ ॥ जो गुरु कहै सोई परु कीजै तिसना अगनि बुझाईऐ ॥ हरि साचा सोई तिसु बिनु अवरु न कोई बिनु सेविऐ सुखु न पाए ॥ नानक सा धन मिलै मिलाई जिस नो आपि मिलाए ॥1॥ धन रैणि सुहेलड़ीए जीउ हरि सिउ चितु लाए ॥ सतिगुरु सेवे भाउ करे जीउ विचहु आपु गवाए ॥ विचहु आपु गवाए हरि गुण गाए अनदिनु लागा भाओ ॥ सुणि सखी सहेली जीअ की मेली गुर कै सबदि समाओ ॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी पूरबी छंत महला 3 सतिनामु करता पुरखु गुरप्रसादि ॥ (जिस जीव स्त्री के हृदय में प्रभू-मिलाप की चाहत पैदा होती है। वह) जीव-स्त्री (प्रभू-दर पे) विनती करती है और परमात्मा के गुण (अपने हृदय में) संभालती है। प्यारे परमात्मा (के दर्शनों) के बगैर वह एक छिन भर एक पल भर (शांत-चित्त) नहीं रह सकती। प्यारे परमात्मा के दर्शन के बिना वह (शांत-चित्त) नहीं रह सकती। पर परमात्मा का ठिकाना गुरू के बिना पाया नहीं जा सकता। जो जो गुरू शिक्षा देता है उसे अच्छी तरह कमाया जाए तो। (मन में से) तृष्णा की आग बुझ जाती है। एक परमात्मा ही सदा कायम रहने वाला है। उसके बगैर (जगत में) और कोई (सदा साथ निभने वाला साथी) नहीं। उसकी शरण पड़े बिना जीव-स्त्री सुख नहीं पा सकती। हे नानक ! वही जीव स्त्री (गुरू की) मिलाई हुई (प्रभू-चरणों में) मिल सकती है जिसे प्रभू स्वयं मेहर (करके। अपने चरणों में) मिला ले। 1। जो जीव-स्त्री परमात्मा (के चरणों) से अपना चित्त जोड़े रखती है उस जीव-स्त्री की (जिंदगी रूपी) रात आसान बीतती है। वह जीव-स्त्री गुरू की शरण पड़ती है गुरू के साथ प्रेम करती है और अपने अंदर से अहं-अहंकार दूर करती है। जो जीव-स्त्री अपने अंदर से स्वैभाव दूर करती है सदा परमात्मा के गुण गाती रहती है। उसका हर वक्त प्रभू चरणों से प्यार बना रहता है। दिल-मिली (सत्संगी) सखियों-सहेलियों से (गुरू का शबद) सुन के गुरू के शबद में उसकी लीनता हुई रहती है।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “गउड़ी छंत महला 1 ॥ हे प्रभू पति जी ! (मेरी विनती) सुनो।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।