कागद कोटु इहु जगु है बपुरो रंगनि चिहन चतुराई ॥ नान॑ी सी बूंद पवनु पति खोवै जनमि मरै खिनु ताइंी ॥4॥ नदी उपकंठि जैसे घरु तरवरु सरपनि घरु घर माही ॥ उलटी नदी कहां घरु तरवरु सरपनि डसै दूजा मन मांही ॥5॥ गारुड़ गुर गिआनु धिआनु गुर बचनी बिखिआ गुरमति जारी ॥ मन तन हेंव भए सचु पाइआ हरि की भगति निरारी ॥6॥ जेती है तेती तुधु जाचै तू सरब जीआं दइआला ॥ तुम॑री सरणि परे पति राखहु साचु मिलै गोपाला ॥7॥ बाधी धंधि अंध नही सूझै बधिक करम कमावै ॥ सतिगुर मिलै त सूझसि बूझसि सच मनि गिआनु समावै ॥8॥ निरगुण देह साच बिनु काची मै पूछउ गुरु अपना ॥ नानक सो प्रभु प्रभू दिखावै बिनु साचे जगु सुपना ॥9॥2॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: यह जगत बेचारा (मानो) कागज़ का किला है जिसको (प्रभू ने अपनी) समझदारी से सजावट और रूप-रेखा दी हुई है। पर जैसे एक नन्ही सी बूँद और हवा का झोका (कागज़ के किले की) शोभा गवा देता है। वैसे ही यह जगत पल में पैदा होता है और मरता है। 4। जैसे किसी नदी के किनारे पर कोई घर हो अथवा पेड़ हो जब नदी का वेग उलटता है तो ना वह घर रह जाता है ना वह पेड़ सलामत रहता है। जैसे अगर किसी मनुष्य के घर में सर्पनी का घर हो तो जब भी मौका मिलता है सर्पनी उसको डंक मार देती है। इसी तरह जिस मनुष्य के मन में परमात्मा के बिना किसी और आसरे की झाक है (वह नदी की उफान आई बाढ़ की तरह है। वह घर में बस रही सर्पनी की तरह है। ये दूसरी झाक आत्मिक मौत ले के आती है)। 5। गुरू से मिला हुआ ज्ञान। गुरू के बचनों के द्वारा (प्रभू-चरणें में) जुड़ी सुरति। मानो। साँप को कीलने जैसा मंत्र है। जिसके पास भी यह मंत्र है उसने गुरू की मति की बरकति से माया (सर्पनी का जहर) जला लिया है। (देखो !) परमात्मा की भक्ति (एक) अनोखी (दाति) है। जिस मनुष्य ने परमात्मा का सदा स्थिर रहने वाला नाम (हृदय में) बसा लिया है उसका मन उसका शरीर (भाव। इन्द्रियाँ) बर्फ जैसे शीतल हो जाते हैं। 6। हे गोपाल ! जितनी भी लोकाई है। सारी आपसे (सब पदार्थ) माँगती है। आप सब जीवों पर दया करने वाला है। हे प्रभू ! मैं आपकी शरण पड़ा हूँ। मेरी इज्जत रख ले। (मेहर कर) मुझे आपका सदा-रहने वाला नाम मिल जाए। 7। माया के धंधों में बंधी हुई लोकाई (आत्मिक जीवन से) अंधी हुई पड़ी है (सही जीवन-जुगति के बारे में इसको) कुछ भी नहीं सूझता। (तभी तो) निर्दयता भरे काम करती जा रही है। अगर जीव गुरू को मिल जाए तो इस (आत्मिक जीवन के बारे में) समझ आ जाती है। इसके मन में सदा-स्थिर रहने वाले परमात्मा की जान-पहचान टिक जाती है। 8। हे नानक ! सदा-स्थिर रहने वाले प्रभू के नाम के बिना गुण-हीन मनुष्य शरीर कच्चा ही रहता है (भाव। जीव को जनम-मरण मिलता रहता है)। (इसलिए सही जीवन-राह पर चलने के लिए) मैं अपने गुरू से शिक्षा लेता हूँ। और गुरू परमात्मा का दीदार करवा देता है। सदा-स्थिर प्रभू के नाम के बिना जगत सपने जैसा ही है (भाव। जैसे सपने में देखे हुए पदार्थ जाग खुलने पर अलोप हो जाते हैं। इसी तरह दुनिया में इकट्ठे किए हुए सारे ही पदार्थ अंत के समय छिन जाते हैं। एक प्रभू का नाम ही पल्ले रह सकता है)। 9। 2।
मलार महला 1 ॥ चात्रिक मीन जल ही ते सुखु पावहि सारिंग सबदि सुहाई ॥1॥ रैनि बबीहा बोलिओ मेरी माई ॥1॥ रहाउ ॥ प्रिअ सिउ प्रीति न उलटै कबहू जो तै भावै साई ॥2॥ नीद गई हउमै तनि थाकी सच मति रिदै समाई ॥3॥ रूखंी बिरखंी ऊडउ भूखा पीवा नामु सुभाई ॥4॥ लोचन तार ललता बिललाती दरसन पिआस रजाई ॥5॥ प्रिअ बिनु सीगारु करी तेता तनु तापै कापरु अंगि न सुहाई ॥6॥ अपने पिआरे बिनु इकु खिनु रहि न सकंउ बिन मिले नंीद न पाई ॥7॥ पिरु नजीकि न बूझै बपुड़ी सतिगुरि दीआ दिखाई ॥8॥ सहजि मिलिआ तब ही सुखु पाइआ त्रिसना सबदि बुझाई ॥9॥ कहु नानक तुझ ते मनु मानिआ कीमति कहनु न जाई ॥10॥3॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 ॥ (हे माँ ! पपीहे की पुकार सुन के मुझे पता चला कि) पपीहा और मछली पानी से सुख पाते हैं। हिरन भी (घंडे हेड़े के) शब्द से सुख लेता है (तो फिर। पति-प्रभू से विछुड़ी हुई मैं कैसे सुखी होने की आस कर सकती हूँ।)। 1। हे मेरी माँ ! (स्वाति बूँद की चाहत में) रात को पपीहा (बड़े वैराग में) बोला (उसकी व्याकुलता भरे बोल सुन के मेरे अंदर भी कसक उठी)। 1। रहाउ। (हे माँ ! पपीहे। मछली। हिरन आदि की) प्रीति (अपने-अपने) प्यारे से कभी भी हटती नहीं। (यह मनुष्य ही है जिसकी प्रीति प्रभू-चरणों से हट के दुनिया की के साथ बन जाती है। हे माँ ! मैंने अरदास की कि हे प्रभू !) जो आपको भाता है वही बात होती है (मुझे अपने चरणों की प्रीति दे)। 2। (हे माँ ! मेरी विनती सुन के प्रभू ने मुझ पर मेहर की) मेरे हृदय में उस सदा-स्थिर प्रीतम का नाम सिमरने वाली मति आ टिकी। अब मेरी माया के मोह वाली नींद खत्म हो गई है। मेरे शरीर के अंदर का अहंकार भी दूर हो गया है। 3। (हे माँ ! पपीहे की व्याकुलता में से मुझे प्रतीत हुआ कि जैसे वह तरले ले रहा है-) मैं पेड़-पौधों पर उड़-उड़ के जाता हूँ पर (स्वाति की बूँद के बिना) भूखा (प्यासा) ही हूँ। (पपीहे के विरलाप से प्रेरित हो के अब) मैं बड़े प्यार से परमात्मा-पति का नाम-अमृत पी रही हूँ। 4। (हे माँ !) रज़ा के मालिक प्रभू के दीदार की (मेरे अंदर) बड़ी तमन्ना है। मेरी जीभ (उसके दर्शनों के लिए) तरले ले रही है। (इन्तजार में) मेरी आँखों की टिक-टिकी लगी हुई है। 5। (हे माँ ! अब मैं महसूस करती हूँ कि) प्यारे प्रभू-पति के बिना मैं जितना भी श्रृंगार करती हूँ उतना ही (ज्यादा) मेरा शरीर (सुखी होने की बजाय) तपता है। (बढ़िया से बढ़िया) कपड़ा (भी मुझे अपने) शरीर पर सुखद नहीं होता। 6। (हे माँ !) अपने प्यारे के बिना मैं (एक) पल भर भी (शांत-चिक्त) नहीं रह सकती। प्रभू-पति को मिले बिना मुझे नींद नहीं आती (शांति नहीं मिलती)। 7। (हे माँ !) प्रभू-पति तो (हरेक जीव-स्त्री के) नजदीक (बसता) है; पर भाग्यहीन को यह समझ नहीं आती। (सुहागिन) को (उसने अंदर ही परमात्मा) दिखा दिया है। 8। (गुरू की कृपा से जो जीव-स्त्री) आत्मिक अडोलता में (टिक गई उसको प्रभू-पति) मिल गया (उसके दीदार होने से उसको) उस वक्त आत्मिक आनंद प्राप्त हो गया। गुरू के शबद ने उसकी तृष्णा (की आग) बुझा दी। 9। हे नानक ! (प्रभू चरणों में अरदास करके कह- हे प्रभू !) आपकी मेहर से मेरा मन (आपकी याद में) रम गया है (और मेरे अंदर ऐसा आत्मिक आनंद बन गया है जिसका) मूल्य नहीं आँका जा सकता। 10। 3।
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: मलार महला 1 असटपदीआ घरु 2 सतिगुर प्रसादि ॥ अगर लंबा (सा ऊँची उड़ान वाला पक्षी आदि) ऊँचे आकाश में उड़ रहा है (तो वहाँ उड़ते को पानी नहीं मिल सकता क्योंकि) पानी समुंद्र में है (आत्मिक शांति व शीतलता विनम्रता में है। ये उस मनुष्य को प्राप्त नहीं हो सकती जिसका दिमाग़ माया आदि के अहंकार में आसमान छू रहा हो)। किला पाताल में है। पर पहाड़ (का रास्ता) ऊँचा है (अगर कोई मनुष्य कामादिक वैरियों से बचने के लिए कोई सत्संग आदि का आसरा तलाशता है। पर चढ़ता जा रहा है अहम् व अहंकार के पर्वत पर। तो उस राह पर पड़ कर वह वैरियों की चोट से नहीं बच सकता)। गुरू के शबद की विचार करने से संसार-समुंद्र (जो विकारों की आग से तप रहा है) ठंढा-ठार हो जाता है। (गुरू के शबद की सहायता से) अहंकार को मारने से जीवन का रास्ता खुला होता है (विकारों की रुकावट नहीं रह जाती)। 1। मुझे माया के मोह में अंधे होए हुए को परमात्मा के नाम की रौशनी मिल गई है। अब मैं (जीवन-राह में) प्रभू के नाम के आसरे चलता हूँ। गुरू के डर-अदब में रह के चलता हूँ। (जीवन की मुश्किलों के बारे में) गुरू के (द्वारा) समझाए हुए भेद की सहायता से चलता हूँ। 1। रहाउ।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “यह जगत बेचारा (मानो) कागज़ का किला है जिसको (प्रभू ने अपनी) समझदारी से सजावट और रूप-रेखा दी हुई है।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।