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अंग 1253

अंग
1253
राग सारंग
राग: सारंग · रचयिता: Bhagat Parmaanand Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
एक समै मो कउ गहि बांधै तउ फुनि मो पै जबाबु न होइ ॥1॥
मै गुन बंध सगल की जीवनि मेरी जीवनि मेरे दास ॥
नामदेव जा के जीअ ऐसी तैसो ता कै प्रेम प्रगास ॥2॥3॥
भगत परमानन्द एक ही शबद के लिए जाने जाते हैं, मगर उस शबद की धार बहुत तेज़ है।

हिन्दी अर्थ: अगर मेरा भगत एक बार मुझे पकड़ के बाँध ले। तो मैं आगे से कोई आना-कानी नहीं कर सकता। 1। मैं (अपने भगत के) गुणों का बँधा हुआ हूँ। मैं सारे जगत के जीवों की जिंदगी (का आसरा) हूँ। पर मेरे भगत मेरी जिंदगी (का आसरा) हैं। हे नामदेव ! जिसके मन में ये ऊँची सोच आ गई है। उसके अंदर मेरे प्यार का प्रकाश भी उतना ही बड़ा (भाव। बहुत अधिक) हो जाता है। 2। 3।
सारंग ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
तै नर किआ पुरानु सुनि कीना ॥
अनपावनी भगति नही उपजी भूखै दानु न दीना ॥1॥ रहाउ ॥
कामु न बिसरिओ क्रोधु न बिसरिओ लोभु न छूटिओ देवा ॥
पर निंदा मुख ते नही छूटी निफल भई सभ सेवा ॥1॥
बाट पारि घरु मूसि बिरानो पेटु भरै अप्राधी ॥
जिहि परलोक जाइ अपकीरति सोई अबिदिआ साधी ॥2॥
हिंसा तउ मन ते नही छूटी जीअ दइआ नही पाली ॥
परमानंद साधसंगति मिलि कथा पुनीत न चाली ॥3॥1॥6॥
छाडि मन हरि बिमुखन को संगु ॥
भगत परमानन्द एक ही शबद के लिए जाने जाते हैं, मगर उस शबद की धार बहुत तेज़ है।

हिन्दी अर्थ: सारंग ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ हे भाई ! पुराण आदि धर्म-पुस्तकें सुन के तूने कमाया तो कुछ भी नहीं। आपके अंदर ना तो प्रभू की अटल भक्ति पैदा हुई और ना ही किसी जरूरतमंद की सेवा की। 1। रहाउ। हे भाई ! (धर्म पुस्तकें सुन के भी) ना काम गया। ना क्रोध गया। ना लोभ खत्म हुआ। ना मुँह से पराई निंदा (करने की आदत) ही गई। (पुराण आदि पढ़ने की) सारी मेहनत ही ऐसे गई। 1। (पुराण आदि सुन के भी) पापी मनुष्य डाके मार-मार के पराए घर लूट-लूट के ही अपना पेट भरता रहा। और (सारी उम्र) वही मूर्खता करता रहा जिससे अगले जहान में भी बदनामी (का टीका) ही मिले। 2। हे परमानंद ! (धर्म पुस्तकें सुन के भी) आपके मन में से निर्दयता ना गई। तूने लोगों से प्यार का सलूक ना किया। और सत्संग में बैठ के तूने कभी प्रभू की पवित्र (करने वाली) बातें ना चलाई (भाव। आपको सत्संग करने का शौक ना हुआ)। 3। 1। 6। हे (मेरे) मन ! उन लोगों का साथ छोड़ दे। जो परमात्मा की ओर से बेमुख हैं।
सारंग महला 5 सूरदास ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि के संग बसे हरि लोक ॥
तनु मनु अरपि सरबसु सभु अरपिओ अनद सहज धुनि झोक ॥1॥ रहाउ ॥
दरसनु पेखि भए निरबिखई पाए है सगले थोक ॥
आन बसतु सिउ काजु न कछूऐ सुंदर बदन अलोक ॥1॥
सिआम सुंदर तजि आन जु चाहत जिउ कुसटी तनि जोक ॥
सूरदास मनु प्रभि हथि लीनो दीनो इहु परलोक ॥2॥1॥8॥
भगत परमानन्द एक ही शबद के लिए जाने जाते हैं, मगर उस शबद की धार बहुत तेज़ है।

हिन्दी अर्थ: सारंग महला 5 सूरदास ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ (हे सूरदास !) परमात्मा की बँदगी करने वाले बँदे (सदा) परमात्मा के साथ बसते हैं (इस तरह सहज-सुभाय बेमुखों से उनका साथ छूट जाता है); वह अपना तन-मन अपना सब कुछ (इस प्यार से) सदके कर देते हैं। उनको आनंद के हिलोरे आते हैं। सहज अवस्था की तार (उनके अंदर बँध जाती है)। 1। रहाउ। (हे सूरदास !) भगती करने वाले लोग प्रभू का दीदार करके विषौ-विकारों से बच जाते हैं। उनको सारे पदार्थ मिल जाते हैं (भाव। उनकी वासनाएं समाप्त हो जाती हैं); प्रभू के सुंदर मुख का दीदार कर के उनको दुनिया की किसी और चीज़ की कोई गरज़ नहीं रह जाती। 1। (हे सूरदास !) जो मनुष्य सुंदर साँवले सज्जन (प्रभू) को बिसार के और-और पदार्थों की लालसा करते हैं। वे उस जोक की तरह हैं। जो किसी कोहड़ी के शरीर पर (लग के गंद ही चूसती है)। पर। हे सूरदास ! जिन का मन प्रभू ने खुद अपने हाथ में ले लिया है उनको उसने यह लोक और परलोक दोनों बख्शे हैं (भाव। वे लोक-परलोक दोनों जगह आनंद में रहते हैं)। 2। 1। 8।
सारंग कबीर जीउ ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
हरि बिनु कउनु सहाई मन का ॥
मात पिता भाई सुत बनिता हितु लागो सभ फन का ॥1॥ रहाउ ॥
आगे कउ किछु तुलहा बांधहु किआ भरवासा धन का ॥
कहा बिसासा इस भांडे का इतनकु लागै ठनका ॥1॥
सगल धरम पुंन फल पावहु धूरि बांछहु सभ जन का ॥
कहै कबीरु सुनहु रे संतहु इहु मनु उडन पंखेरू बन का ॥2॥1॥9॥
भगत परमानन्द एक ही शबद के लिए जाने जाते हैं, मगर उस शबद की धार बहुत तेज़ है।

हिन्दी अर्थ: सारंग कबीर जीउ ॥ सतिगुर प्रसादि ॥ परमात्मा के बिना कोई और इस मन की सहायता करने वाला नहीं हो सकता। माता। पिता। भाई। पुत्र। पत्नी – इन सबके साथ जो मोह डाला हुआ है। ये छल के साथ ही मोह डाला है (भाव। ये मोह ऐसे पदार्थों के साथ है जो छल ही हैं। सदा साथ निभने वाले नहीं है)। 1। रहाउ। (हे भाई !) इस धन का (जो तूने कमाया है) कोई ऐतबार नहीं (कि कब नाश हो जाए। सो) आगे के लिए कोई और (भाव। नाम धन का) बेड़ा बाँधो। (धन तो कहाँ रहा) इस शरीर का कोई विश्वास नहीं। इसको थोड़ी सी ठोकर लगी (कि ढहि-ढेरी हो जाता है)। 1। हे संत जनो ! (जब माँगो) गुरमुखों (के चरणों) की धूड़ माँगो। (इसी में से) सारे धर्मों और पुन्यों के फल मिलेंगे। कबीर कहता है- हे संतजनो ! सुनो। यह मन इस तरह है जैसे जंगल का कोई उड़ने वाला पक्षी (जिसको टिकाने के लिए गुरमुखों की संगति में लाओ)। 2। 1। 9।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

इस रचयिता के बारे में परम्परा-विवरण विरल हैं, मगर उनकी वाणी अपनी कह जाती है। आदि ग्रंथ के संकलन में इन रचनाओं को जगह 1604 में मिली, और तब से यही उनकी पहचान है।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “अगर मेरा भगत एक बार मुझे पकड़ के बाँध ले।”

एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।