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1275
मलार
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· अष्टपदी · राग मलार
सतिगुर सबदी पाधरु जाणि ॥
सतिगुर सबदी पाधरु जाणि ॥
गुर कै तकीऐ साचै ताणि ॥
नामु सम॑ालसि रूड़॑ी बाणि ॥
थैं भावै दरु लहसि पिराणि ॥2॥
ऊडां बैसा एक लिव तार ॥
गुर कै सबदि नाम आधार ॥
ना जलु डूंगरु न ऊची धार ॥
निज घरि वासा तह मगु न चालणहार ॥3॥
जितु घरि वसहि तूहै बिधि जाणहि बीजउ महलु न जापै ॥
सतिगुर बाझहु समझ न होवी सभु जगु दबिआ छापै ॥
करण पलाव करै बिललातउ बिनु गुर नामु न जापै ॥
पल पंकज महि नामु छडाए जे गुर सबदु सिञापै ॥4॥
इकि मूरख अंधे मुगध गवार ॥
इकि सतिगुर कै भै नाम अधार ॥
साची बाणी मीठी अंम्रित धार ॥
जिनि पीती तिसु मोख दुआर ॥5॥
नामु भै भाइ रिदै वसाही गुर करणी सचु बाणी ॥
इंदु वरसै धरति सुहावी घटि घटि जोति समाणी ॥
कालरि बीजसि दुरमति ऐसी निगुरे की नीसाणी ॥
सतिगुर बाझहु घोर अंधारा डूबि मुए बिनु पाणी ॥6॥
जो किछु कीनो सु प्रभू रजाइ ॥
जो धुरि लिखिआ सु मेटणा न जाइ ॥
हुकमे बाधा कार कमाइ ॥
एक सबदि राचै सचि समाइ ॥7॥
चहु दिसि हुकमु वरतै प्रभ तेरा चहु दिसि नाम पतालं ॥
सभ महि सबदु वरतै प्रभ साचा करमि मिलै बैआलं ॥
जांमणु मरणा दीसै सिरि ऊभौ खुधिआ निद्रा कालं ॥
नानक नामु मिलै मनि भावै साची नदरि रसालं ॥8॥1॥4॥
गुर कै तकीऐ साचै ताणि ॥
नामु सम॑ालसि रूड़॑ी बाणि ॥
थैं भावै दरु लहसि पिराणि ॥2॥
ऊडां बैसा एक लिव तार ॥
गुर कै सबदि नाम आधार ॥
ना जलु डूंगरु न ऊची धार ॥
निज घरि वासा तह मगु न चालणहार ॥3॥
जितु घरि वसहि तूहै बिधि जाणहि बीजउ महलु न जापै ॥
सतिगुर बाझहु समझ न होवी सभु जगु दबिआ छापै ॥
करण पलाव करै बिललातउ बिनु गुर नामु न जापै ॥
पल पंकज महि नामु छडाए जे गुर सबदु सिञापै ॥4॥
इकि मूरख अंधे मुगध गवार ॥
इकि सतिगुर कै भै नाम अधार ॥
साची बाणी मीठी अंम्रित धार ॥
जिनि पीती तिसु मोख दुआर ॥5॥
नामु भै भाइ रिदै वसाही गुर करणी सचु बाणी ॥
इंदु वरसै धरति सुहावी घटि घटि जोति समाणी ॥
कालरि बीजसि दुरमति ऐसी निगुरे की नीसाणी ॥
सतिगुर बाझहु घोर अंधारा डूबि मुए बिनु पाणी ॥6॥
जो किछु कीनो सु प्रभू रजाइ ॥
जो धुरि लिखिआ सु मेटणा न जाइ ॥
हुकमे बाधा कार कमाइ ॥
एक सबदि राचै सचि समाइ ॥7॥
चहु दिसि हुकमु वरतै प्रभ तेरा चहु दिसि नाम पतालं ॥
सभ महि सबदु वरतै प्रभ साचा करमि मिलै बैआलं ॥
जांमणु मरणा दीसै सिरि ऊभौ खुधिआ निद्रा कालं ॥
नानक नामु मिलै मनि भावै साची नदरि रसालं ॥8॥1॥4॥
हिन्दी अर्थ: जो मनुष्य सतिगुरू के शबद की बरकति से जिंदगी का सपाट रास्ता समझ लेता है। वह (इस जीवन-यात्रा में) गुरू के आसरे चलता है सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा के नाम के सहारे चलता है। वह सतिगुरू की सुंदर बाणी के द्वारा परमात्मा का नाम (हृदय में) बसाता है। हे प्रभू ! जब आपकी मेहर होती है तब वह आपका दर पहचान के पा लेता है। 2। ज्यों-ज्यों मैं (जीव-पंछी) एक-रस सुरति जोड़ के उड़ानें लगाता हूँ और गुरू के शबद में जुड़ के प्रभू-नाम का आसरा ले के जीवन-राह में एक परमात्मा के चरणों में लगन का सहारा लेता हूँ। मेरे जीवन-रास्ते में ना संसार-समुंद्र का (विकार-) जल आता है ना (अहम्-अहंकार का) पहाड़ खड़ा होता है। ना ही विकारों का कोई ऊँचा-लंबा सिलसिला आ खड़ा होता है। स्वै-स्वरूप में (अपने अंदर ही प्रभू चरणों में) मेरा निवास हो जाता है। उस आत्मिक अवस्था में ना (जनम-मरण के चक्करों वाला) रास्ता पकड़ना पड़ता है। और ना ही उस रास्ते पर चलने वाला ही कोई होता है। 3। हे प्रभू ! जिस मनुष्य के हृदय-घर में आप प्रकट हो जाते हैं उसकी आत्मिक अवस्था आप ही जानते हैं कि उसको आपके बिना और कोई आसरा सूझता ही नहीं। सारा जगत प्रभू के बिना अन्य आसरों की झाक के दबाव तले दबा हुआ है। गुरू के बिना समझ नहीं आ सकती। (प्रभू के नाम का आसरा छोड़ के जगत) तरले लेता है बिलकता है। गुरू की शरण पड़े बिना नाम जप नहीं सकता। पर अगर जीव गुरू के शबद को पहचान ले तो प्रभू का नाम इसको आँख झपकने के एक छण में (माया के दबाव से) छुड़वा लेता है। 4। (जगत में) अनेकों ही मूर्ख ऐसे हैं जो माया के मोह में अंधे हुए हैं। पर अनेकों ही ऐसे भी हैं जो गुरू के डर-अदब में चल के प्रभू-नाम का आसरा लेते हैं। वे सदा-स्थिर प्रभू की सिफत-सालाह की मीठी वाणी के द्वारा नाम-अमृत की धार का रस (का आनंद) लेते हैं। जिस मनुष्य ने नाम-अमृत की धार पी है उसको माया के मोह से निजात कराने वाला दरवाजा मिल जाता है। 5। जो मनुष्य परमात्मा के डर-अदब में और प्यार में टिक के परमात्मा का नाम अपने हृदय में बसाते हैं। गुरू के द्वारा बताई हुई कार करते हैं। (भाव। सिफतसालाह की बाणी के द्वारा सदा-स्थिर प्रभू का नाम जपते हैं) उनके ऊपर गुरू-बादल (प्रभू की रहमत की) बरखा करता है जिसके कारण उनके हृदय की धरती सुहावनी बन जाती है। उनको हरेक शरीर में परमात्मा की ज्योति व्यापक दिखाई देती है। पर। गुरू से बेमुख की निशानी यह है कि वह बुरी मति के पीछे लग के (जैसे) कलॅर में बीज बीजता रहता है। जो मनुष्य गुरू से वंचित रहते हैं। वे अज्ञानता के घोर अंधेरे में (हाथ-पैर मारते हैं)। नाम-जल के बिना वे विकारों के समुंद्र में गोते खाते रहते हैं। 6। जो भी खेल रचा है प्रभू ने अपनी रज़ा में रचा हुआ है। (जीवों के किए कर्मों के अनुसार) धुर से ही लिखा जाता है वह (किसी भी तरफ से) मिटाया नहीं जा सकता। हरेक जीव प्रभू के हुकम में बँधा हुआ अपने पूर्बले कए हुए कर्मों के संस्कारों के अनुसार ही काम करता है। (यह प्रभू की मेहर है कि कोई भाग्यशाली जीव) एक परमात्मा की सिफत-सालाह के शबद में जुड़ता है। सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के नाम में लीन रहता है। 7। हे प्रभू ! सारी सृष्टि में आपका ही हुकम चल रहा है। सारी सृष्टि में छोटी से छोटी जगहों में भी आपका ही नाम बज रहा है। सभ जीवों में सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू की ही जीवन-रौंअ रुमक रही है (जिस किसी को मिलता है) वह अविनाशी प्रभू अपनी मेहर से ही मिलता है। (नाम से वंचित लोगों के) सिर पर जनम-मरण का चक्कर खड़ा दिखाई देता है। माया की भूख। माया के मोह की नींद और आत्मिक मौत खड़े हुए दिखते हैं। हे नानक ! सब रसों के श्रोत प्रभू की सदा-स्थिर मेहर भरी निगाह जिस व्यक्ति पर पड़ती है उसको प्रभू का नाम प्राप्त हो जाता है उसके मन को प्रभू प्यारा लगने लग जाता है। 8। 1। 4।
· अष्टपदी · राग मलार
मरण मुकति गति सार न जानै ॥
मलार महला 1 ॥
मरण मुकति गति सार न जानै ॥
कंठे बैठी गुर सबदि पछानै ॥1॥
तू कैसे आड़ि फाथी जालि ॥
अलखु न जाचहि रिदै सम॑ालि ॥1॥ रहाउ ॥
एक जीअ कै जीआ खाही ॥
जलि तरती बूडी जल माही ॥2॥
सरब जीअ कीए प्रतपानी ॥
जब पकड़ी तब ही पछुतानी ॥3॥
जब गलि फास पड़ी अति भारी ॥
ऊडि न साकै पंख पसारी ॥4॥
रसि चूगहि मनमुखि गावारि ॥
फाथी छूटहि गुण गिआन बीचारि ॥5॥
सतिगुरु सेवि तूटै जमकालु ॥
हिरदै साचा सबदु सम॑ालु ॥6॥
गुरमति साची सबदु है सारु ॥
हरि का नामु रखै उरि धारि ॥7॥
से दुख आगै जि भोग बिलासे ॥
नानक मुकति नही बिनु नावै साचे ॥8॥2॥5॥
मरण मुकति गति सार न जानै ॥
कंठे बैठी गुर सबदि पछानै ॥1॥
तू कैसे आड़ि फाथी जालि ॥
अलखु न जाचहि रिदै सम॑ालि ॥1॥ रहाउ ॥
एक जीअ कै जीआ खाही ॥
जलि तरती बूडी जल माही ॥2॥
सरब जीअ कीए प्रतपानी ॥
जब पकड़ी तब ही पछुतानी ॥3॥
जब गलि फास पड़ी अति भारी ॥
ऊडि न साकै पंख पसारी ॥4॥
रसि चूगहि मनमुखि गावारि ॥
फाथी छूटहि गुण गिआन बीचारि ॥5॥
सतिगुरु सेवि तूटै जमकालु ॥
हिरदै साचा सबदु सम॑ालु ॥6॥
गुरमति साची सबदु है सारु ॥
हरि का नामु रखै उरि धारि ॥7॥
से दुख आगै जि भोग बिलासे ॥
नानक मुकति नही बिनु नावै साचे ॥8॥2॥5॥
हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ अंजान जिंद ऊँची आत्मिक अवस्था की कद्र नहीं समझती। आत्मिक मौत से बचने (का उपाय) नहीं जानती। गुरू के शबद द्वारा समझने का यतन तो करती है पर (गुरू-शबद से) अलग ही बैठी हुई (गुरू-शबद में जुड़ती नहीं। लीन नहीं होती)। 1। हे आड़ि ! (आड़ि पक्षी की तरह दूसरों पर ज्यादती करने वाली हे जिंदे !) आप (माया के मोह के) जाल में कैसे फँस गई हैं। आप अपने हृदय में अदृश्य प्रभू का नाम संभाल के उससे (आत्मिक जीवन की दाति) क्यों नहीं माँगती हैं। 1। रहाउ। हे आड़ि ! आप अपनी एक जिंद की खातिर (पानी में से चुग-चुग के) अनेकों जीव खाती हैं (हे जिंदे ! आप अपने शरीर की पालना के लिए अनेकों के साथ ठॅगी-ठोरी करती हैं)। आप (जल-जंतु पकड़ने के लिए) पानी में तैरती-तैरती पानी में ही डूब जाती हैं (हे जिंदे ! माया-जाल में दौड़-भाग करती आखिर इसी माया-जाल में ही आत्मिक मौत मर जाती हैं)। 2। (अपने स्वार्थ की खातिर) आपने सारे जीवों को बहुत दुखी किया हुआ है। जब आप (मौत के जाल में) पकड़ी जाती हैं तब पछताती हैं। 3। जब आड़ि के गले में (किसी शिकारी का) बहुत भारी फंदा पड़ता है। तब वह पंख पसार के उड़ नहीं सकती (जब जिंद माया के मोह के जाल में फस जाती है तब यह आत्मिक उड़ान भरने के योग्य नहीं रहती। इसकी सुरति ऊँची हो के प्रभू-चरणों में नहीं पहुँच सकती)। 4। अपने मन के पीछे चलने वाली हे गवार जिंदे ! आप बड़ी मौज से (माया का चोगा) चुगती हैं (और माया के जाल में फँसती जाती हैं)। परमात्मा की सिफतसालाह को अपने सोच-मण्डल में टिकाएँ। प्रभू के साथ गहरी सांझ डालें। तब ही आप (माया के मोह के जाल और आत्मिक मौत से) बच सकेंगी। 5। (हे जिंदे !) सतिगुरू की शरण पड़ें। तब ही आत्मिक मौत वाला जाल टूट सकेगा। अपने हृदय में प्रभू की सिफत-सालाह वाला गुर-शबद संभालें। 6। (हे जिंदे !) गुरू की मति ही सदा कायम रहने वाली मति है। गुरू का शबद ही श्रेष्ठ पदार्थ है (इस शबद का आसरा ले के ही जीव) परमात्मा का नाम अपने हृदय में संभाल के रख सकता है। 7। दुनियावी पदार्थों के जो भोग-बिलास (बड़े चाव से) किए जाते हैं वे जीवन-यात्रा में दुख बन-बन के आ घटित होते हैं। हे नानक ! (इन दुखों से) परमात्मा के नाम के बिना खलासी नहीं हो सकती। 8। 2। 5।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1275 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।