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अंग 1341

अंग
1341
राग प्रभाती
राग: प्रभाती · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर सबदे कीना रिदै निवासु ॥3॥
गुर समरथ सदा दइआल ॥
हरि जपि जपि नानक भए निहाल ॥4॥11॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: (जिस) गुरू के शबद की बरकति से (परमात्मा मनुष्य के) हृदय में आ निवास करता है। 3। हे नानक ! (कह- हे भाई !) गुरू सभ ताकतों का मालिक है। गुरू सदा ही दयावान रहता है। (गुरू की मेहर से) परमात्मा का नाम जप-जप के मन खिला रहता है। 4। 11।
प्रभाती महला 5 ॥
गुरु गुरु करत सदा सुखु पाइआ ॥
दीन दइआल भए किरपाला अपणा नामु आपि जपाइआ ॥1॥ रहाउ ॥
संतसंगति मिलि भइआ प्रगास ॥
हरि हरि जपत पूरन भई आस ॥1॥
सरब कलिआण सूख मनि वूठे ॥
हरि गुण गाए गुर नानक तूठे ॥2॥12॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ हे भाई ! गुरू को हर वक्त याद करते हुए सदा आत्मिक आनंद प्राप्त हुआ रहता है। गरीबों पर दया करने वाले प्रभू जी मेहरवान हो जाते हैं। और अपना नाम सवयं जपने के लिए (जीव को) प्रेरणा देते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! गुरू की संगति में मिल के (बैठने से मनुष्य के अंदर आत्मिक जीवन की सूझ का) प्रकाश हो जाता है। (गुरू की शरण पड़ कर) परमात्मा का नाम हर वक्त जपते हुए (हरेक) आशा पूरी हो जाती है। 1। (गुण गाने की बरकति से) सारे सुख-आनंद (मनुष्य के) मन में आ बसते हैं। हे नानक ! यदि गुरू मेहरबान हो जाए। तो परमात्मा के गुण गाए जा सकते हैं 2। 12।
प्रभाती महला 5 घरु 2 बिभास
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
अवरु न दूजा ठाउ ॥
नाही बिनु हरि नाउ ॥
सरब सिधि कलिआन ॥
पूरन होहि सगल काम ॥1॥
हरि को नामु जपीऐ नीत ॥
काम क्रोध अहंकारु बिनसै लगै एकै प्रीति ॥1॥ रहाउ ॥
नामि लागै दूखु भागै सरनि पालन जोगु ॥
सतिगुरु भेटै जमु न तेटै जिसु धुरि होवै संजोगु ॥2॥
रैनि दिनसु धिआइ हरि हरि तजहु मन के भरम ॥
साधसंगति हरि मिलै जिसहि पूरन करम ॥3॥
जनम जनम बिखाद बिनसे राखि लीने आपि ॥
मात पिता मीत भाई जन नानक हरि हरि जापि ॥4॥1॥13॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 घरु 2 बिभास सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (परमातमा के नाम के बिना हम जीवों का) और कोई दूसरा आसरा नहीं। परमात्मा के नाम के बिना (और कोई सहारा) नहीं। (हरी-नाम में ही) सारी सिद्धियाँ हैं सारे सुख हैं। (नाम जपने की बरकति से) सारे काम सफल हो जाते हैं। 1। हे भाई ! परमात्मा का नाम सदा जपना चाहिए। (जो मनुष्य जपता है उसके अंदर से) काम क्रोध अहंकार (आदि हरेक विकार) नाश हो जाता है। (उसके अंदर) एक परमात्मा का प्यार बना रहता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जो मनुष्य परमात्मा के) नाम में जुड़ता है (उसका हरेक) दुख दूर हो जाता है (क्योंकि परमात्मा) शरण पड़े मनुष्य की रक्षा कर सकने वाला है। हे भाई ! जिस मनुष्य को धुर-दरगाह से (गुरू के साथ) मिलाप का अवसर मिलता है। उसको गुरू मिल जाता है (और। उस मनुष्य पर) जम (भी) जोर नहीं डाल सकता। 2। हे भाई ! (अपने) मन की सारी भटकनें छोड़ो। और दिन-रात सदा परमात्मा का नाम जपते रहो। जिस मनुष्य के पूरे भाग्य जागते हैं। उसको गुरू की संगति में परमात्मा मिल जाता है। 3। (परमात्मा का नाम जपने से) अनेकों जन्मों के दुख-कलेश नाश हो जाते हैं। (दुखों-कलेशों से) परतमात्मा स्वयं ही बचा लेता है। हे दास नानक ! सदा परमात्मा का नाम जपा कर। परमात्मा ही माता पिता मित्र भाई है। 4। 1। 13।
प्रभाती महला 5 बिभास पड़ताल
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
रम राम राम राम जाप ॥
कलि कलेस लोभ मोह बिनसि जाइ अहं ताप ॥1॥ रहाउ ॥
आपु तिआगि संत चरन लागि मनु पवितु जाहि पाप ॥1॥
नानकु बारिकु कछू न जानै राखन कउ प्रभु माई बाप ॥2॥1॥14॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 बिभास पड़ताल सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! सर्व-व्यापक परमात्मा का नाम सदा जपा कर। (सिमरन की बरकति से) दुख कलेश लोभ मोह अहंकार का ताप – (हरेक विकार) नाश हो जाता है। 1। रहाउ। हे भाई ! स्वै-भाव छोड़ दे। संत जनों के चरणों में टिका रह। (इस तरह) मन पवित्र (हो जाता है। और सारे) पाप दूर हो जाते हैं। 1। हे भाई ! नानक (तो प्रभू का एक) अंजान बच्चा (इन विकारों से बचने का) कोई ढंग-तरीका नहीं जानता। प्रभू स्वयं ही बचा सकने वाला है। वह प्रभू ही (नानक का) माता-पिता है। 2। 1। 14।
प्रभाती महला 5 ॥
चरन कमल सरनि टेक ॥
ऊच मूच बेअंतु ठाकुरु सरब ऊपरि तुही एक ॥1॥ रहाउ ॥
प्रान अधार दुख बिदार दैनहार बुधि बिबेक ॥1॥
नमसकार रखनहार मनि अराधि प्रभू मेक ॥
संत रेनु करउ मजनु नानक पावै सुख अनेक ॥2॥2॥15॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: प्रभाती महला 5 ॥ (आपके) सुंदर चरणों की शरण ही (जीवों के लिए) आसरा है। हे प्रभू ! सभ जीवों के ऊपर एक आप ही (रखवाला) है। आप बेअंत ऊँचा मालिक है। आप बेअंत बड़ा मालिक है।1। रहाउ। हे प्रभू ! (आप सब जीवों की) जिंद का आसरा है। आप (सब जीवों के) दुख नाश करने वाला है। आप (जीवों को) अच्छे-बुरे कर्मों की परख कर सकने वाली बुद्धि (बिबेक) देने वाला है। 1। हे भाई ! सिर्फ (उस) प्रभू को ही (अपने) मन में सिमरा करो। उस सब की रक्षा कर सकने वाले को सिर झुकाया करो। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैं (उस प्रभू के) संत-जनों के चरणों की धूल में स्नान करता हूँ। (जो मनुष्य संत-जनों की चरण-धूड़ में स्नान करता है। वह) अनेकों सुख हासिल कर लेता है। 2। 2। 15।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

अर्जन देव जी एक compiler-कवि थे। उन्होंने अपने पूर्ववर्ती चार गुरुओं की वाणी, पन्द्रह हिन्दू भगतों की वाणी, ग्यारह भट्ट कवियों की प्रशंसा-वाणी, और अपनी स्वयं की सबसे बड़ी रचना-संख्या को एक साथ रख कर ग्रंथ का प्रथम-संकलन पूरा किया। यह क्षण सिख-इतिहास में 1604 का है।

इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जिस) गुरू के शबद की बरकति से (परमात्मा मनुष्य के) हृदय में आ निवास करता है।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।