गुर समरथ सदा दइआल ॥
हरि जपि जपि नानक भए निहाल ॥4॥11॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ ॥
दीन दइआल भए किरपाला अपणा नामु आपि जपाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
संतसंगति मिलि भइआ प्रगास ॥
हरि हरि जपत पूरन भई आस ॥1॥
सरब कलिआण सूख मनि वूठे ॥
हरि गुण गाए गुर नानक तूठे ॥2॥12॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरु न दूजा ठाउ ॥
नाही बिनु हरि नाउ ॥
सरब सिधि कलिआन ॥
पूरन होहि सगल काम ॥1॥
हरि को नामु जपीऐ नीत ॥
काम क्रोध अहंकारु बिनसै लगै एकै प्रीति ॥1॥ रहाउ ॥
नामि लागै दूखु भागै सरनि पालन जोगु ॥
सतिगुरु भेटै जमु न तेटै जिसु धुरि होवै संजोगु ॥2॥
रैनि दिनसु धिआइ हरि हरि तजहु मन के भरम ॥
साधसंगति हरि मिलै जिसहि पूरन करम ॥3॥
जनम जनम बिखाद बिनसे राखि लीने आपि ॥
मात पिता मीत भाई जन नानक हरि हरि जापि ॥4॥1॥13॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रम राम राम राम जाप ॥
कलि कलेस लोभ मोह बिनसि जाइ अहं ताप ॥1॥ रहाउ ॥
आपु तिआगि संत चरन लागि मनु पवितु जाहि पाप ॥1॥
नानकु बारिकु कछू न जानै राखन कउ प्रभु माई बाप ॥2॥1॥14॥
चरन कमल सरनि टेक ॥
ऊच मूच बेअंतु ठाकुरु सरब ऊपरि तुही एक ॥1॥ रहाउ ॥
प्रान अधार दुख बिदार दैनहार बुधि बिबेक ॥1॥
नमसकार रखनहार मनि अराधि प्रभू मेक ॥
संत रेनु करउ मजनु नानक पावै सुख अनेक ॥2॥2॥15॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।
अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जिस) गुरू के शबद की बरकति से (परमात्मा मनुष्य के) हृदय में आ निवास करता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।