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अंग 1310

अंग
1310
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
सतिगुरु दाता जीअ जीअन को भागहीन नही भावैगो ॥
फिरि एह वेला हाथि न आवै परतापै पछुतावैगो ॥7॥
जे को भला लोड़ै भल अपना गुर आगै ढहि ढहि पावैगो ॥
नानक दइआ दइआ करि ठाकुर मै सतिगुर भसम लगावैगो ॥8॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: (जब) गुरू की कृपा से (उसके अंदर से) (अहंकार की आग) बुझ जाती है। तब गुरू की मति की बरकति से वह हरी-नाम में लीन रहता है। 6। हे भाई ! गुरू सब जीवों के आत्मिक-जीवन का दाता है। पर बद्-किस्मत मनुष्य को गुरू प्यारा नहीं लगता। (वह गुरू की शरण पड़ के आत्मिक जीवन की दाति नहीं लेता। जिंदगी का समय गुजर जाता है) दोबारा यह समय हाथ नहीं आता। तब दुखी होता है और हाथ मलता है। 7। हे भाई ! यदि कोई मनुष्य अपना भला चाहता है (तो उसे चाहिए कि वह) गुरू के दर पर स्वैभाव गवा के पड़ा रहे।
कानड़ा महला 4 ॥
मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥
भै भै त्रास भए है निरमल गुरमति लागि लगावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
हरि रंगि राता सद बैरागी हरि निकटि तिना घरि आवैगो ॥
तिन की पंक मिलै तां जीवा करि किरपा आपि दिवावैगो ॥1॥
दुबिधा लोभि लगे है प्राणी मनि कोरै रंगु न आवैगो ॥
फिरि उलटिओ जनमु होवै गुर बचनी गुरु पुरखु मिलै रंगु लावैगो ॥2॥
इंद्री दसे दसे फुनि धावत त्रै गुणीआ खिनु न टिकावैगो ॥
सतिगुर परचै वसगति आवै मोख मुकति सो पावैगो ॥3॥
ओअंकारि एको रवि रहिआ सभु एकस माहि समावैगो ॥
एको रूपु एको बहु रंगी सभु एकतु बचनि चलावैगो ॥4॥
गुरमुखि एको एकु पछाता गुरमुखि होइ लखावैगो ॥
गुरमुखि जाइ मिलै निज महली अनहद सबदु बजावैगो ॥5॥
जीअ जंत सभ सिसटि उपाई गुरमुखि सोभा पावैगो ॥
बिनु गुर भेटे को महलु न पावै आइ जाइ दुखु पावैगो ॥6॥
अनेक जनम विछुड़े मेरे प्रीतम करि किरपा गुरू मिलावैगो ॥
सतिगुर मिलत महा सुखु पाइआ मति मलीन बिगसावैगो ॥7॥
हरि हरि क्रिपा करहु जगजीवन मै सरधा नामि लगावैगो ॥
नानक गुरू गुरू है सतिगुरु मै सतिगुरु सरनि मिलावैगो ॥8॥4॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (आप भी कह-) हे मेरे ठाकुर ! (मेरे पर) मेहर कर। मेहर कर। मेरे माथे पर गुरू के चरणों की धूड़ लगी रहे। 8। 3। कानड़ा महला 4 ॥ हे भाई ! (उसका) मन प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा जाता है (इस रंग में रंगीज़ के वह मनुष्य सदा परमात्मा के गुण) गाता रहता है। (जो मनुष्य अपने मन को परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगने के लिए मन को) गुरू की मति की ‘पाह’ (लाग) देता है। उसके सारे (मलीन) डर और सहम पवित्र (अदब-सत्कार) बन जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के प्यार रंग में रंगा हुआ मनुष्य माया के मोह के प्रति उपराम रहता है। प्रभू (प्रेम-रंग में रंगे मनुष्यों के सदा) नजदीक बसता है। उनके (हृदय-) घर में आ टिकता है। हे भाई ! अगर मुझे उन (भाग्यशाली मनुष्यों) की चरण-धूल मिले। तो मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता हूँ। (पर ये चरण-धूल प्रभू) स्वयं ही कृपा करके दिलवाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य मेर-तेर में लोभ में फसे रहते हैं। उनके कोरे मन पर (प्रभू का प्यार-) रंग नहीं चढ़ सकता। फिर जब गुरू के वचनों के द्वारा (उनका मन दुबिधा-लोभ आदि से) पलटता है। (तब उन्हें नया आत्मिक) जनम मिलता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) गुरू पुरख मिल जाता है (उसके मन को प्रभू-प्यार का) रंग चढ़ा देता है। 2। हे भाई ! मनुष्य की ये दसों इन्द्रियां मुड़-मुड़ के भटकती-फिरती हें। (माया के) तीन गुणों में ग्रसित मन रक्ती भर समय के लिए भी (एक जगह पर) नहीं टिकता। जब गुरू (किसी मनुष्य पर) प्रसन्न होता है तो उसका मन वश में आ जाता है। वह मनुष्य विकारों से मुक्ति हासिल कर लेता है। 3। हे भाई ! परमात्मा एक स्वयं ही सब जगह व्यापक है। उस एक सर्व-व्यापक में ही सारा जगत लीन हो जाता है। वह परमात्मा (कभी) एक स्वयं ही स्वयं होता है। वह खुद ही (जगत रच के) अनेकों रंगों वाला बन जाता है। सारे जगत को वह प्रभू एक अपने ही हुकम में चला रहा है। 4। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (हर जगह) एक परमात्मा को ही (बसता) पहचानता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के (मनुष्य) यह भेद समझ लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू-चरणों में जा पहुँचता है। वह (अपने अंदर) गुरू के शबद का निरंतर प्रबल प्रभाव डाले रखता है। 5। हे भाई ! (वैसे तो) सारे जीव-जंतु (प्रभू के पैदा किए हुए हैं)। सारी सृष्टि (प्रभू ने ही) पैदा की है। (पर) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (लोक-परलोक में) वडिआई हासिल करता है। हे भाई ! गुरू को मिले बिना कोई भी मनुष्य प्रभू के चरणों में जगह नहीं ले सकता (बल्कि) जनम-मरन के चक्करों में पड़ कर दुख ही भोगता है। 6। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (जीव) अनेकों ही जनम (आपके चरणों से) विछुड़े रहते हैं। गुरू (ही) मेहर कर के (उनको आपके साथ) मिलाता है। हे भाई ! गुरू को मिलते (ही मनुष्य) बहुत आनंद प्राप्त कर लेता है। (मनुष्य की विकारों में) मैली हो चुकी मति को (गुरू) खुशी उल्लास में ले आता है। 7। हे जगत के जीवन हरी ! मेहर कर। (गुरू) मेरी श्रद्धा (आपके) नाम में बनाए रखे।
कानड़ा महला 4 ॥
मन गुरमति चाल चलावैगो ॥
जिउ मैगलु मसतु दीजै तलि कुंडे गुर अंकसु सबदु द्रिड़ावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
चलतौ चलै चलै दह दह दिसि गुरु राखै हरि लिव लावैगो ॥
सतिगुरु सबदु देइ रिद अंतरि मुखि अंम्रितु नामु चुआवैगो ॥1॥
बिसीअर बिसू भरे है पूरन गुरु गरुड़ सबदु मुखि पावैगो ॥
माइआ भुइअंग तिसु नेड़ि न आवै बिखु झारि झारि लिव लावैगो ॥2॥
सुआनु लोभु नगर महि सबला गुरु खिन महि मारि कढावैगो ॥
सतु संतोखु धरमु आनि राखे हरि नगरी हरि गुन गावैगो ॥3॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे नानक ! (कह- प्रभू-चरणों में जुड़ने के लिए) गुरू ही (वसीला) है। गुरू ही (विचोलिया) है। गुरू ही मुझे प्रभू की शरण में टिकाए रख सकता है। 8। 4। कानड़ा महला 4 ॥ हे मन ! (आपको) गुरू की शिक्षा (ही सही जीवन की) चाल चला सकती है। हे भाई ! गुरू का शबद (जैसे। वह) अंकुश है (जिससे हाथी को नियंत्रित किया जाता है)। जैसे मस्त हाथी को अंकुश के तले रखा जाता है (वैसे ही गुरू अपना) शबद (मनुष्य के) हृदय में दृढ़ कर देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य का मन) मुड़-मुड़ के दसों-दिशाओं में भटकता फिरता है। गुरू (इसको) भटकने से बचाता है (इसके अंदर) परमात्मा के प्रति प्यार पैदा करता है। गुरू (अपना) शबद (मनुष्य के) हृदय में टिका देता है। और उस के मुँह में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल चुआता है। 1। हे भाई ! साँप जहर से लबा-लब भरे होते हैं (उनके असर से बचाने के लिए) गारुड़ मंत्र है (इसी तरह) गुरू (अपना) शबद (-मंत्र जिस मनुष्य के) मुँह में डाल देता है। माया-रूपी सर्पनी उसके नजदीक भी नहीं फटकती। (गुरू-शबद-मंत्र की बरकति से उसका) जहर झाड़-झाड़ के (उसके अंदर) परमात्मा की लगन पैदा कर देता है। 2। हे भाई ! लोभ-कुक्ता (मनुष्य के) शरीर-नगर में बलवान हुआ रहता है। पर। गुरू एक छिन में (इस कुत्ते को) मार के (उसके अंदर से) निकाल देता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(जब) गुरू की कृपा से (उसके अंदर से) (अहंकार की आग) बुझ जाती है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।