बिनु सतिगुर किनै न पाइओ मनि वेखहु को पतीआइ ॥ हरि किरपा ते सतिगुरु पाईऐ भेटै सहजि सुभाइ ॥ मनमुख भरमि भुलाइआ बिनु भागा हरि धनु न पाइ ॥5॥ त्रै गुण सभा धातु है पड़ि पड़ि करहि वीचारु ॥ मुकति कदे न होवई नहु पाइनि॑ मोख दुआरु ॥ बिनु सतिगुर बंधन न तुटही नामि न लगै पिआरु ॥6॥ पड़ि पड़ि पंडित मोनी थके बेदां का अभिआसु ॥ हरि नामु चिति न आवई नह निज घरि होवै वासु ॥ जमकालु सिरहु न उतरै अंतरि कपट विणासु ॥7॥ हरि नावै नो सभु को परतापदा विणु भागां पाइआ न जाइ ॥ नदरि करे गुरु भेटीऐ हरि नामु वसै मनि आइ ॥ नानक नामे ही पति ऊपजै हरि सिउ रहां समाइ ॥8॥2॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: हे भाई ! बेशक कई पक्ष मन में निर्णय करके देख लें। गुरू (की शरण) के बिना किसी ने भी (परमात्मा का नाम-धन) हासिल नहीं किया। गुरू (भी) मिलता है परमात्मा की मेहर से। आत्मिक अडोलता में मिलता है प्यार में मिलता है। अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्य को भटकना ने गलत राह पर डाला हुआ होता है। किस्मत के बिना परमात्मा का नाम-धन नहीं मिल सकता। 5। हे भाई ! (पंडित लोग वेद आदि धर्म-पुस्तकों को) पढ़-पढ़ के (तीनों गुणों में रखने वाले कर्म-काण्ड का ही) विचार करते हैं। और। यह तीन गुणों की विचार निरी माया ही है। (इस उद्यम से) कभी भी माया के मोह से खलासी नहीं हो सकती। (वे लोग) माया से निज़ात पाने का रास्ता नहीं तलाश सकते। हे भाई ! गुरू (की शरण) के बिना (माया के मोह के) फंदे नहीं टूटते। परमात्मा के नाम में प्यार नहीं बन सकता। 6। हे भाई ! पंडित लोग। मुनि जन (शास्त्रों को) पढ़-पढ़ के थक जाते हैं (कर्म-काण्ड के चक्करों में डाले रखने वाले) वेद (आदि धर्म-पुस्तकों का ही) अभ्यास करते रहते हैं। (पर। इस तरह) परमात्मा का नाम चित्त में नहीं बसता। प्रभू चरणों में निवास नहीं होता। सिर से जनम-मरण का चक्कर समाप्त नहीं होता। मन में (माया की खातिर) ठॅगी (टिकी रहने के कारण) आत्मिक मौत बनी रहती है। 7। हे भाई ! (वैसे तो) हरेक प्राणी परमात्मा का नाम प्राप्त करने की तमन्ना रखता है। पर बढ़िया किस्मत के बग़ैर मिलता नहीं। जब प्रभू मेहर की निगाह करता है तो गुरू मिलता है (और। गुरू के द्वारा) परमात्मा का नाम मन में आ बसता है। हे नानक (कह-) परमात्मा के नाम से (लोक-परलोक में) इज्जत मिलती है (मैं गुरू की कृपा से) परमात्मा के नाम के साथ सदा जुड़ा रहता हूँ। 8। 2।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 3 असटपदी घरु 2 ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! (जिस मनुष्य पर) परमात्मा मेहर करता है। उसको गुरू की सेवा में लगाता है। (जो गुरू) उसका दुख दूर करके उसके अंदर परमात्मा का नाम बसाता है। वह मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में अपना चित्त जोड़ता है और सदा कायम रहने वाली ऊँची आत्मिक अवस्था हासिल करता है। हे भाई ! (जिस पर परमात्मा कृपा करता है उसको) गुरू की बाणी के द्वारा गुरू के शबद से (अपना नाम) सुनाता है 1। हे मेरे मन ! सदा परमात्मा की भगती करता रह (यही है असल खजाना) हरी नाम का यह धन गुरू की कृपा से मिलता है। और हर वक्त आत्मिक अडोलता की सुरति जुड़ी रहती है। 1। रहाउ। हे भाई ! (जैसे जो) स्त्री पति के बिना (शारीरिक) श्रंृगार करती है वह बुरे आचरण वाली कही जाती है और सदा दुखी होती है (वैसे ही) अपने मन के पीछे चलने वाले मनुष्यों का यह रवईया व्यर्थ जाता है कि वे परमात्मा का नाम भुला के और बहुत सारे दिखावे के धार्मिक कर्मों की ताकीद करते हैं। 2। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाली जीव-स्त्री को यह आत्मिक सुहज फबता है कि वह गुरू के शबद के द्वारा प्रभू-पति को अपने हृदय में बसाए रखती है। वह अपने अंदर से अहंकार को दूर कर के सिर्फ परमात्मा के साथ गहरी सांझ डालती है। उस जीव-स्त्री को शोभामयी कहा जाता है। 3। हे भाई ! (नाम की दाति) देने वाले गुरू के बिना किसी ने भी (परमात्मा का मिलाप) हासिल नहीं किया। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य माया के लोभ के कारण (प्रभू की याद के बिना) और (के प्यार) में मगन रहता है। हे भाई ! अगर किसी को आत्मिक जीवन की सूझ हुई है तो ये समझ लो कि गुरू को मिले बिना (माया के मोह से) मुक्ति नहीं मिलती। 4। हे भाई ! (यह) डींग (कि मैं भगती करता हूँ) हर कोई हर वक्त मार सकता है। पर मन वश में आए बिना भक्ति हो ही नहीं सकती। हे भाई ! आत्मिक जीवन की सूझ वाली मति से जिस हृदय-कमल में खिड़ाव हो जाता है। नाम (जपने) से उस हृदय में (सदा के लिए) नाम का निवास हो जाता है। 5। हे भाई ! (गुरू की शरण आए बिना अपने) अहंकार के आसरे हर कोई भगती करता है पर इस तरह मनुष्य का मन नाम-जल से तर नहीं होता। ना ही उसके अंदर आत्मिक आनंद पैदा होता है। यह डींग (कि मैं भगती करता हूँ) मार-मार के मनुष्य अपने आप को (भगत) जाहर करता है। (पर। इस तरह की) भगती व्यर्थ जाती है। (मनुष्य अपना सारा) जनम गवा लेता है। 6। हे भाई ! (दरअसल) भगत वे हैं जो गुरू के मन को भा जाते हैं। हर वक्त हरी-नाम में सुरति जोड़ के रखते हैं। वे मनुष्य हरी-नाम को सदा ही अपने अंग-संग देखते हैं।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! बेशक कई पक्ष मन में निर्णय करके देख लें।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।