अंग 12, सो पुरखु समाप्ति + सोहिला प्रारम्भ

SGGS, Ang
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सो पुरखु (समाप्ति) → सोहिला (प्रारम्भ)
राग: राग आसा → राग गउड़ी दीपकी · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5) → गुरु नानक देव जी (महला 1) · महला 5 → महला 1
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यह अंग रेहरास साहिब के सबसे महत्त्वपूर्ण border पर बैठा है। ऊपरी हिस्से में गुरु अर्जन देव जी (महला 5) का “सो पुरखु” का अंतिम शबद है, जो पूरे So Purakh section को surrender की note पर बंद करता है। फिर एक नया “ੴ सतिगुर प्रसादि” आता है, और सोहिला, रात की बानी, शुरू होती है।
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आसा महला ५ ॥ तू दाता जीआ सभना का तेरा दिता पैनहि खाहि ॥ जेहा तूं फुरमावहि तेहा को करे जेहा करावहि तेहा करेहि ॥ तेरै वसि कोइ नही दूजा करत बीआई ॥ तूं प्रब दानु अनिक रूप करता आपे ही करता का करता ॥ जो भावै सो करै सोई करता करे करावै आपणी रजाई ॥१॥

सो पुरखु section का closing शबद। गुरु अर्जन देव जी (M5) यहाँ पूरे section की energy को एक final surrender में gather कर रहे हैं।

“तू दाता जीआ सभना का।” “तू सब जीवों का दाता।” “तेरा दिता पैनहि खाहि।” “तेरा दिया (वस्त्र) पहनते हैं, (अन्न) खाते हैं।”

opening declaration छोटी सी मगर definitive है। हर रोटी जो तू खाता है, हर कपड़ा जो तू पहनता है, सब किसी और का दिया है। हम सिर्फ़ recipients हैं। दिल्ली के एक middle-class परिवार में, बच्चा जब “मेरा खाना” कहता है, माँ कभी-कभी रोक कर कहती है, “ये किसका दिया है पहले सोचो।” गुरु अर्जन वही reminder cosmic level पर दे रहे हैं।

“जेहा तूं फुरमावहि तेहा को करे।” “जैसा तू ‘फ़रमाता’ है, वैसा कोई करता है।” “जेहा करावहि तेहा करेहि।” “जैसा करवाता है, वैसा करते हैं।”

यह subtle है। “फ़रमाना” और “करवाना” दोनों use हुए हैं। एक direct command है, दूसरा subtle influence। हरि दोनों levels पर operate करता है।

“तेरै वसि कोइ नही दूजा।” “तेरे वश में आ कर, कोई ‘दूजा’ (separate, alternative) नहीं।” “करत बीआई।” “करता एक ही है।”

यह advaitic statement है, मगर कर्म के context में। हम सब doer नहीं, doer एक ही है। हम apparent doers हैं।

“तूं प्रब दानु अनिक रूप करता।” “तू प्रभु, ‘दान’ (gifts) अनेक रूपों में करता।” “आपे ही करता का करता।” “तू ही ‘करता’ (creator) का ‘करता’ (अर्थात्, करता के पीछे भी तू)।”

सबसे subtle line। हम “करता” शब्द से एक specific being imagine करते हैं। गुरु अर्जन कह रहे हैं, उस “करता” के भी पीछे एक “करता” है, और वो तू है। यह infinite regress नहीं है; यह ultimate ground की पहचान है।

closing: “जो भावै सो करै सोई करता, करे करावै आपणी रजाई।” “जो भाता है वो करता, अपनी ‘रज़ा’ (will) से करता-करवाता।”

पूरा सो पुरखु section यहाँ resolve होता है। नानक (अंग 8) ने पूछा था, “वो दरवाज़ा कैसा है, वो घर कैसा है?” गुरु अर्जन यहाँ answer देते हैं: वो जो जगह नहीं है, वो doing है। हरि एक location नहीं, हरि एक doing है। और सब doing उसी की doing है।

दिल्ली में हम सब अपनी “अपनी मर्ज़ी” बहुत protect करते हैं। freedom-of-choice सबसे cherished value है। गुरु अर्जन का यह closing reminder है, “अपनी मर्ज़ी” assertion नहीं, surrender का easier name है। जो “रज़ा में रहता है,” वो असली में free है।

इस shabad के बाद, “ੴ सतिगुर प्रसादि” का नया invocation आता है, और सोहिला शुरू होती है। यानी सो पुरखु एक section है, सोहिला दूसरा। पुराने इकाई का surrender, नए की intimacy।

देखें: अंग 10, सो पुरखु प्रारम्भ (M4 का opening) · गीता 18.61, “ईश्वर: सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन” (हरि सब के हृदय में बैठ कर चलाता है) · अष्टावक्र गीता 18.13, “स्वभावात्” (सब स्वभाव से होता है)
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ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ राग गउड़ी दीपकी, महला 1 ॥ जै घरि कीरति आखीऐ करते का होइ बीचारो ॥ तितु घरि गावहु सोहिला सिवरिहु सिरजणहारो ॥1॥ तुम गावहु मेरे निरभउ का सोहिला ॥ हउ वारी जितु सोहिलै सदा सुखु होइ ॥1॥ रहाउ ॥ नित नित जीअड़े समालीअनि देखैगा देवणहारु ॥ तेरे दानै कीमति ना पवै तिसु दाते कवणु सुमारु ॥2॥ सम्बति साहा लिखिआ मिलि करि पावहु तेलु ॥ देहु सजण असीसड़ीआ जिउ होवै साहिब सिउ मेलु ॥3॥ घरि घरि एहो पाहुचा सदड़े नित पवंनि ॥ सदणहारा सिमरीऐ नानक से दिह आवंनि ॥4॥1॥

और यहाँ से सोहिला शुरू होती है। नया ੴ, नया “सतिगुर प्रसादि,” नया राग (गउड़ी दीपकी)। एक formal break। ऊपर का सो पुरखु शाम का surrender था; यह सोहिला रात की intimacy है।

पंजाबी विवाह में एक रिवाज होता है, “सोहिला”। शादी से पहले की रात, औरतें इकट्ठा हो कर दूल्हे या दुल्हन के घर शुभ-गीत गाती हैं। यह जश्न है, ख़ुशी है, मगर भीतर एक हलकी सी उदासी भी है, क्योंकि कल विदाई है।

गुरु नानक उसी सोहिले को उठा रहे हैं। और कह रहे हैं, “जिस घर में करते की बात होती हो, वहाँ सोहिला गाओ।” शादी कौनसी? हमारी अपनी विदाई। एक दिन हर इंसान अपने असली घर लौटेगा।

“रहाउ” वाली line ध्यान से पढ़िए: “तुम गावहु मेरे निरभउ का सोहिला।” मेरे निर्भय का सोहिला गाओ। निर्भय कौन? वो जो किसी से डरता नहीं। “हउ वारी जितु सोहिलै सदा सुखु होइ”, मैं उस सोहिले पर क़ुर्बान जिसमें हमेशा का सुख है। शादी का सोहिला तो एक रात का होता है, यह सोहिला हमेशा का।

फिर एक practical बात। “सम्बति साहा लिखिआ मिलि करि पावहु तेलु।” मुहूर्त लिखा जा चुका है, मिल कर तेल चढ़ाओ। (पंजाबी शादी में दूल्हे को तेल लगाने का रिवाज होता है।) “देहु सजण असीसड़ीआ”, दोस्तो, आशीर्वाद दो, कि साहिब से मेल हो जाए।

और आख़िरी line में सबसे चुभने वाली बात: “घरि घरि एहो पाहुचा।” यह न्योता हर घर में जाता है। “सदड़े नित पवंनि”, यह बुलावा रोज़ आता है। नानक कह रहे हैं, बुलाने वाले (मौत के दूत) हर रोज़ किसी न किसी का नाम लिख कर ले जाते हैं। तो जिसने बुलाया है, उसी का स्मरण करो, क्योंकि वो दिन आ ही रहे हैं।

सोहिला रोज़ रात को सोने से पहले पढ़ी जाती है। क्यों? क्योंकि हर रात एक छोटी सी मृत्यु है। और बड़ी वाली कब आएगी, पता नहीं। नानक यह नहीं कह रहे कि मृत्यु से डरो। वो कह रहे हैं कि न्योता आ चुका है, तो तैयार रहो। तैयारी का तरीक़ा? करता का सोहिला गाते रहो।

देखें: जपजी साहिब, अंग 1 से 8, पूरे ग्रंथ का opening · कठोपनिषद्, नचिकेता-यम संवाद, मृत्यु के पार क्या है
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राग आसा, महला 1 ॥ छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस ॥ गुरु गुरु एको वेस अनेक ॥1॥ बाबा जै घरि करते कीरति होइ ॥ सो घरु राखु वडाई तोइ ॥1॥ रहाउ ॥ विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होआ ॥ सूरजु एको रुति अनेक ॥ नानक करते के केते वेस ॥2॥2॥

इस छोटे से शबद में नानक एक बहुत बड़ी बात कहते हैं। उस ज़माने में हिन्दू philosophy में छह दर्शन माने जाते थे: न्याय, वैशेषिक, सांख्य, योग, मीमांसा, वेदान्त। हर दर्शन का अपना घर, अपना गुरु, अपना उपदेश।

“छिअ घर छिअ गुर छिअ उपदेस।” छह घर, छह गुरु, छह उपदेश। नानक कह रहे हैं, ठीक है, यह सब है। लेकिन “गुरु गुरु एको वेस अनेक”, गुरु तो एक ही है, बस उसके वेश अनेक हैं। यानी अलग-अलग दर्शन में जो गुरु बोल रहा है, वो वही एक है, बस costume बदल रहा है।

और रहाउ line में नानक practical हो जाते हैं: “जिस घर में करते की कीर्ति हो, उसी घर को बड़ा मानो।” यानी कौनसा दर्शन सही, कौनसा ग़लत, इस बहस में मत पड़ो। जहाँ भी ईश्वर का कीर्तन हो रहा है, वो जगह सही है।

फिर एक beautiful metaphor: समय की इकाइयाँ देखिए, “विसुए चसिआ घड़ीआ पहरा थिती वारी माहु होआ।” विसुए, चसिआ, घड़ी, पहर, तिथि, वार, महीना, यह सब अलग-अलग scale हैं। मगर सूरज एक ही है। ऋतुएँ अलग-अलग होती हैं, मगर “सूरजु एको रुति अनेक।”

नानक का point यह है: scale बदलती है, चीज़ नहीं। आप एक ही ब्रह्म को अलग-अलग नाम दे सकते हैं, अलग-अलग दर्शन से देख सकते हैं, अलग-अलग ऋतु की तरह अनुभव कर सकते हैं। मगर असली चीज़ एक है। यह वेदान्त का अद्वैत है, मगर नानक की बोली में, बहुत soft, बहुत inviting।

आख़िरी line में पूरी बात summarized है: “नानक करते के केते वेस।” करता एक है, उसके वेश कितने ही। आप उसे राम कहो, अल्लाह कहो, वाहिगुरू कहो, यह उसके अलग-अलग वेश हैं। सोचने वाले लोग इस बात पर अड़ते हैं कि नाम कौनसा सही। नानक मुस्कुरा रहे हैं, यह तो clothing department है, असली person वही है।

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राग धनासरी, महला 1 ॥ गगन मै थालु रवि चंदु दीपक बने तारिका मंडल जनक मोती ॥ धूपु मलआनलो पवणु चवरो करे सगल बनराइ फूलंत जोती ॥1॥ कैसी आरती होइ ॥ भव खंडना तेरी आरती ॥ अनहता सबद वाजंत भेरी ॥1॥ रहाउ ॥ सहस तव नैन नन नैन हहि तोहि कउ सहस मूरति नना एक तोही ॥ सहस पद बिमल नन एक पद गंध बिनु सहस तव गंध इव चलत मोही ॥2॥ सभ महि जोति जोति है सोइ ॥ तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ ॥ गुर साखी जोति परगटु होइ ॥ जो तिसु भावै सु आरती होइ ॥3॥ हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो अनदिनो मोहि आही पिआसा ॥ क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ होइ जा ते तेरै नामि वासा ॥4॥3॥

यह “आरती” है, सोहिला का सबसे प्रसिद्ध शबद। नानक जब जगन्नाथ पुरी के मंदिर गए, तो शाम की आरती हो रही थी। पुजारी थाली में दीप जला कर मूर्ति के सामने घुमा रहे थे, धूप, फूल, चँवर, सब था।

नानक ने आरती में भाग नहीं लिया। पुजारियों को बुरा लगा। लोग उत्सुक हुए, यह सिख क्यों नहीं शामिल हुआ? तब नानक ने यह शबद गाया। यह आरती करने का refusal नहीं था। यह आरती का redefinition था।

“गगन मै थालु”, आसमान ही थाली है। उसमें “रवि चंदु दीपक”, सूरज और चाँद दीये हैं। “तारिका मंडल जनक मोती”, तारों का गुच्छा मोती जैसा सजा हुआ है। “धूपु मलआनलो”, मलयाचल की चन्दन-हवा धूप है। “पवणु चवरो करे”, हवा चँवर डुला रही है। “सगल बनराइ फूलंत जोती”, सारी वनस्पति फूलों के साथ ज्योति चढ़ा रही है।

समझे? पूरी सृष्टि एक continuous आरती कर रही है, और हम छोटी थाली में दीये जला रहे हैं। यह छोटा नहीं है, यह कमाल है, मगर असली show बाहर हो रहा है, हर वक़्त।

रहाउ में नानक कहते हैं: “कैसी आरती होइ। भव खंडना तेरी आरती।” तेरी आरती तो भव-खंडन है, संसार के डर को तोड़ देना। और “अनहता सबद वाजंत भेरी”, बिना बजाए बजती हुई नगाड़ा है। यानी ब्रह्म की आरती के साथ एक अनहद नाद चल रहा है जो हमेशा बजता है। सुनने वाला चाहिए।

फिर वो उपनिषदों की भाषा में बात करते हैं: “सहस तव नैन।” तेरे हज़ार आँखें हैं, और एक भी आँख तेरी नहीं। “सहस मूरति नना एक तोही।” हज़ार मूर्तियाँ हैं तेरी, और एक भी मूर्ति तेरी नहीं। यह विरोधाभास नहीं है। यह सिखा रहा है: हर रूप तेरा है, मगर तू किसी रूप में सिमटा नहीं।

“सभ महि जोति जोति है सोइ।” सब में ज्योति है, और वो ज्योति वही है। “तिस दै चानणि सभ महि चानणु होइ।” उसके प्रकाश से ही सब का प्रकाश है। यह उपनिषदों का “ज्योतिषाम् ज्योतिः”, प्रकाशों का प्रकाश। नानक मन्दिर के सामने खड़े हो कर यह कह रहे हैं।

आख़िरी पंक्ति में personal हो जाते हैं। “हरि चरण कमल मकरंद लोभित मनो।” मेरा मन हरि के चरण-कमलों के मकरंद (पराग) का लोभी है। “क्रिपा जलु देहि नानक सारिंग कउ”, नानक एक सारिंग (चातक पक्षी) की तरह बारिश की एक बूँद माँग रहा है। पूरी कथा छोड़ कर, सिर्फ़ एक बूँद, बस।

यह आरती famous है। कुछ हिन्दू मन्दिरों में आज भी इसे गाया जाता है। सिख gurdwara में सोहिला के साथ रोज़ रात पढ़ी जाती है। और रवीन्द्रनाथ टैगोर ने जब Gitanjali लिखी, तो इसी शबद की echo है उसके कई कविताओं में।

देखें: ईशावास्य उपनिषद्, ईशा वास्यमिदं सर्वम् · भगवद् गीता 11, विश्वरूप-दर्शन