किउ न अराधहु मिलि करि साधहु घरी मुहतक बेला आई ॥ अरथु दरबु सभु जो किछु दीसै संगि न कछहू जाई ॥ कहु नानक हरि हरि आराधहु कवन उपमा देउ कवन बडाई ॥2॥ पूछउ संत मेरो ठाकुरु कैसा ॥ हंीउ अरापउं देहु सदेसा ॥ देहु सदेसा प्रभ जीउ कैसा कह मोहन परवेसा ॥ अंग अंग सुखदाई पूरन ब्रहमाई थान थानंतर देसा ॥ बंधन ते मुकता घटि घटि जुगता कहि न सकउ हरि जैसा ॥ देखि चरित नानक मनु मोहिओ पूछै दीनु मेरो ठाकुरु कैसा ॥3॥ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥ धंनि सु रिदा जिह चरन बसाइआ ॥ चरन बसाइआ संत संगाइआ अगिआन अंधेरु गवाइआ ॥ भइआ प्रगासु रिदै उलासु प्रभु लोड़ीदा पाइआ ॥ दुखु नाठा सुखु घर महि वूठा महा अनंद सहजाइआ ॥ कहु नानक मै पूरा पाइआ करि किरपा अपुने पहि आइआ ॥4॥1॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: हे संत जनो ! घड़ी आधी घड़ी को (हरेक जीव का यहाँ से चले जाने का) वक्त आ ही जाता है। फिर क्यों ना मिल के उसके नाम की आराधना करो। हे संत जनो ! धन-पदार्थ ये सब कुछ जो दिखाई दे रहा है। कोई भी चीज़ (किसी के) साथ नहीं जाती। हे नानक ! कह- हे भाई ! सदा परमात्मा का नाम सिमरा करो। मैं उसके बराबर का किसी को नहीं बता सकता। वह कितना बड़ा है- यह भी नहीं बता सकता। 2। हे भाई ! (गुरू से) मैं पूछता हूँ- हे गुरू ! मेरा मालिक प्रभू किस प्रकार का है। मुझे (ठाकुर की) खबर बता। मैं अपना हृदय (आपके चरणों में) भेटा करता हूँ। हे गुरू ! मुझे बता कि प्रभू जी किस तरह के हैं और उस मोहन-प्रभू का ठिकाना कहाँ है। (आगे से उक्तर मिलता है-) वह पूर्ण प्रभू सब जगहों में सब देशों में सुख देने वाला है और (हरेक जीव के) अंग-संग बसता है। प्रभू हरेक शरीर में मिला हुआ है (फिर भी मोह के) बँधनों से आजाद है। पर जिस प्रकार का वह प्रभू है मैं बता नहीं सकता। हे नानक ! (कह-) उसके चोज-तमाशे देख के मेरा मन (उसके प्यार में) मोहा गया है। हे भाई ! गरीब दास पूछता है- हे गुरू ! बता। मेरा मालिक-प्रभू किस प्रकार का है। 3। हे भाई ! प्रभू मेहर करके अपने सेवक के पास (स्वयं) आ जाता है। जो मनुष्य प्रभू के चरणों को अपने हृदय में बसा लेता है। उसका हृदय भाग्यशाली होता है। हे भाई ! जो मनुष्य साध-संगति में (टिक के) प्रभू के चरण (अपने हृदय में) बसा लेता है। वह (अपने अंदर से) आत्मिक जीवन की तरफ से अज्ञानता का अंधेरा दूर कर लेता है। (उसके अंदर) आत्मिक जीवन का प्रकाश हो जाता है। उसके हृदय में सदा उत्साह बना रहता है (क्योंकि) जिस प्रभू को पाने की वह चिरकाल से अभिलाषा कर रहा था उसको मिल जाता है। उसके अंदर से दुख दूर हो जाता है। उसके हृदय-घर में सुख आ बसता है। उसके अंदर आत्मिक अडोलता का आनंद पैदा हो जाता है। हे नानक ! कह- मैंने भी वह पूरन-प्रभू पा लिया है। वह तो मेहर करके अपने सेवक के पास स्वयं ही आ जाता है। 4। 1।
सारंग की वार महला 4 राइ महमे हसने की धुनि ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ सलोक महला 2 ॥ गुरु कुंजी पाहू निवलु मनु कोठा तनु छति ॥ नानक गुर बिनु मन का ताकु न उघड़ै अवर न कुंजी हथि ॥1॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: सारंग की वार महला 4 राइ महमे हसने की धुनि सतिगुर प्रसादि ॥ श्लोक महला 2 ॥ (मनुष्य का) मन (मानो) कोठा है और शरीर (इस कोठे की) छत है। (माया की) पाह (इस मन कोठे को) ताला (लगा हुआ) है। (इस ताले को खोलने के लिए) गुरू कुँजी है (भाव। मन पर से माया का प्रभाव गुरू ही दूर कर सकता है)। हे नानक ! सतिगुरू के बिना मन का दरवाजा खुल नहीं सकता। और किसी और के हाथ में (इसकी) कूँजी नहीं। 1।
महला 1 ॥ न भीजै रागी नादी बेदि ॥ न भीजै सुरती गिआनी जोगि ॥ न भीजै सोगी कीतै रोजि ॥ न भीजै रूपंी मालंी रंगि ॥ न भीजै तीरथि भविऐ नंगि ॥ न भीजै दातंी कीतै पुंनि ॥ न भीजै बाहरि बैठिआ सुंनि ॥ न भीजै भेड़ि मरहि भिड़ि सूर ॥ न भीजै केते होवहि धूड़ ॥ लेखा लिखीऐ मन कै भाइ ॥ नानक भीजै साचै नाइ ॥2॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ राग गाने से। नाद बजाने से अथवा वेद (आदि धर्म-पुस्तकें) पढ़ने से परमात्मा प्रसन्न नहीं होता; ना ही। समाधि लगाने से ज्ञान-चर्चा करने से या जोग का कोई साधन करने से। ना ही वह प्रसन्न होता है रोज शोक मनाने से (जैसे श्रावग सरेवड़े करते हैं); रूप। माल-धन और रंग-तमाशे में व्यस्त रहने से भी प्रभू (जीव पर) खुश नहीं होता; ना ही वह भीगता है तीर्थ पर नहाने से अथवा नंगे घूमने से। दान-पुन्य करने से ईश्वर रीझता नहीं। और बाहर (जंगलों में) सुंन-मुंन बैठने से भी नहीं पसीजता। योद्धे लड़ाई में लड़ कर मरते हैं (इस तरह भी) प्रभू प्रसन्न नहीं होता। कई लोग (राख आदि मल के) मिट्टी में लिबड़ते हैं (इस तरह भी वह) खुश नहीं होता। हे नानक ! परमात्मा प्रसन्न होता है अगर उस सदा कायम रहने वाले के नाम में (जुड़ें)। (क्योंकि। जीवों के अच्छे-बुरे होने की) परख मन की भावना के अनुसार की जाती है। 2।
महला 1 ॥ नव छिअ खट का करे बीचारु ॥ निसि दिन उचरै भार अठार ॥ तिनि भी अंतु न पाइआ तोहि ॥ नाम बिहूण मुकति किउ होइ ॥ नाभि वसत ब्रहमै अंतु न जाणिआ ॥ गुरमुखि नानक नामु पछाणिआ ॥3॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।
हिन्दी अर्थ: महला 1 ॥ जो मनुष्य (इतना विद्वान हो कि) नौ व्याकरणों। छह शास्त्रों और छह वेदांगों की विचार करे (भाव। इन पुस्तकों के अर्थ समझ ले)। अठारह पर्वों वाले महाभारत ग्रंथ को दिन-रात पढ़ता रहे। उस ने भी (हे प्रभू !) आपका अंत नहीं पाया। (आपके) नाम के बिना मन विकारों से मुक्ति नहीं पा सकता। कमल की नाभि में बसता ब्रहमा परमात्मा के गुणों का अंदाजा ना लगा सका। हे नानक ! गुरू के बताए हुए राह पर चल के ही (प्रभू का) नाम (सिमरन का महातम) समझा जा सकता है। 3।
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।
हिन्दी अर्थ: पउड़ी ॥ माया-रहित प्रभू स्वयं ही (जगत का मूल) है उसने अपने आप को (जगत के रूप में) प्रकट किया है; ये सारा ही जगत-तमाशा उसने स्वयं ही रचा है। माया के तीन गुण उसने स्वयं ही बनाए हैं (और जगत में) माया का मोह (भी उसने खुद ही) प्रबल किया है। (इस त्रै-गुणी माया के मोह में से सिर्फ) वह (जीव) बचते हैं जिन को सतिगुरू की कृपा से (प्रभू की) रज़ा मीठी लगती है। हे नानक ! सदा कायम रहने वाला प्रभू (हर जगह) मौजूद है। और सारी सृष्टि उस सदा-स्थिर में टिकी हुई है (भाव। उसके हुकम के अंदर रहती है)। 1।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
नानक की रचनाओं में एक खास तरह की आबजर्वेशनल आँख है। एक पटवारी का पेशा छोड़ कर तीस के बाद के दशकों में वो काबुल, मक्का, अरब, असम, श्रीलंका, और तिब्बत की सरहद तक गए। हर जगह संत-फ़क़ीरों, बादशाहों, और साधारण किसानों से बातचीत की, और उसी बातचीत की पर्तें इन शबदों में बैठी हैं।
इस अंग पर 5 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे संत जनो ! घड़ी आधी घड़ी को (हरेक जीव का यहाँ से चले जाने का) वक्त आ ही जाता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।