ੴ सति नामु करता पुरखु निरभउ निरवैरु अकाल मूरति अजूनी सैभं गुर प्रसादि ॥
खाणा पीणा हसणा सउणा विसरि गइआ है मरणा ॥
खसमु विसारि खुआरी कीनी ध्रिगु जीवणु नही रहणा ॥1॥
प्राणी एको नामु धिआवहु ॥
अपनी पति सेती घरि जावहु ॥1॥ रहाउ ॥
तुधनो सेवहि तुझु किआ देवहि मांगहि लेवहि रहहि नही ॥
तू दाता जीआ सभना का जीआ अंदरि जीउ तुही ॥2॥
गुरमुखि धिआवहि सि अंम्रितु पावहि सेई सूचे होही ॥
अहिनिसि नामु जपहु रे प्राणी मैले हछे होही ॥3॥
जेही रुति काइआ सुखु तेहा तेहो जेही देही ॥
नानक रुति सुहावी साई बिनु नावै रुति केही ॥4॥1॥
करउ बिनउ गुर अपने प्रीतम हरि वरु आणि मिलावै ॥
सुणि घन घोर सीतलु मनु मोरा लाल रती गुण गावै ॥1॥
बरसु घना मेरा मनु भीना ॥
अंम्रित बूंद सुहानी हीअरै गुरि मोही मनु हरि रसि लीना ॥1॥ रहाउ ॥
सहजि सुखी वर कामणि पिआरी जिसु गुर बचनी मनु मानिआ ॥
हरि वरि नारि भई सोहागणि मनि तनि प्रेमु सुखानिआ ॥2॥
अवगण तिआगि भई बैरागनि असथिरु वरु सोहागु हरी ॥
सोगु विजोगु तिसु कदे न विआपै हरि प्रभि अपणी किरपा करी ॥3॥
आवण जाणु नही मनु निहचलु पूरे गुर की ओट गही ॥
नानक राम नामु जपि गुरमुखि धनु सोहागणि सचु सही ॥4॥2॥
साची सुरति नामि नही त्रिपते हउमै करत गवाइआ ॥
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक का स्वर साफ़ है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पन्द्रहवीं सदी के अंतिम दशकों में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पहली बड़ी यात्रा पर थे। वो जो शब्द लाए, वो आज भी इसी ग्रंथ में पढ़े जाते हैं।
इस अंग पर 3 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “रागु मलार चउपदे महला 1 घरु 1 वह परमपिता परमेश्वर केवल एक है, नाम उसका सत्य है, वह सम्पूर्ण विश्व का स्रष्टा है, सर्वशक्तिमान है,वह वैर भावना से रहित है, वह कालातीत ब्रहामूर्ति अमर ।”
पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।