जो इसु मारे सु नामि समाहि ॥
जो इसु मारे तिस की त्रिसना बुझै ॥
जो इसु मारे सु दरगह सिझै ॥2॥
जो इसु मारे सो धनवंता ॥
जो इसु मारे सो पतिवंता ॥
जो इसु मारे सोई जती ॥
जो इसु मारे तिसु होवै गती ॥3॥
जो इसु मारे तिस का आइआ गनी ॥
जो इसु मारे सु निहचलु धनी ॥
जो इसु मारे सो वडभागा ॥
जो इसु मारे सु अनदिनु जागा ॥4॥
जो इसु मारे सु जीवन मुकता ॥
जो इसु मारे तिस की निरमल जुगता ॥
जो इसु मारे सोई सुगिआनी ॥
जो इसु मारे सु सहज धिआनी ॥5॥
इसु मारी बिनु थाइ न परै ॥ कोटि करम जाप तप करै ॥
इसु मारी बिनु जनमु न मिटै ॥
इसु मारी बिनु जम ते नही छुटै ॥6॥
इसु मारी बिनु गिआनु न होई ॥
इसु मारी बिनु जूठि न धोई ॥
इसु मारी बिनु सभु किछु मैला ॥
इसु मारी बिनु सभु किछु जउला ॥7॥
जा कउ भए क्रिपाल क्रिपा निधि ॥
तिसु भई खलासी होई सगल सिधि ॥
गुरि दुबिधा जा की है मारी ॥
कहु नानक सो ब्रहम बीचारी ॥8॥5॥
हरि सिउ जुरै त सभु को मीतु ॥
हरि सिउ जुरै त निहचलु चीतु ॥
हरि सिउ जुरै न विआपै काड़॑ा ॥
हरि सिउ जुरै त होइ निसतारा ॥1॥
रे मन मेरे तूं हरि सिउ जोरु ॥
काजि तुहारै नाही होरु ॥1॥ रहाउ ॥
वडे वडे जो दुनीआदार ॥
काहू काजि नाही गावार ॥
हरि का दासु नीच कुलु सुणहि ॥
तिस कै संगि खिन महि उधरहि ॥2॥
कोटि मजन जा कै सुणि नाम ॥
कोटि पूजा जा कै है धिआन ॥
कोटि पुंन सुणि हरि की बाणी ॥
कोटि फला गुर ते बिधि जाणी ॥3॥
मन अपुने महि फिरि फिरि चेत ॥
बिनसि जाहि माइआ के हेत ॥
हरि अबिनासी तुमरै संगि ॥
मन मेरे रचु राम कै रंगि ॥4॥
जा कै कामि उतरै सभ भूख ॥
जा कै कामि न जोहहि दूत ॥
जा कै कामि तेरा वड गमरु ॥
जा कै कामि होवहि तूं अमरु ॥5॥
जा के चाकर कउ नही डान ॥
जा के चाकर कउ नही बान ॥
जा कै दफतरि पुछै न लेखा ॥
ता की चाकरी करहु बिसेखा ॥6॥
जा कै ऊन नाही काहू बात ॥
एकहि आपि अनेकहि भाति ॥
जा की द्रिसटि होइ सदा निहाल ॥
मन मेरे करि ता की घाल ॥7॥
ना को चतुरु नाही को मूड़ा ॥
ना को हीणु नाही को सूरा ॥
गौड़ी राग रात के मध्य की धुन है, गहरी, चिंतन-प्रवण। ग्रंथ साहिब में यह सबसे ज़्यादा भरा हुआ राग है, अंग चौरानवें से तीन-सौ-छियालिस तक। एकांत में बैठने का सुर, अंदर की ओर मुड़ने का। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) जो मनुष्य इस दुबिधा को खत्म कर लेता है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।