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अंग 15

अंग
15
राग Siree Raag
राग: Siree Raag · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
नानक कागद लख मणा पड़ि पड़ि कीचै भाउ ॥
मसू तोटि न आवई लेखणि पउणु चलाउ ॥
भी तेरी कीमति ना पवै हउ केवडु आखा नाउ ॥4॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: हे नानक! (कह, हे प्रभू! अगर मेरे पास आपकी वडियाईयों से भरे हुए) लाखों मन कागज़ हों, उनको बार बार पढ़ के विचार भी की जाए, यदि (आपकी वडियाई लिखने के वास्ते) मैं हवा को कलम बना लूँ (लिखते-लिखते) स्याही की भी कभी कमी ना आए, तो भी हे प्रभू! मैं आपका मुल्य नहीं पा सकता, मैं आपकी वडिआई महानता बताने के काबिल नहीं हूँ ।4।2
सिरीरागु महला 1 ॥
लेखै बोलणु बोलणा लेखै खाणा खाउ ॥
लेखै वाट चलाईआ लेखै सुणि वेखाउ ॥
लेखै साह लवाईअहि पड़े कि पुछण जाउ ॥1॥
बाबा माइआ रचना धोहु ॥
अंधै नामु विसारिआ ना तिसु एह न ओहु ॥1॥ रहाउ ॥
जीवण मरणा जाइ कै एथै खाजै कालि ॥
जिथै बहि समझाईऐ तिथै कोइ न चलिओ नालि ॥
रोवण वाले जेतड़े सभि बंनहि पंड परालि ॥2॥
सभु को आखै बहुतु बहुतु घटि न आखै कोइ ॥
कीमति किनै न पाईआ कहणि न वडा होइ ॥
साचा साहबु एकु तू होरि जीआ केते लोअ ॥3॥
नीचा अंदरि नीच जाति नीची हू अति नीचु ॥ नानकु तिन कै संगि साथि वडिआ सिउ किआ रीस ॥
जिथै नीच समालीअनि तिथै नदरि तेरी बखसीस ॥4॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ ये बात हर कोई जानता है कि हम जिंदगी की सांसे गिने-चुने समय के लिए ही ले रहे हैं, हमारा बोल-चाल, हमारा खाना पीना थोड़े ही समय के लिए है। जिस जीवन सफर पर हम चले हुए हैं ये सफर भी थोड़े ही समय के लिए है, (दुनिया के राग-रंग और रंग-तमाशे) सुनने देखने भी थोड़े ही समय के लिये हैं।1। हे भाई! माया की खेल (जीवों के लिये) चार दिन की ही खेल है। पर इस चार दिन की खेल में अंधे हुए मनुष्य ने प्रभू का नाम विसार दिया है, ना माया साथ ही निभती है ना प्रभू का नाम ही मिलता है।1।रहाउ। जगत में जनम से ले कर मरने तक सारी उम्र (मनुष्य) पदार्थ एकत्र करने की कोशिश में लगा रहता है। (जिनकी खातिर ये दौड़-भाग करता है, उनमें से) कोई भी उस जगह तक साथ नहीं निभाता जहाँ इसको (सारी जिंदगी किये कामों का लेखा) समझाया जाता है। (इसके मरने के बाद) इसको रोने वाले सारे ही संबंधी (इसके भार की) पराली की गठड़ी उठाते हैं (कयोंकि मरने वाले को कोई लाभ नहीं होता)।2। (हे प्रभू!) हरेक जीव (आपको) बहुत बहुत धन वास्ते ही कहता है, कोई भी थोड़ा नहीं मांगता, किसी ने भी कभी मांगने से बस नहीं की, मांग मांग के कभी कोई तृप्त नहीं हुआ (पर वह सारा ही धन यहाँ रह जाता है)। हे प्रभू! आप एक ही सदा कायम रहने वाला खालक है, और सारे जीअ-जंतु और सारे जगत मण्डल नाशवंत हैं।3। जो नीच से नीच जाति के हैं जो नीचों से भी अति नीच कहलाते हैं,(हे प्रभू! मैं आपसे यही मांगता हूँ कि आपका) नानक उन लोगों से साथ बनाये, मुझे मायाधारियों के राह पर चलने की कोई तमन्ना नहीं है (क्योंकि मुझे पता है कि) आपकी मंहर की नजर वहाँ है जहाँ गरीबों की सार ली जाती है।4।3
सिरीरागु महला 1 ॥
लबु कुता कूड़ु चूहड़ा ठगि खाधा मुरदारु ॥
पर निंदा पर मलु मुख सुधी अगनि क्रोधु चंडालु ॥
रस कस आपु सलाहणा ए करम मेरे करतार ॥1॥
बाबा बोलीऐ पति होइ ॥
ऊतम से दरि ऊतम कहीअहि नीच करम बहि रोइ ॥1॥ रहाउ ॥
रसु सुइना रसु रुपा कामणि रसु परमल की वासु ॥
रसु घोड़े रसु सेजा मंदर रसु मीठा रसु मासु ॥
एते रस सरीर के कै घटि नाम निवासु ॥2॥
जितु बोलिऐ पति पाईऐ सो बोलिआ परवाणु ॥
फिका बोलि विगुचणा सुणि मूरख मन अजाण ॥
जो तिसु भावहि से भले होरि कि कहण वखाण ॥3॥
तिन मति तिन पति तिन धनु पलै जिन हिरदै रहिआ समाइ ॥
तिन का किआ सालाहणा अवर सुआलिउ काइ ॥
नानक नदरी बाहरे राचहि दानि न नाइ ॥4॥4॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ हे मेरे करतार! मेरी तो ये करतूतें हैं,खाने का लालच (मेरे अंदर) कुत्ता है (जो हर वक्त खाने को मांगता है भौंकता है), झूठ (बोलने की आदत मेरे अंदर) चूहड़ा है (जिस ने मुझे बहुत नीच कर दिया है), (दूसरों को) ठॅग के खाना (मेरे अंदर) मुरदार है (जो स्वार्थ की बदबू बढ़ा रहा है), पराई निंदा मेरे मुंह में समूची पराई मैल है, क्रोधाग्नि (मेरे अंदर) चंडाल (बनी हुई है), मुझे कई चसके हैं, मैं अपने आप को वडिआता हूँ, स्वै-प्रशंसा में लिप्त हूँ।1। हे भाई! वे बोल बोलने चाहिए (जिससे प्रभू की हजूरी में) इज्जत मिले। वही मनुष्य (असल में) अच्छे हैं, जो परमेश्वर की हजूरी में अच्छे कहे जाते हैं, मंदकर्मी बंदे चिंता में झुरते ही हैं।1।रहाउ। सोना चांदी (एकत्र करने) का चस्का, स्त्री (भाव, काम) का चस्का, सुगंधियों की लगन, घोड़ों (की सवारी) का शौक, (नर्म नर्म) सेजों (सुंदर) महलों की लालसा, (स्वाद भरपूर) मीठे पदार्थ, तथा मास (खाने) का चस्का- अगर मनुष्य के शरीर को इतने चस्के लगे हुये हैं, तो परमात्मा के नाम का ठिकाना किस हृदय में हो सकता है? ।2। बोल वही बोले हुए बढ़िया हैं जिस बोल के बोलने से (प्रभू की हजूरी में) आदर मिलता है। हे मूर्ख अन्जान मन! सुन, फीके बोल (नाम रस विहीन) बोलने से दुख मिलता है (भाव, यदि सारी उम्र सिर्फ निरी-कोरी बातें ही करते रहे, जो प्रभू की याद से खाली हों तो दूखी ही रहते हैं) प्रभू की सिफत सलाह के बिना और सब बातें व्यर्थ हैं। जो मनुष्य (प्रभू की सिफत सलाह करके) उस प्रभू को प्यारे लगते हैं वही अच्छे हैं ।3। जिन लोगों के हृदय में प्रभू हर वक्त बस रहा है, वे अक्ल वाले हैं, इज्जत वाले हैं और धनवान हैं। ऐसे भले मनुष्यों की सिफतिनहीं की जा सकती। उनके जैसा खूबसूरत और कौन है? हे नानक! प्रभू की नज़र से वंचित लोग उसके नाम से नहीं जुड़ते, बल्कि, उसके दिए धन-पदार्थों में मस्त रहते हैं ।4।4।
सिरीरागु महला 1 ॥
अमलु गलोला कूड़ का दिता देवणहारि ॥
मती मरणु विसारिआ खुसी कीती दिन चारि ॥
सचु मिलिआ तिन सोफीआ राखण कउ दरवारु ॥1॥
नानक साचे कउ सचु जाणु ॥
जितु सेविऐ सुखु पाईऐ तेरी दरगह चलै माणु ॥1॥ रहाउ ॥
सचु सरा गुड़ बाहरा जिसु विचि सचा नाउ ॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: श्री राग महला 1 ॥ देनहार प्रभू ने स्वयं ही जगत को मोह रूपी अफीम का गोला जीवों को दिया हुआ है। (इस मोह अफीम को खा के) मस्त हुई जीवात्मा ने मौत को भुला दिया है, चार दिन की जिंदगी में रंग-रलियां मना रही है। जिन्होंने मोह का नशा त्याग के प्रमात्मा के दर पर पहुँचने की कोशिश की है, उन्हें स्थाई प्रभू मिल गया।1। हे नानक! सदा कायम रहने वाले परमात्मा के साथ सच्ची सांझ बना जिसका सिमरन करने से सुख मिलता है। (और अरदास कर कि हे प्रभू ! अपना नाम दे जिस करके) आपकी हजूरी में आदर मिल सके।1। रहाउ। सदा की मस्ती कायम रखने वाली शराब गुड़ के बिना ही तैयार की जाती है।

श्री राग की धुन में एक ठहराव है, सूर्यास्त के क़रीब के घंटे का। ग्रंथ में जब-कब यह राग खुलता है, स्वर में चमक के पीछे की उदासी सुनाई देती है। शास्त्रीय परम्परा में इसे रागों का मूल कहा गया है। श्री राग का यह आरम्भिक क्षेत्र है। गुरु नानक (1469-1539) से लेकर गुरु अर्जन (1563-1606) तक की रचनाएँ इसी विस्तार में।

नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे नानक! (कह, हे प्रभू! अगर मेरे पास आपकी वडियाईयों से भरे हुए) लाखों मन कागज़ हों, उनको बार बार पढ़ के विचार भी की जाए, यदि (आपकी वडियाई लिखने के वास्ते) मैं हवा को कलम बना लूँ (ल।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।