हउमै विचि जाग्रणु न होवई हरि भगति न पवई थाइ ॥ मनमुख दरि ढोई ना लहहि भाइ दूजै करम कमाइ ॥4॥ ध्रिगु खाणा ध्रिगु पैन॑णा जिन॑ा दूजै भाइ पिआरु ॥ बिसटा के कीड़े बिसटा राते मरि जंमहि होहि खुआरु ॥5॥ जिन कउ सतिगुरु भेटिआ तिना विटहु बलि जाउ ॥ तिन की संगति मिलि रहां सचे सचि समाउ ॥6॥ पूरै भागि गुरु पाईऐ उपाइ कितै न पाइआ जाइ ॥ सतिगुर ते सहजु ऊपजै हउमै सबदि जलाइ ॥7॥ हरि सरणाई भजु मन मेरे सभ किछु करणै जोगु ॥ नानक नामु न वीसरै जो किछु करै सु होगु ॥8॥2॥7॥2॥9॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! अहंकार में फसे रहने से (विकारों से) जगराता नहीं हो सकता। (अहंकार में टिक के रहके की हुई) परमात्मा की भगती (भी) कबूल नहीं होती। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य (प्रभू के बिना) अन्य के प्यार में कर्म कर-कर के परमात्मा के दर से आसरा नहीं तलाश सकते। 4। हे भाई ! जिन मनुष्यों की लगन माया के मोह में टिकी रहती है। (उनके बढ़िया-बढ़िया पदार्थ) खाना-पहनना (भी उनके लिए) धिक्कार-योग्य (जीवन ही बनाता) है। (जैसे) विष्टा के कीड़े विष्टा में ही मस्त रहते हैं (वैसे ही माया के मोह में फसे मनुष्य भी विकारों की गंदगी में ही पड़े रहते हैं। वे) जनम-मरण के चक्करों में फसे रहते हैं और दुखी होते रहते हैं। 5। हे भाई ! जिन (भाग्यशालियों) को गुरू मिल जाता है। मैं उन पर से बलिहार जाता हूँ (मेरी तमन्ना है कि) मैं उनकी संगति में टिका रहूं (और इस तरह) सदा-स्थिर-प्रभू (की याद) में लीन रहूँ। 6। पर। हे भाई ! गुरू बड़ी किस्मत से (ही) मिलता है। किसी भी (अन्य) तरीके से नहीं पाया जा सकता। (यदि गुरू मिल जाए। तो) गुरू के शबद की बरकति से (अंदर से) अहंकार जला के गुरू के माध्यम से (अंदर) आत्मिक अडोलता पैदा हो जाती है। 7। हे मेरे मन ! (गुरू के माध्यम से) परमात्मा की शरण पड़ा रह। परमात्मा सब कुछ करने की समर्थता वाला है। हे नानक ! (आप सदा अरदास करता रह कि परमात्मा का) नाम ना भूल जाए। होंगे वही जो कुछ वह स्वयं करता है (भाव। उसका नाम। उसकी मेहर से ही मिलेगा)। 8। 2। 7। 2। 9।
बिभास प्रभाती महला 5 असटपदीआ ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ मात पिता भाई सुतु बनिता ॥ चूगहि चोग अनंद सिउ जुगता ॥ उरझि परिओ मन मीठ मोुहारा ॥ गुन गाहक मेरे प्रान अधारा ॥1॥ एकु हमारा अंतरजामी ॥ धर एका मै टिक एकसु की सिरि साहा वड पुरखु सुआमी ॥1॥ रहाउ ॥ छल नागनि सिउ मेरी टूटनि होई ॥ गुरि कहिआ इह झूठी धोही ॥ मुखि मीठी खाई कउराइ ॥ अंम्रित नामि मनु रहिआ अघाइ ॥2॥ लोभ मोह सिउ गई विखोटि ॥ गुरि क्रिपालि मोहि कीनी छोटि ॥ इह ठगवारी बहुतु घर गाले ॥ हम गुरि राखि लीए किरपाले ॥3॥ काम क्रोध सिउ ठाटु न बनिआ ॥ गुर उपदेसु मोहि कानी सुनिआ ॥ जह देखउ तह महा चंडाल ॥ राखि लीए अपुनै गुरि गोपाल ॥4॥ दस नारी मै करी दुहागनि ॥ गुरि कहिआ एह रसहि बिखागनि ॥ इन सनबंधी रसातलि जाइ ॥ हम गुरि राखे हरि लिव लाइ ॥5॥ अहंमेव सिउ मसलति छोडी ॥ गुरि कहिआ इहु मूरखु होडी ॥ इहु नीघरु घरु कही न पाए ॥ हम गुरि राखि लीए लिव लाए ॥6॥ इन लोगन सिउ हम भए बैराई ॥ एक ग्रिह महि दुइ न खटांई ॥ आए प्रभ पहि अंचरि लागि ॥ करहु तपावसु प्रभ सरबागि ॥7॥ प्रभ हसि बोले कीए निआंएं ॥ सगल दूत मेरी सेवा लाए ॥ तूं ठाकुरु इहु ग्रिहु सभु तेरा ॥ कहु नानक गुरि कीआ निबेरा ॥8॥1॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: बिभास प्रभाती महला 5 असटपदीआ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! माता। पिता। भाई। पुत्र। स्त्री (परिवारों के ये सारे साथी) मिल के मौज से (माया के) भोग भोगते रहते हैं। (सबके) मन (माया के) मोह की मिठास में फसे रहते हें। (पर। गुरू की कृपा से परमात्मा के) गुणों के गाहक (संत जन) मेरी जिंदगी का आसरा बन गए हैं। 1। हे भाई ! सब के दिल की जानने वाला परमात्मा ही मेरा (रखवाला) है। मुझे सिर्फ परमात्मा का ही आसरा है। मुझे सिर्फ एक परमात्मा का ही सहारा है। (मेरा) वह मालिक बड़े बड़े बादशाहों के सिर पर (भी) खसम है। 1। रहाउ। गुरू की कृपा से) इस छल करने वाली सर्पनी (माया) से मेरा संबंध टूट गया है। हे भाई ! गुरू ने (मुझे) बता दिया है कि यह (माया) झूठी है और ठॅगी करने वाली है (यह माया उस चीज़ जैसी है जो) मुँह में मीठी लगती है। पर खाने में कड़वा स्वाद देती है। (सो। मेरा मन आत्मिक जीवन देने वाले हरी-नाम से तृप्त रहता है। 2। लोभ मोह (आदि) से मेरा ऐतबार खत्म हो चुका है। हे भाई ! कृपालु गुरू ने मेरे ऊपर बख्शिश की है। ठॅगों के इस टोले ने अनेकों घर (हृदय) तबाह कर दिए हैं। मुझे तो (इनसे) दया के सोमे गुरू ने बचा लिया है। 3। (इसलिए) काम क्रोध (आदि) से मेरी सांझ नहीं बनी। हे भाई ! गुरू का उपदेश मैंने बड़े ध्यान से सुना है। मैं जिधर देखता हूँ। उधर ये बड़े चण्डाल (अपना जोर डाल रहे हैं)। मुझे तो मेरे गुरू ने गोपाल ने (इनसे) बचा लिया है। 4। हे भाई ! (अपनी) दसों इन्द्रियों को मैंने छॅुटड़ कर दिया है (रसों की खुराक पहुँचानी बंद कर दी है। क्योंकि) गुरू ने (मुझे) बताया है कि यह रसों की आत्मिक मौत लाने वाली आग है। इन (रसों) से मेल रखने वाला (प्राणी) आत्मिक मौत की गहरी खाई में जा पड़ता है। हे भाई ! परमात्मा की लगन पैदा करके गुरू ने मुझे (इन रसों से) बचा लिया है। 5। हे भाई ! मैंने अहंकार से (भी) मेल-मिलाप छोड़ दिया है। गुरू ने (मुझे) बताया है कि यह (अहंकार) मूर्ख है जिद्दी है (अहंकार मनुष्य को मूर्ख और ज़िद्दी बना देता है)। (अब) ये (अहंकार) बेघर हो गया है (मेरे अंदर) इसको कोई ठिकाना नहीं मिलता। प्रभू-चरणों की लगन पैदा करके गुरू ने मुझे इस अहंकार से बचा लिया है। 6। हे भाई ! इन (काम क्रोध अहंकार आदिक) से मैं बे-वास्ता हैं गया हूँ (मेरा कोई मतलब नहीं रह गया)। एक ही (शरीर) घर में दोनों पक्षों का मेल नहीं हो सकता। मैं (अपने गुरू के) पल्ले से लग के प्रभू के दर पर आ गया हूँ। (और। अरदास करता हूं-) हे सर्वज्ञ प्रभू ! आप स्वयं ही न्याय कर। 7। हे भाई ! प्रभू जी हस के कहने लगे- हमने न्याय कर दिया है। हे भाई ! प्रभू ने (कामादिक यह) सारे वैरी मेरी सेवा में लगा दिए हैं। हे नानक ! कह- गुरू ने यह फ़ैसला कर दिया है (और कह दिया है-) यह (शरीर-) घर सारा आपका है। और अब आप इसका मालिक है (कामादिक इस पर जोर नहीं डाल सकेंगे)। 8। 1।
प्रभाती महला 5 ॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! अहंकार में फसे रहने से (विकारों से) जगराता नहीं हो सकता।”
बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।