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अंग
1237
सारंग
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किउ न अराधहु मिलि करि साधहु घरी मुहतक बेला आई ॥
किउ न अराधहु मिलि करि साधहु घरी मुहतक बेला आई ॥
अरथु दरबु सभु जो किछु दीसै संगि न कछहू जाई ॥
कहु नानक हरि हरि आराधहु कवन उपमा देउ कवन बडाई ॥2॥
पूछउ संत मेरो ठाकुरु कैसा ॥
हंीउ अरापउं देहु सदेसा ॥
देहु सदेसा प्रभ जीउ कैसा कह मोहन परवेसा ॥
अंग अंग सुखदाई पूरन ब्रहमाई थान थानंतर देसा ॥
बंधन ते मुकता घटि घटि जुगता कहि न सकउ हरि जैसा ॥
देखि चरित नानक मनु मोहिओ पूछै दीनु मेरो ठाकुरु कैसा ॥3॥
करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥
धंनि सु रिदा जिह चरन बसाइआ ॥
चरन बसाइआ संत संगाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥
भइआ प्रगासु रिदै उलासु प्रभु लोड़ीदा पाइआ ॥
दुखु नाठा सुखु घर महि वूठा महा अनंद सहजाइआ ॥
कहु नानक मै पूरा पाइआ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥4॥1॥
अरथु दरबु सभु जो किछु दीसै संगि न कछहू जाई ॥
कहु नानक हरि हरि आराधहु कवन उपमा देउ कवन बडाई ॥2॥
पूछउ संत मेरो ठाकुरु कैसा ॥
हंीउ अरापउं देहु सदेसा ॥
देहु सदेसा प्रभ जीउ कैसा कह मोहन परवेसा ॥
अंग अंग सुखदाई पूरन ब्रहमाई थान थानंतर देसा ॥
बंधन ते मुकता घटि घटि जुगता कहि न सकउ हरि जैसा ॥
देखि चरित नानक मनु मोहिओ पूछै दीनु मेरो ठाकुरु कैसा ॥3॥
करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥
धंनि सु रिदा जिह चरन बसाइआ ॥
चरन बसाइआ संत संगाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥
भइआ प्रगासु रिदै उलासु प्रभु लोड़ीदा पाइआ ॥
दुखु नाठा सुखु घर महि वूठा महा अनंद सहजाइआ ॥
कहु नानक मै पूरा पाइआ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥4॥1॥
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! घड़ी आधी घड़ी को (हरेक जीव का यहाँ से चले जाने का) वक्त आ ही जाता है। फिर क्यों ना मिल के उसके नाम की आराधना करो। हे संत जनो ! धन-पदार्थ ये सब कुछ जो दिखाई दे रहा है। कोई भी चीज़ (किसी के) साथ नहीं जाती। हे नानक ! कह- हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम सिमरा करो। मैं उसके बराबर का किसी को नहीं बता सकता। वह कितना बड़ा है- यह भी नहीं बता सकता। 2। हे भाई ! (गुरू से) मैं पूछता हूँ- हे गुरू ! मेरा मालिक प्रभू किस प्रकार का है। मुझे (ठाकुर की) खबर बता। मैं अपना हृदय (आपके चरणों में) भेटा करता हूँ। हे गुरू ! मुझे बता कि प्रभू जी किस तरह के हैं और उस मोहन-प्रभू का ठिकाना कहाँ है। (आगे से उक्तर मिलता है-) वह पूर्ण प्रभू सब जगहों में सब देशों में सुख देने वाला है और (हरेक जीव के) अंग-संग बसता है। प्रभू हरेक शरीर में मिला हुआ है (फिर भी मोह के) बँधनों से आजाद है। पर जिस प्रकार का वह प्रभू है मैं बता नहीं सकता। हे नानक ! (कह-) उसके चोज-तमाशे देख के मेरा मन (उसके प्यार में) मोहा गया है। हे भाई ! गरीब दास पूछता है- हे गुरू ! बता। मेरा मालिक-प्रभू किस प्रकार का है। 3। हे भाई ! प्रभू मेहर करके अपने सेवक के पास (स्वयं) आ जाता है। जो मनुष्य प्रभू के चरणों को अपने हृदय में बसा लेता है। उसका हृदय भाग्यशाली होता है। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में (टिक के) प्रभू के चरण (अपने हृदय में) बसा लेता है। वह (अपने अंदर से) आत्मिक जीवन की तरफ से अज्ञानता का अंधेरा दूर कर लेता है। (उसके अंदर) आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। उसके हृदय में सदा उत्साह बना रहता है (क्योंकि) जिस प्रभू को पाने की वह चिरकाल से अभिलाषा कर रहा था उसको मिल जाता है। उसके अंदर से दुख दूर हो जाता है। उसके हृदय-घर में सुख आ बसता है। उसके अंदर आत्मिक अडोलता का आनंद पैदा हो जाता है। हे नानक ! कह- मैंने भी वह पूरन-प्रभू पा लिया है। वह तो मेहर करके अपने सेवक के पास स्वयं ही आ जाता है। 4। 1।
गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥
सारंग की वार महला 4 राइ महमे हसने की धुनि
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला 2 ॥
गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥
नानक गुर बिनु मन का ताकु न उघड़ै अवर न कुंजी हथि ॥1॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
सलोक महला 2 ॥
गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥
नानक गुर बिनु मन का ताकु न उघड़ै अवर न कुंजी हथि ॥1॥
हिन्दी अर्थ: सारंग की वार महला 4 राइ महमे हसने की धुनि ईश्वर एक है, जिसे सतगुरु की कृपा से पाया जा सकता है। श्लोक महला 2 ॥ (मनुष्य का) मन (मानो) कोठा है और शरीर (इस कोठे की) छत है। (माया की) पाह (इस मन कोठे को) ताला (लगा हुआ) है। (इस ताले को खोलने के लिए) गुरू कुँजी है (भाव। मन पर से माया का प्रभाव गुरू ही दूर कर सकता है)। हे नानक ! सतिगुरू के बिना मन का दरवाजा खुल नहीं सकता। और किसी और के हाथ में (इसकी) कूँजी नहीं। 1।
न भीजै रागी नादी बेदि ॥
महला 1 ॥
न भीजै रागी नादी बेदि ॥
न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥
न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥
न भीजै रूपंी मालंी रंगि ॥
न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥
न भीजै दातंी कीतै पुंनि ॥
न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥
न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥
न भीजै केते होवहि धूड़ ॥
लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥
नानक भीजै साचै नाइ ॥2॥
न भीजै रागी नादी बेदि ॥
न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥
न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥
न भीजै रूपंी मालंी रंगि ॥
न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥
न भीजै दातंी कीतै पुंनि ॥
न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥
न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥
न भीजै केते होवहि धूड़ ॥
लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥
नानक भीजै साचै नाइ ॥2॥
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ राग गाने से। नाद बजाने से अथवा वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ने से परमात्मा प्रसन्न नहीं होता; ना ही। समाधि लगाने से ज्ञान-चर्चा करने से या जोग का कोई साधन करने से। ना ही वह प्रसन्न होता है रोज शोक मनाने से (जैसे श्रावग सरेवड़े करते हैं); रूप। माल-धन और रंग-तमाशे में व्यस्त रहने से भी प्रभू (जीव पर) खुश नहीं होता; ना ही वह भीगता है तीर्थ पर नहाने से अथवा नंगे घूमने से। दान-पुन्य करने से ईश्वर रीझता नहीं। और बाहर (जंगलों में) सुंन-मुंन बैठने से भी नहीं पसीजता। योद्धे लड़ाई में लड़ कर मरते हैं (इस तरह भी) प्रभू प्रसन्न नहीं होता। कई लोग (राख आदि मल के) मिट्टी में लिबड़ते हैं (इस तरह भी वह) खुश नहीं होता। हे नानक ! परमात्मा प्रसन्न होता है अगर उस सदा कायम रहने वाले के नाम में (जुड़ें)। (क्योंकि। जीवों के अच्छे-बुरे होने की) परख मन की भावना के अनुसार की जाती है। 2।
नव छिअ खट का करे बीचारु ॥
महला 1 ॥
नव छिअ खट का करे बीचारु ॥
निसि दिन उचरै भार अठार ॥
तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥
नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥
नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥
गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥3॥
नव छिअ खट का करे बीचारु ॥
निसि दिन उचरै भार अठार ॥
तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥
नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥
नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥
गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥3॥
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ जो मनुष्य (इतना विद्वान हो कि) नौ व्याकरणों, छह शास्त्रों और छह वेदांगों की विचार करे (भाव। इन पुस्तकों के अर्थ समझ ले)। अठारह पर्वों वाले महाभारत ग्रंथ को दिन-रात पढ़ता रहे। उस ने भी (हे प्रभू !) आपका अंत नहीं पाया। (आपके) नाम के बिना मन विकारों से मुक्ति नहीं पा सकता। कमल की नाभि में बसता ब्रहमा परमात्मा के गुणों का अंदाजा ना लगा सका। हे नानक ! गुरू के बताए हुए राह पर चल के ही (प्रभू का) नाम (सिमरन का महातम) समझा जा सकता है। 3।
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥
पउड़ी ॥
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥
आपे खेलु रचाइओनु सभु जगतु सबाइआ ॥
त्रै गुण आपि सिरजिअनु माइआ मोहु वधाइआ ॥
गुर परसादी उबरे जिन भाणा भाइआ ॥
नानक सचु वरतदा सभ सचि समाइआ ॥1॥
आपे आपि निरंजना जिनि आपु उपाइआ ॥
आपे खेलु रचाइओनु सभु जगतु सबाइआ ॥
त्रै गुण आपि सिरजिअनु माइआ मोहु वधाइआ ॥
गुर परसादी उबरे जिन भाणा भाइआ ॥
नानक सचु वरतदा सभ सचि समाइआ ॥1॥
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ माया-रहित प्रभू स्वयं ही (जगत का मूल) है उसने अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट किया है; ये सारा ही जगत-तमाशा उसने स्वयं ही रचा है। माया के तीन गुण उसने स्वयं ही बनाए हैं (और जगत में) माया का मोह (भी उसने खुद ही) प्रबल किया है। (इस त्रै-गुणी माया के मोह में से सिर्फ) वह (जीव) बचते हैं जिन को सतिगुरू की कृपा से (प्रभू की) रज़ा मीठी लगती है। हे नानक ! सदा कायम रहने वाला प्रभू (हर जगह) मौजूद है। और सारी सृष्टि उस सदा-स्थिर में टिकी हुई है (भाव। उसके हुकम के अंदर रहती है)। 1।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 1: गुरु नानक देव जी; महला 2: गुरु अंगद देव जी; महला 4: गुरु राम दास जी; महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1237 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।