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अंग 1346 · प्रभाती

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अंग
1346
प्रभाती
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  1. गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥
  2. भै भाइ जागे से जन जाग्रण करहि हउमै मैलु उतारि ॥

गुरु अमर दास जी · शबद · राग प्रभाती

गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥

प्रभाती महला 3 बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
गुर परसादी वेखु तू हरि मंदरु तेरै नालि ॥
हरि मंदरु सबदे खोजीऐ हरि नामो लेहु सम॑ालि ॥1॥
मन मेरे सबदि रपै रंगु होइ ॥
सची भगति सचा हरि मंदरु प्रगटी साची सोइ ॥1॥ रहाउ ॥
हरि मंदरु एहु सरीरु है गिआनि रतनि परगटु होइ ॥
मनमुख मूलु न जाणनी माणसि हरि मंदरु न होइ ॥2॥
हरि मंदरु हरि जीउ साजिआ रखिआ हुकमि सवारि ॥
धुरि लेखु लिखिआ सु कमावणा कोइ न मेटणहारु ॥3॥
सबदु चीनि॑ सुखु पाइआ सचै नाइ पिआर ॥
हरि मंदरु सबदे सोहणा कंचनु कोटु अपार ॥4॥
हरि मंदरु एहु जगतु है गुर बिनु घोरंधार ॥
दूजा भाउ करि पूजदे मनमुख अंध गवार ॥5॥
जिथै लेखा मंगीऐ तिथै देह जाति न जाइ ॥
साचि रते से उबरे दुखीए दूजै भाइ ॥6॥
हरि मंदर महि नामु निधानु है ना बूझहि मुगध गवार ॥
गुर परसादी चीनि॑आ हरि राखिआ उरि धारि ॥7॥
गुर की बाणी गुर ते जाती जि सबदि रते रंगु लाइ ॥
पवितु पावन से जन निरमल हरि कै नामि समाइ ॥8॥
हरि मंदरु हरि का हाटु है रखिआ सबदि सवारि ॥
तिसु विचि सउदा एकु नामु गुरमुखि लैनि सवारि ॥9॥
हरि मंदर महि मनु लोहटु है मोहिआ दूजै भाइ ॥
पारसि भेटिऐ कंचनु भइआ कीमति कही न जाइ ॥10॥
हरि मंदर महि हरि वसै सरब निरंतरि सोइ ॥
नानक गुरमुखि वणजीऐ सचा सउदा होइ ॥11॥1॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 बिभास ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। हे भाई! आप गुरू की कृपा से देखें। परमात्मा का घर आपके साथ है (आपके अंदर ही है। इस) 'हरी-मन्दिर' को गुरू के शबद से ही पाया जा सकता है (हे भाई! गुरू के शबद में जुड़ें। और) परमात्मा का नाम अपने अंदर संभाल के रखें। 1। हे मेरे मन! (जो मनुष्य गुरू के) शबद में रंगा जाता है (उसके मन को परमात्मा की भक्ति का) रंग चढ़ जाता है। उसको सदा-स्थिर प्रभू की भगती प्राप्त हो जाती है। उसकी शोभा सदा के लिए (लोक-परलोक में) बिखर जाती है। (उस मनुष्य का शरीर) परमात्मा का कभी ना डोलने वाला घर बन जाता है (उसका शरीर ऐसा 'हरी-मन्दिर' बन जाता है जिसको विकारों की अंधेरी उड़ा नहीं सकती)। 1। रहाउ। हे भाई! (मनुष्य का) यह शरीर 'हरि-मंदिर' है (पर, यह भेद सतिगुरू की बख्शी) आत्मिक जीवन की कीमती सूझ से ही खुलता है। अपने मन के पीछे चलने वाले (जगत के) मूल (परमात्मा) के साथ सांझ नहीं डालते (इसलिए वे समझते हैं कि) मनुष्य के अंदर 'हरि-मन्दिर' नहीं हो सकता। 2। हे भाई! (ये मनुष्य का शरीर) 'हरि-मन्दिर' प्रभू जी ने स्वयं बनाया है (और अपनी) आज्ञा से सजा रखा है। धुर-दरगाह से (हरेक मनुष्य के किए कर्मों के अनुसार जो) लेख (हरेक शरीर-हरि-मन्दिर में) लिखा जाता है उस लेख के अनुसार हरेक प्राणी को चलना पड़ता है। कोई मनुष्य (अपने किसी उद्यम से उस लेख को) मिटाने के काबिल नहीं। 3। हे भाई! (गुरू के शबद से) सदा-स्थिर-हरी-नाम से (जिस मनुष्य ने) प्यार किया। उसने गुरू के शबद के साथ सांझ डाल के आत्मिक आनंद प्राप्त किया। (उस मनुष्य का शरीर-) हरि-मन्दिर गुरू के शबद की बरकति से सुंदर बन गया। (वह हरि-मन्दिर) बेअंत प्रभू (के निवास) के लिए (जैसे) सोने का किला बन गया। 4। हे भाई! ये सारा संसार भी 'हरि-मन्दिर' ही है (परमात्मा के रहने का घर है)। पर गुरू (की शरण) के बिना (आत्मिक जीवन की ओर से) घॅुप अंधकार बना रहता है (और, जीवों को इस भेद की समझ नहीं पड़ती)। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य। आत्मिक जीवन की ओर से अंधे होए हुए मूर्ख मनुष्य (परमात्मा के बिना) औरों से प्यार डाल के उसको पूजते-सत्कारते रहते हैं। 5। हे भाई! जहाँ (परमात्मा की दरगाह में मनुष्य से उसके किए कर्मों का) हिसाब माँगा जाता है वहाँ (मनुष्य के साथ) ना (यह) शरीर जाता है ना (ऊँची-नीची) जाति जाती है। (जो मनुष्य) सदा-स्थिर हरी-नाम में रंगे रहते हैं। वे (वहाँ लेखा होने के वक्त) सुर्खरू हो जाते हैं। (जो) माया के प्यार में (ही जिंदगी के दिन गुजार जाते हैं। वे वहाँ) दुखी होते हैं। 6। हे भाई! (इस शरीर-) 'हरि-मन्दिर' में परमात्मा का नाम (मनुष्य के लिए) खजाना है। पर मूर्ख लोग (ये बात) नहीं समझते। जिन्होंने गुरू की कृपा से (ये भेद) समझ लिया। उन्होंने परमात्मा का नाम अपने हृदय में संभाल के रख लिया। 7। हे भाई! जो मनुष्य (गुरू के माध्यम से परमात्मा के संग) प्यार बना के गुरू के शबद में रंगे रहते हैं। वे मनुष्य गुरू से गुरू की बाणी (की कद्र) समझ लेते हैं। वे मनुष्य परमात्मा के नाम में लीन रह के स्वच्छ पवित्र जीवन वाले बन जाते हैं। 8। हे भाई! (यह मनुष्य का शरीर) 'हरि-मन्दिर' परमात्मा (के नाम-सौदे) की हाट है। इस (हाट) को गुरू शबद की बरकति से सजा कर रखा जा सकता है। इस (शरीर हाट) में परमात्मा का नाम-सौदा (मिल सकता) है। (पर, सिर्फ) गुरू के सन्मुख रहने वाले मनुष्य (ही अपने जीवन को) सुंदर बना के (ये सौदा) लेते हैं। 9। हे भाई! (जो मनुष्य) माया के मोह में (फस के आत्मिक जीवन की राशि पूँजी) लुटा बैठता हैं। (उसका) मन (इस शरीर-) 'हरि-मन्दिर' में लोहा (ही बना रहता) है। (पर, हाँ) यदि गुरू-पारस मिल जाए (तो लोहे जैसा निकम्मा बन चुका उसका मन) सोना हो जाता है (फिर वह इतने ऊँचे जीवन वाला हो जाता है कि उसका) मूल्य नहीं पाया जा सकता। 10। हे भाई! (इस शरीर-) 'हरि-मन्दिर' में परमात्मा (स्वयं) बसता है। वह परमात्मा सब जीवों में ही एक-रस बस रहा है। हे नानक! (सरब-निवासी प्रभू के नाम का सौदा) गुरू के द्वारा ही किया जा सकता है (वणज किया जा सकता है)। यह सौदा सदा कायम रहने वाला सौदा है। 11। 1।

गुरु अमर दास जी · शबद · राग प्रभाती

भै भाइ जागे से जन जाग्रण करहि हउमै मैलु उतारि ॥

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प्रभाती महला 3 ॥
भै भाइ जागे से जन जाग्रण करहि हउमै मैलु उतारि ॥
सदा जागहि घरु अपणा राखहि पंच तसकर काढहि मारि ॥1॥
मन मेरे गुरमुखि नामु धिआइ ॥
जितु मारगि हरि पाईऐ मन सेई करम कमाइ ॥1॥ रहाउ ॥
गुरमुखि सहज धुनि ऊपजै दुखु हउमै विचहु जाइ ॥
हरि नामा हरि मनि वसै सहजे हरि गुण गाइ ॥2॥
गुरमती मुख सोहणे हरि राखिआ उरि धारि ॥
ऐथै ओथै सुखु घणा जपि हरि हरि उतरे पारि ॥3॥

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 3 ॥ हे भाई! जो मनुष्य परमात्मा के डर-अदब में रह के परमात्मा के प्यार में टिक के (कामादिक विकारों के हमलों के प्रति) सुचेत रहते हैं। वे लोग ही (अपने मन में से) अहंकार की मैल उतार कर (असल) जगराते करते हैं (ऐसे मनुष्य) सदा सुचेत रहते हैं। अपना हृदय-घर (विकारों की मार से) बचा के रखते हैं (इन कामादिक) पाँच चोरों को (अपने अंदर से) मार के निकाल देते हैं। 1। हे मेरे मन! गुरू की शरण पड़ कर परमात्मा का नाम सिमरा करें। हे मन! (और-और पूजा के कर्म छोड़ के) वही कर्म किया करें। जिस राह पर चलने से परमात्मा का मिलाप हो सके। 1। रहाउ। हे भाई! गुरू की शरण पड़ने से (मनुष्य के अंदर) आत्मिक अडोलता की धुनि चल पड़ती है (मनुष्य के अंदर से) अहंकार का दुख दूर हो जाता है। आत्मिक अडोलता में परमात्मा के गुण गा-गा के परमात्मा का नाम सदा के लिए (मनुष्य के) मन में आ बसता है। 2। हे भाई! गुरू की मति पर चल के (जिन मनुष्यों ने) परमात्मा को अपने हृदय में बसा लिया। उनके मुँह (लोक-परलोक में) सुंदर हो जाते हैं। उनको इस लोक में और परलोक में बहुत आनंद तो मिलता है। परमात्मा का नाम सदा जप के वह मनुष्य संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। 3।

रचयिता और स्रोत

इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 3: गुरु अमर दास जी।

देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1346 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।