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1310
कानड़ा
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सतिगुरु दाता जीअ जीअन को भागहीन नही भावैगो ॥
सतिगुरु दाता जीअ जीअन को भागहीन नही भावैगो ॥
फिरि एह वेला हाथि न आवै परतापै पछुतावैगो ॥7॥
जे को भला लोड़ै भल अपना गुर आगै ढहि ढहि पावैगो ॥
नानक दइआ दइआ करि ठाकुर मै सतिगुर भसम लगावैगो ॥8॥3॥
फिरि एह वेला हाथि न आवै परतापै पछुतावैगो ॥7॥
जे को भला लोड़ै भल अपना गुर आगै ढहि ढहि पावैगो ॥
नानक दइआ दइआ करि ठाकुर मै सतिगुर भसम लगावैगो ॥8॥3॥
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! गुरू सब जीवों के आत्मिक-जीवन का दाता है। पर बद्-किस्मत मनुष्य को गुरू प्यारा नहीं लगता। (वह गुरू की शरण पड़ के आत्मिक जीवन की दाति नहीं लेता। जिंदगी का समय गुजर जाता है) दोबारा यह समय हाथ नहीं आता। तब दुखी होता है और हाथ मलता है। 7। हे भाई ! यदि कोई मनुष्य अपना भला चाहता है (तो उसे चाहिए कि वह) गुरू के दर पर स्वैभाव गवा के पड़ा रहे। हे नानक ! (आप भी कह-) हे मेरे ठाकुर ! (मेरे पर) मेहर कर। मेहर कर। मेरे माथे पर गुरू के चरणों की धूड़ लगी रहे। 8। 3।
मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥
कानड़ा महला 4 ॥
मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥
भै भै त्रास भए है निरमल गुरमति लागि लगावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
हरि रंगि राता सद बैरागी हरि निकटि तिना घरि आवैगो ॥
तिन की पंक मिलै तां जीवा करि किरपा आपि दिवावैगो ॥1॥
दुबिधा लोभि लगे है प्राणी मनि कोरै रंगु न आवैगो ॥
फिरि उलटिओ जनमु होवै गुर बचनी गुरु पुरखु मिलै रंगु लावैगो ॥2॥
इंद्री दसे दसे फुनि धावत त्रै गुणीआ खिनु न टिकावैगो ॥
सतिगुर परचै वसगति आवै मोख मुकति सो पावैगो ॥3॥
ओअंकारि एको रवि रहिआ सभु एकस माहि समावैगो ॥
एको रूपु एको बहु रंगी सभु एकतु बचनि चलावैगो ॥4॥
गुरमुखि एको एकु पछाता गुरमुखि होइ लखावैगो ॥
गुरमुखि जाइ मिलै निज महली अनहद सबदु बजावैगो ॥5॥
जीअ जंत सभ सिसटि उपाई गुरमुखि सोभा पावैगो ॥
बिनु गुर भेटे को महलु न पावै आइ जाइ दुखु पावैगो ॥6॥
अनेक जनम विछुड़े मेरे प्रीतम करि किरपा गुरू मिलावैगो ॥
सतिगुर मिलत महा सुखु पाइआ मति मलीन बिगसावैगो ॥7॥
हरि हरि क्रिपा करहु जगजीवन मै सरधा नामि लगावैगो ॥
नानक गुरू गुरू है सतिगुरु मै सतिगुरु सरनि मिलावैगो ॥8॥4॥
मनु हरि रंगि राता गावैगो ॥
भै भै त्रास भए है निरमल गुरमति लागि लगावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
हरि रंगि राता सद बैरागी हरि निकटि तिना घरि आवैगो ॥
तिन की पंक मिलै तां जीवा करि किरपा आपि दिवावैगो ॥1॥
दुबिधा लोभि लगे है प्राणी मनि कोरै रंगु न आवैगो ॥
फिरि उलटिओ जनमु होवै गुर बचनी गुरु पुरखु मिलै रंगु लावैगो ॥2॥
इंद्री दसे दसे फुनि धावत त्रै गुणीआ खिनु न टिकावैगो ॥
सतिगुर परचै वसगति आवै मोख मुकति सो पावैगो ॥3॥
ओअंकारि एको रवि रहिआ सभु एकस माहि समावैगो ॥
एको रूपु एको बहु रंगी सभु एकतु बचनि चलावैगो ॥4॥
गुरमुखि एको एकु पछाता गुरमुखि होइ लखावैगो ॥
गुरमुखि जाइ मिलै निज महली अनहद सबदु बजावैगो ॥5॥
जीअ जंत सभ सिसटि उपाई गुरमुखि सोभा पावैगो ॥
बिनु गुर भेटे को महलु न पावै आइ जाइ दुखु पावैगो ॥6॥
अनेक जनम विछुड़े मेरे प्रीतम करि किरपा गुरू मिलावैगो ॥
सतिगुर मिलत महा सुखु पाइआ मति मलीन बिगसावैगो ॥7॥
हरि हरि क्रिपा करहु जगजीवन मै सरधा नामि लगावैगो ॥
नानक गुरू गुरू है सतिगुरु मै सतिगुरु सरनि मिलावैगो ॥8॥4॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे भाई ! (उसका) मन प्रभू के प्रेम-रंग में रंगा जाता है (इस रंग में रंगीज़ के वह मनुष्य सदा परमात्मा के गुण) गाता रहता है। (जो मनुष्य अपने मन को परमात्मा के प्रेम-रंग में रंगने के लिए मन को) गुरू की मति की 'पाह' (लाग) देता है। उसके सारे (मलीन) डर और सहम पवित्र (अदब-सत्कार) बन जाते हैं। 1। रहाउ। हे भाई ! परमात्मा के प्यार रंग में रंगा हुआ मनुष्य माया के मोह के प्रति उपराम रहता है। प्रभू (प्रेम-रंग में रंगे मनुष्यों के सदा) नजदीक बसता है। उनके (हृदय-) घर में आ टिकता है। हे भाई ! अगर मुझे उन (भाग्यशाली मनुष्यों) की चरण-धूल मिले। तो मैं आत्मिक जीवन प्राप्त कर लेता हूँ। (पर ये चरण-धूल प्रभू) स्वयं ही कृपा करके दिलवाता है। 1। हे भाई ! जो मनुष्य मेर-तेर में लोभ में फसे रहते हैं। उनके कोरे मन पर (प्रभू का प्यार-) रंग नहीं चढ़ सकता। फिर जब गुरू के वचनों के द्वारा (उनका मन दुबिधा-लोभ आदि से) पलटता है। (तब उन्हें नया आत्मिक) जनम मिलता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य को) गुरू पुरख मिल जाता है (उसके मन को प्रभू-प्यार का) रंग चढ़ा देता है। 2। हे भाई ! मनुष्य की ये दसों इन्द्रियां मुड़-मुड़ के भटकती-फिरती हें। (माया के) तीन गुणों में ग्रसित मन रक्ती भर समय के लिए भी (एक जगह पर) नहीं टिकता। जब गुरू (किसी मनुष्य पर) प्रसन्न होता है तो उसका मन वश में आ जाता है। वह मनुष्य विकारों से मुक्ति हासिल कर लेता है। 3। हे भाई ! परमात्मा एक स्वयं ही सब जगह व्यापक है। उस एक सर्व-व्यापक में ही सारा जगत लीन हो जाता है। वह परमात्मा (कभी) एक स्वयं ही स्वयं होता है। वह खुद ही (जगत रच के) अनेकों रंगों वाला बन जाता है। सारे जगत को वह प्रभू एक अपने ही हुकम में चला रहा है। 4। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य (हर जगह) एक परमात्मा को ही (बसता) पहचानता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख हो के (मनुष्य) यह भेद समझ लेता है। गुरू के सन्मुख रहने वाला मनुष्य प्रभू-चरणों में जा पहुँचता है। वह (अपने अंदर) गुरू के शबद का निरंतर प्रबल प्रभाव डाले रखता है। 5। हे भाई ! (वैसे तो) सारे जीव-जंतु (प्रभू के पैदा किए हुए हैं)। सारी सृष्टि (प्रभू ने ही) पैदा की है। (पर) जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ता है। वह (लोक-परलोक में) वडिआई हासिल करता है। हे भाई ! गुरू को मिले बिना कोई भी मनुष्य प्रभू के चरणों में जगह नहीं ले सकता (बल्कि) जनम-मरन के चक्करों में पड़ कर दुख ही भोगता है। 6। हे मेरे प्रीतम प्रभू ! (जीव) अनेकों ही जनम (आपके चरणों से) विछुड़े रहते हैं। गुरू (ही) मेहर कर के (उनको आपके साथ) मिलाता है। हे भाई ! गुरू को मिलते (ही मनुष्य) बहुत आनंद प्राप्त कर लेता है। (मनुष्य की विकारों में) मैली हो चुकी मति को (गुरू) खुशी उल्लास में ले आता है। 7। हे जगत के जीवन हरी ! मेहर कर। (गुरू) मेरी श्रद्धा (आपके) नाम में बनाए रखे। हे नानक ! (कह- प्रभू-चरणों में जुड़ने के लिए) गुरू ही (वसीला) है। गुरू ही (विचोलिया) है। गुरू ही मुझे प्रभू की शरण में टिकाए रख सकता है। 8। 4।
मन गुरमति चाल चलावैगो ॥
कानड़ा महला 4 ॥
मन गुरमति चाल चलावैगो ॥
जिउ मैगलु मसतु दीजै तलि कुंडे गुर अंकसु सबदु द्रिड़ावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
चलतौ चलै चलै दह दह दिसि गुरु राखै हरि लिव लावैगो ॥
सतिगुरु सबदु देइ रिद अंतरि मुखि अंम्रितु नामु चुआवैगो ॥1॥
बिसीअर बिसू भरे है पूरन गुरु गरुड़ सबदु मुखि पावैगो ॥
माइआ भुइअंग तिसु नेड़ि न आवै बिखु झारि झारि लिव लावैगो ॥2॥
सुआनु लोभु नगर महि सबला गुरु खिन महि मारि कढावैगो ॥
सतु संतोखु धरमु आनि राखे हरि नगरी हरि गुन गावैगो ॥3॥
मन गुरमति चाल चलावैगो ॥
जिउ मैगलु मसतु दीजै तलि कुंडे गुर अंकसु सबदु द्रिड़ावैगो ॥1॥ रहाउ ॥
चलतौ चलै चलै दह दह दिसि गुरु राखै हरि लिव लावैगो ॥
सतिगुरु सबदु देइ रिद अंतरि मुखि अंम्रितु नामु चुआवैगो ॥1॥
बिसीअर बिसू भरे है पूरन गुरु गरुड़ सबदु मुखि पावैगो ॥
माइआ भुइअंग तिसु नेड़ि न आवै बिखु झारि झारि लिव लावैगो ॥2॥
सुआनु लोभु नगर महि सबला गुरु खिन महि मारि कढावैगो ॥
सतु संतोखु धरमु आनि राखे हरि नगरी हरि गुन गावैगो ॥3॥
हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे मन ! (आपको) गुरू की शिक्षा (ही सही जीवन की) चाल चला सकती है। हे भाई ! गुरू का शबद (जैसे। वह) अंकुश है (जिससे हाथी को नियंत्रित किया जाता है)। जैसे मस्त हाथी को अंकुश के तले रखा जाता है (वैसे ही गुरू अपना) शबद (मनुष्य के) हृदय में दृढ़ कर देता है। 1। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य का मन) मुड़-मुड़ के दसों-दिशाओं में भटकता फिरता है। गुरू (इसको) भटकने से बचाता है (इसके अंदर) परमात्मा के प्रति प्यार पैदा करता है। गुरू (अपना) शबद (मनुष्य के) हृदय में टिका देता है। और उस के मुँह में आत्मिक जीवन देने वाला नाम-जल चुआता है। 1। हे भाई ! साँप जहर से लबा-लब भरे होते हैं (उनके असर से बचाने के लिए) गारुड़ मंत्र है (इसी तरह) गुरू (अपना) शबद (-मंत्र जिस मनुष्य के) मुँह में डाल देता है। माया-रूपी सर्पनी उसके नजदीक भी नहीं फटकती। (गुरू-शबद-मंत्र की बरकति से उसका) जहर झाड़-झाड़ के (उसके अंदर) परमात्मा की लगन पैदा कर देता है। 2। हे भाई ! लोभ-कुक्ता (मनुष्य के) शरीर-नगर में बलवान हुआ रहता है। पर। गुरू एक छिन में (इस कुत्ते को) मार के (उसके अंदर से) निकाल देता है। (गुरू ने) सत-संतोख-धर्म (ये गुण) साध-संगति-नगरी में ला के रखे हुए हैं (लोभ-कुत्ते से बचने के लिए मनुष्य) साध-संगति में परमात्मा के गुण गाता रहता है। 3।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 4: गुरु राम दास जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1310 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।