नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: रागु गउड़ी गुआरेरी महला 1 चउपदे दुपदे परमात्मा एक है, उसका नाम सत्य है। वह सृष्टि का रचयिता सर्वशक्तिमान है। वह निडर है,वह कालातीत, अयोनि एवं स्वयंभू है। उसकी लब्धि गुरु-कृपा से होती है। प्रभू का डर बहुत भारी है इसका तौल बड़ा है (भाव, जिस मनुष्य के अंदर प्रभू का डर अदब बसता है उसका जीवन ठोस व गंभीर बन जाता है)। जिसकी मति उसके मन के पीछे चलती है वह होछी रहती है। वह होछा ही वचन बोलता है। अगर प्रभू का डर सिर पर धर के (भाव, कबूल करके) जीवन गुजारें और उसके डर का भार सह सकें (भाव, प्रभू का डर अदब सुखदायी लगने लग पड़े) तो प्रभू के मेहर की नजर से प्रभू की बख्शिश से (मानवता बारे) गुरू की (बताई हुई) विचार (जीवन का हिस्सा बन जाती है)। 1। (संसार विकारों भरा एक ऐसा समुंद्र है जिसमें परमातमा का) डर हृदय में बसाए बिना कोई पार नहीं गुजर सकता। (सिर्फ वही पार गुजरता है जिसने) प्रभू के डर में रह के और (प्रभू) प्यार के द्वारा (अपना जीवन) सवार के प्रभू का डर अदब (अपने हृदय में) टिका के रखा हुआ है (भाव, जिसने ये श्रद्धा बना ली है कि प्रभू मेरे अंदर और सबमें बसता है)। 1। रहाउ। प्रभू के डर-अदब में रहने से मनुष्य के अंदर प्रभू को मिलने की चाह टिकी रहती है। गुरू के शबद के द्वारा (आत्मिक जीवन को) सुंदर बना के ज्यों ज्यों इस यकीन में जीएं कि प्रभू हमारे अंदर है और सबके अंदर मौजूद है, ये चाहत और तेज होती जाती है। प्रभू का डर अदब रखे बिना (हमारे जीवन का विकास) हमारे मन की घाढ़त होछी हो जाती है, बिल्कुल होछी बनती जाती है, (क्योंकि) जिस साँचे में जीवन ढलता है वह होछापन पैदा करने वाला होता है, हमारे यत्न भी अज्ञानता वाले ही होते हैं। 2। हे नानक ! अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य की बुद्धि जगत-खेल में लगी रहती है। (जगत तमाशों का ही) चाव उसके अंदर पैदा होता रहता है। मनमुख चाहे हजारों अच्छाईआं भी करे, उसका जीवन ठीक साँचे में नहीं ढलता। मनमुख के बेअर्थ बोल होते हैं, वह अंधा ऊल-जलूल बातें ही करता है। 3। 1।
गउड़ी महला 1 ॥ डरि घरु घरि डरु डरि डरु जाइ ॥ सो डरु केहा जितु डरि डरु पाइ ॥ तुधु बिनु दूजी नाही जाइ ॥ जो किछु वरतै सभ तेरी रजाइ ॥1॥ डरीऐ जे डरु होवै होरु ॥ डरि डरि डरणा मन का सोरु ॥1॥ रहाउ ॥ ना जीउ मरै न डूबै तरै ॥ जिनि किछु कीआ सो किछु करै ॥ हुकमे आवै हुकमे जाइ ॥ आगै पाछै हुकमि समाइ ॥2॥ हंसु हेतु आसा असमानु ॥ तिसु विचि भूख बहुतु नै सानु ॥ भउ खाणा पीणा आधारु ॥ विणु खाधे मरि होहि गवार ॥3॥ जिस का कोइ कोई कोइ कोइ ॥ सभु को तेरा तूं सभना का सोइ ॥ जा के जीअ जंत धनु मालु ॥ नानक आखणु बिखमु बीचारु ॥4॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ (हे प्रभू !) आपके डर-अदब में रहने से वह आत्मिक अवस्था मिल जाती है जहां मन आपके चरणों में जुड़ा रहता है। हृदय में ये यकीन बन जाता है कि आप मेरे अंदर बसता है और सभमें बसता है। आपके डर में रहने से (दुनिया के हरेक किस्म का) डर सहम दूर हैं जाता है। आपका डर ऐसा नहीं होता कि उस डर में रहने से कोई और सहम टिका रहे। (हे प्रभू !) आपके बिना जीव का कोई और ठिकाना-आसरा नहीं। जगत में जो कुछ हैं रहा है सब आपकी मर्जी से हैं रहा है। 1। (हे प्रभू !आपका डर-अदब टिकने की जगह) अगर जीव के हृदय में कोई और डर टिका रहे, तो जीव सदा सहमा रहता है। मन की घबराहट मन का सहम हर वक्त बना रहता है। 1। रहाउ। (प्रभू के डर-अदब में रहने से ही ये यकीन बन सकता है कि) जीव ना मरता है। ना कहीं डूब सकता है ना ही कहीं से तैरता है (भाव, जो कभी डूबता ही नही, उसके तैरने का सवाल ही पैदा नहीं होता)। (ये यकीन बना रहता है कि) जिस परमात्मा ने ये जगत बनाया है, वही सब कुछ कर रहा है। उसके हुकम में ही जीव पैदा होता है और हुकम में ही मरता है। लोक परलोक में जीव को उसके हुकम में टिके रहना पड़ता है। 2।मोह है, अहंकार है उस हृदय में तृष्णा की कांग नदी की तरह (ठाठा मार रही) है। प्रभू का डर अदब ही आत्मिक जीवन की खुराक है, आत्मा का आसरा है। जो ये खुराक नहीं खाते वह (दुनिया के) सहम में रहके कमले हुए रहते हैं। 3। (हे प्रभू ! आपके डर-अदब में रहने से ही ये यकीन बनता है कि) जिस किसी का कोई सहयोगी बनता है कोई विरला ही बनता है (भाव, किसी का कोई सदा के लिए साथी सहायक नहीं बन सकता)। पर, हरेक जीव आपका (पैदा किया हुआ) है, आप सब की सार रखने वाला है। हे नानक ! जिस परमात्मा के ये सारे जीव-जन्तु पैदा किए हुए हैं (जीवों के वास्ते) उसी का ये धन माल (बनाया हुआ) है। (इससे ज्यादा ये) विचारना और कहना (कि वह प्रभू अपने पैदा किए जीवों की कैसे संभाल करता है) कठिन काम है। 4। 2।
गउड़ी महला 1 ॥ माता मति पिता संतोखु ॥ सतु भाई करि एहु विसेखु ॥1॥ कहणा है किछु कहणु न जाइ ॥ तउ कुदरति कीमति नही पाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: गउड़ी महला 1 ॥ अगर कोई जीव-स्त्री श्रेष्ठ मति को अपनी माँ बना ले (श्रेष्ठ मति की गोद में पले), संतोष का अपना पिता बनाए (संतोष रूपी पिता की निगरानी में रहे), खलकत की सेवा को विशेष भाई बनाए (ख़लकत की सेवा रूपी भाई का जीवन पर विशेष असर पड़े)। 1। हे प्रभू !आपके साथ मिलाप की अवस्था बयान नहीं हैं सकती। रक्ती मात्र बताई है, (क्योंकि) आपकी कुदरत का पूरा मूल्य नहीं पड़ सकता (भाव, कुदरति कैसी है, ये बताया नहीं जा सकता)। 1। रहाउ।
गौड़ी की धुन रात की देर के घंटों की है। एकाग्रता का स्वर। उत्तर-भारतीय परम्परा में अनेकानेक उप-राग गौड़ी से निकले हैं, और हर एक की अपनी पहचान है। गौड़ी राग का विस्तार ग्रंथ का सबसे लम्बा है। गुरु अर्जन की वाणी इसमें प्रमुख है, जो सत्रहवीं सदी के पहले दशक में संकलित हुई।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु गउड़ी गुआरेरी महला 1 चउपदे दुपदे परमात्मा एक है, उसका नाम सत्य है।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।