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अंग 1296

अंग
1296
राग कान्हड़ा
राग: कान्हड़ा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
हरि के संत संत जन नीके जिन मिलिआं मनु रंगि रंगीति ॥
हरि रंगु लहै न उतरै कबहू हरि हरि जाइ मिलै हरि प्रीति ॥3॥
हम बहु पाप कीए अपराधी गुरि काटे कटित कटीति ॥
हरि हरि नामु दीओ मुखि अउखधु जन नानक पतित पुनीति ॥4॥5॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! परमात्मा के भगत अच्छे जीवन वाले होते हैं। क्योंकि उनको मिल के मन प्रेम-रंग में रंगा जाता है। प्रभू-प्रेम का वह रंग कभी उतरता नहीं। कभी फीका नहीं पड़ता। उस प्रेम की बरकति से मनुष्य परमात्मा के चरणों में आ पहुँचता है। 3। हे भाई ! हम जीव बड़े पाप करते रहते हैं। हम बड़े दुष्कर्मी हें (जो भी मनुष्य गुरू की शरण आ पड़े) गुरू ने (उनके सारे पाप) पूरी तौर पर काट दिए। हे दास नानक ! (कह- गुरू ने जिन्हों के) मॅुंह में परमात्मा का नाम-दारू दिया। उनको विकारियों से पवित्र जीवन वाला बना दिया। 4। 5।
कानड़ा महला 4 ॥
जपि मन राम नाम जगंनाथ ॥
घूमन घेर परे बिखु बिखिआ सतिगुर काढि लीए दे हाथ ॥1॥ रहाउ ॥
सुआमी अभै निरंजन नरहरि तुम॑ राखि लेहु हम पापी पाथ ॥
काम क्रोध बिखिआ लोभि लुभते कासट लोह तरे संगि साथ ॥1॥
तुम॑ वड पुरख बड अगम अगोचर हम ढूढि रहे पाई नही हाथ ॥
तू परै परै अपरंपरु सुआमी तू आपन जानहि आपि जगंनाथ ॥2॥
अद्रिसटु अगोचर नामु धिआए सतसंगति मिलि साधू पाथ ॥
हरि हरि कथा सुनी मिलि संगति हरि हरि जपिओ अकथ कथ काथ ॥3॥
हमरे प्रभ जगदीस गुसाई हम राखि लेहु जगंनाथ ॥
जन नानकु दासु दास दासन को प्रभ करहु क्रिपा राखहु जन साथ ॥4॥6॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ हे मन ! जगत के नाथ परमात्मा का नाम जपा कर। हे भाई ! (जो मनुष्य) आत्मिक मौत लाने वाली माया के चक्रवात में घिरे रहते हैं। उनको भी गुरू (अपना) हाथ दे के (हरी-नाम में जोड़ के उनमें से) निकाल लेता है। 1। रहाउ। हे (हमारे) मालिक प्रभू ! हे निर्भय प्रभू ! हे निर्लिप प्रभू ! हम जीव पापी हैं। पत्थर (हो चुके) हैं; काम क्रोध और माया के लोभ में ग्रसे रहते हैं। (मेहर कर) हमें (गुरू की संगति में रख के विकारों में डूबने से) बचा ले (जैसे) काठ (बेड़ी) की संगति में लोहा (नदी से) पार लांघ जाता है। 1। हे स्वामी ! आप (हम जीवों की विक्त से) बहुत ही बड़ा है। आप अपहुँच है। जीवों की ज्ञानेन्द्रियों की आपके तक पहुँच नहीं। हम जीव तलाश कर-करके थक गए हैं। आपकी थाह हम नहीं लगा सके। आप बेअंत है। परे से परे है। हे जगत के नाथ ! अपने आप को आप आप ही जानता है। 2। हे भाई ! परमात्मा इन आँखों से नहीं दिखता। (मनुष्य) उस अगोचर प्रभू का नाम साध-संगति में मिल के गुरू का बताया हुआ रास्ता पकड़ के ही जप सकता है। साध-संगति में मिल के ही परमात्मा की सिफत-सालाह सुनी जा सकती है। उस हरी का नाम जपा जा सकता है जिसके सारे गुणों का बयान (जीवों द्वारा) नहीं हो सकता। 3। हे हमारे प्रभू ! हे जगत के मालिक ! हे सृष्टि के पति ! हे जगत के नाथ ! हम जीवों को (काम क्रोध लोभ आदि से) बचाए रख। हे प्रभू ! आपका दास नानक आपके दासों के दासों का दास है। मेहर कर। (मुझे) अपने सेवकों की संगति में रख। 4। 6।
कानड़ा महला 4 पड़ताल घरु 5 ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मन जापहु राम गुपाल ॥
हरि रतन जवेहर लाल ॥
हरि गुरमुखि घड़ि टकसाल ॥
हरि हो हो किरपाल ॥1॥ रहाउ ॥
तुमरे गुन अगम अगोचर एक जीह किआ कथै बिचारी राम राम राम राम लाल ॥
तुमरी जी अकथ कथा तू तू तू ही जानहि हउ हरि जपि भई निहाल निहाल निहाल ॥1॥
हमरे हरि प्रान सखा सुआमी हरि मीता मेरे मनि तनि जीह हरि हरे हरे राम नाम धनु माल ॥
जा को भागु तिनि लीओ री सुहागु हरि हरि हरे हरे गुन गावै गुरमति हउ बलि बले हउ बलि बले जन नानक हरि जपि भई निहाल निहाल निहाल ॥2॥1॥7॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 पड़ताल घरु 5 ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ हे (मेरे) मन ! सृष्टि के पालनहार परमात्मा (का नाम) जपा कर। हे मन ! हरी का नाम रत्न हैं। जवाहर हैं। लाल हैं। हे मन ! हरी का नाम (आपके लिए एक सुंदर गहना है। इसको) गुरू की शरण पड़ कर (साध-संगति की) टकसाल में घड़ा कर। हे मन ! हरी सदा दयावान है। 1। रहाउ। हे प्रभू ! हे सोहणे लाल ! आपके गुणों तक पहुँच नहीं हैं सकती। ज्ञान-इन्द्रियों की पहुँच नहीं हैं सकती। (जीव की) बेचारी एक जीभ (आपके गुणों को) बयान नहीं कर सकती। हे प्रभू जी ! आपकी सिफत-सालाह बयान से परे है। आप स्वयं ही (अपनी सिफतें) जानता है। हे हरी ! मैं (आपका नाम) जप के सदा के लिए प्रसन्न-चित्त हैं गई हूँ। 1। हे भाई ! प्रभू जी हम जीवों के प्राणों के मित्र हैं। हमारे साथी हैं। हे शई ! मेरे मन में। मेरे तन में। मेरी जीभ के लिए परमात्मा का नाम ही धन है नाम ही राशि-पूँजी है। हे सहेली ! जिसके माथे के भाग्य जाग उठे। उसने अपना पति-प्रभू पा लिया। वह गुरू की मति पर चल के सदा प्रभू के गुण गाती है। हे दास नानक ! (कह-) मैं प्रभू से सदा सदके हूँ। उसका नाम जप-जप के मेरे अंदर खिड़ाव पैदा हो जाता है। 2। 1। 7।
कानड़ा महला 4 ॥
हरि गुन गावहु जगदीस ॥
एका जीह कीचै लख बीस ॥
जपि हरि हरि सबदि जपीस ॥
हरि हो हो किरपीस ॥1॥ रहाउ ॥
हरि किरपा करि सुआमी हम लाइ हरि सेवा हरि जपि जपे हरि जपि जपे जपु जापउ जगदीस ॥
तुमरे जन रामु जपहि ते ऊतम तिन कउ हउ घुमि घुमे घुमि घुमि जीस ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: कानड़ा महला 4 ॥ उस जगत के मालिक प्रभू के गुण सदा गाते रहो। (इस काम के लिए) अपनी एक जीभ को बीस लाख जीभें बना लेना चाहिए। गुरू के शबद द्वारा उस जपने योग्य हरी का नाम सदा जपा करो। हे भाई ! हरी प्रभू दया का घर है। 1। रहाउ। हे हरी ! हे स्वामी ! मेहर कर। हम जीवों को अपनी भगती में लगाए रख। हे हरी ! हे जगत के ईश्वर ! मैं सदा आपका नाम जपता रहूँ। हे प्रभू ! जो आपके सेवक आपका राम-नाम जपते हैं वे ऊँचे जीवन वाले बन जाते हैं। मैं उनसे सदके जाता हूँ। सदा सदके जाता हूँ। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। जैजावंती राग ग्रंथ में सबसे बाद में जोड़ा गया, गुरु तेग बहादुर (1621-1675) के समय का।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! परमात्मा के भगत अच्छे जीवन वाले होते हैं।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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