Lulla Family

अंग 1190

अंग
1190
राग बसंत
राग: बसंत · रचयिता: गुरु नानक देव जी (महला 1)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
गुर सबदु बीचारहि आपु जाइ ॥
साच जोगु मनि वसै आइ ॥8॥
जिनि जीउ पिंडु दिता तिसु चेतहि नाहि ॥
मड़ी मसाणी मूड़े जोगु नाहि ॥9॥
गुण नानकु बोलै भली बाणि ॥
तुम होहु सुजाखे लेहु पछाणि ॥10॥5॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: (हे भाई !) अगर आप गुरू के शबद को अपनी सुरति में टिका के रखे। तो इस तरह स्वै-भाव दूर हैं सकेगा। (गुरू का शबद विचारने की बरकति से वह प्रभू-नाम) मन में आ बसता है और सदा-स्थिर प्रभू के साथ सदा का मिलाप बना देता है। 8। हे मूर्ख ! जिस परमात्मा ने आपको जिंद दी है शरीर दिया है उसको आप याद नहीं करता (और राख मल के मढ़ियों-मसाणों में डेरे लगाता है) मढ़ियों-मसाणों में बैठ के परमात्मा के साथ मिलाप नहीं बन सकता। 9। नानक तो परमात्मा की महिमा की बाणी उचारता है। प्रभू की सिफत-सालाह वाली बाणी ही सुंदर बाणी है (यही परमात्मा के चरणों में जोड़ सकती है) इस बात को समझ (अगर आप भी प्रभू की सिफत-सालाह करेगा तो) आपको भी परमात्मा का दीदार करने वाली आत्मिक आँखें मिल जाएंगी। 10। 5।
बसंतु महला 1 ॥
दुबिधा दुरमति अधुली कार ॥
मनमुखि भरमै मझि गुबार ॥1॥
मनु अंधुला अंधुली मति लागै ॥
गुर करणी बिनु भरमु न भागै ॥1॥ रहाउ ॥
मनमुखि अंधुले गुरमति न भाई ॥
पसू भए अभिमानु न जाई ॥2॥
लख चउरासीह जंत उपाए ॥
मेरे ठाकुर भाणे सिरजि समाए ॥3॥
सगली भूलै नही सबदु अचारु ॥
सो समझै जिसु गुरु करतारु ॥4॥
गुर के चाकर ठाकुर भाणे ॥
बखसि लीए नाही जम काणे ॥5॥
जिन कै हिरदै एको भाइआ ॥
आपे मेले भरमु चुकाइआ ॥6॥
बेमुहताजु बेअंतु अपारा ॥
सचि पतीजै करणैहारा ॥7॥
नानक भूले गुरु समझावै ॥
एकु दिखावै साचि टिकावै ॥8॥6॥
गुरु नानक की वाणी का एक खास सीधापन यहाँ झलकता है, बिना अलंकार के, बिना ज़ोर के। पंद्रहवीं सदी के अंत और सोलहवीं सदी के प्रारम्भ में, जब बाबर अभी काबुल से दक्षिण की ओर देख रहा था, नानक पंजाब से निकल कर अपनी पैदल यात्राओं पर थे।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1॥ वह प्रभू के बग़ैर किसी और आसरे की झाक रखता है। (माया के मोह में) अंधी हो चुकी बुरी मति के पीछे लग के ही काम करता है। अपने मन के पीछे चलने वाला मनुष्य (माया के मोह के) अंधेरे में भटकता फिरता है (ठोकरें खाता फिरता है। उसको सही जीवन-पंध नहीं दिखता)। 1। माया में अंधा हुआ मन उसी मति के पीछे चलता है जो (खुद भी) माया के मोह में अंधी हुई पड़ी है (और वह मन माया की भटकना में ही रहता है)। गुरू की बताई हुई कार किए बिना मन की यह भटकना दूर नहीं होती। 1। रहाउ। अपने मन के पीछे चलने वाले अंधे मूर्खों को गुरू की (दी हुई) मति पसंद नहीं आती (वे देखने को भले ही मनुष्य हैं पर स्वभाव से) पशू हो चुके हैं। (उनके अंदर से) अकड़ नहीं जाती। 2। सृजनहार प्रभू चौरासी लाख जूनियों में बेअंत जीव पैदा करता है। जैसे उस ठाकुर की मर्जी होती है। पैदा करता है और नाश भी कर देता है। 3। ;पर वह सारी लोकाई कुमार्ग पर पड़ी रहती है जब तक गुरू का शबद (हृदय में नहीं बसाती। और जब तक उस शबद के अनुसार अपना) कर्तव्य नहीं बनाती। वही जीव (जीवन के सही रास्ते को) समझता है जिसका राहबर गुरू बनता है करतार बनता है। 4। जो मनुष्य सतिगुरू के सेवक बनते हैं वे पालनहार प्रभू को पसंद आ जाते हैं। उन्हें जमों की मुथाजी नहीं रह जाती क्योंकि प्रभू ने उन पर मेहर कर दी होती है। 5। जिन लोगों को अपने हृदय में एक परमात्मा ही प्यारा लगता है। उनको परमात्मा स्वयं ही अपने चरणों में जोड़ लेता है। उनकी भटकना दूर हो जाती है। 6। सारी सृष्टि का सृजनहार प्रभू-सिमरन के द्वारा ही प्रसन्न किया जा सकता है। वह बेमुथाज है बेअंत है उसकी हस्ती का परला छोर नहीं पाया जा सकता। 7। हे नानक ! (माया के मोह में फस के) गलत रास्ते पड़े मनुष्य को गुरू (ही) समझा सकता है। गुरू उसको एक परमात्मा का दीदार करवा देता है। उसको सदा-स्थिर परमात्मा (की याद) में जोड़ देता है। 8। 6।
बसंतु महला 1 ॥
आपे भवरा फूल बेलि ॥
आपे संगति मीत मेलि ॥1॥
ऐसी भवरा बासु ले ॥
तरवर फूले बन हरे ॥1॥ रहाउ ॥
आपे कवला कंतु आपि ॥
आपे रावे सबदि थापि ॥2॥
आपे बछरू गऊ खीरु ॥
आपे मंदरु थंम॑ु सरीरु ॥3॥
आपे करणी करणहारु ॥
आपे गुरमुखि करि बीचारु ॥4॥
तू करि करि देखहि करणहारु ॥
जोति जीअ असंख देइ अधारु ॥5॥
तू सरु सागरु गुण गहीरु ॥
तू अकुल निरंजनु परम हीरु ॥6॥
तू आपे करता करण जोगु ॥
निहकेवलु राजन सुखी लोगु ॥7॥
नानक ध्रापे हरि नाम सुआदि ॥
बिनु हरि गुर प्रीतम जनमु बादि ॥8॥7॥
नानक का स्वर इस शबद में भी वही है, observational, साफ़, और बिना तड़क-भड़क के। एक पटवारी की दृष्टि जो हर-बात को बहीखाते के पन्नों पर लिखने वाली है, वो दृष्टि यहाँ-भी काम कर रही है।

हिन्दी अर्थ: बसंतु महला 1॥ स्वयं ही बेल है और स्वयं ही बेलों पर उगे हुए फूल है। स्वयं ही संगति है स्वयं ही संगति में सत्संगी मित्रों को इकट्ठा करता है। 1। (गुरमुखि) भौरा इस तरह (प्रभू के नाम की) सुगंधि लेता है कि उसको जंगल के सारे वृक्ष हरे और फूलों से लदे हुए दिखाई देते हैं (गुरमुखि को सारी सृष्टि में हर जगह प्रभू की ही ज्योति रुमकती दिखती है)। 1। रहाउ। (गुरमुखि को दिखता है कि) परमात्मा स्वयं ही (सुगंधी लेने वाला) भौरा है। (गुरमुखि को दिखता है कि) प्रभू खुद ही लक्ष्मी (माया) है और खुद ही लक्ष्मी का पति है। प्रभू खुद अपनी आज्ञा से सारी सृष्टि को पैदा करके खुद ही (दुनियां के पदार्थों को) भोग रहा है। 2। प्रभू स्वयं ही बछड़ा है स्वयं ही (गाय का) दूध है। प्रभू स्वयं ही मंदिर है स्वयं ही (मन्दिर का) स्तम्भ (खंभा) है। (स्वयं ही जिंद है और) स्वयं ही शरीर। 3। प्रभू खुद ही करन-योग्य काम है। प्रभू खुद ही गुरू है और खुद ही गुरू के सन्मुख हो के अपने गुणों की विचार करता है। 4। (गुरमुखि प्रभू-दर पर इस तरह अरदास करता है-) हे प्रभू ! आप सब कुछ कर सकने की ताकत रखता है। आप जीव पैदा करके और बेअंत जीवों को अपनी ज्योति का सहारा दे के स्वयं ही सबकी संभाल करता है। 5। हे प्रभू ! आप गुणों का सरोवर है। आप गुणों का अथाह समुंद्र है। आपकी कोई खास कुल नहीं। आपके ऊपर माया अपना प्रभाव नहीं डाल सकती। आप सबसे श्रेष्ठ हीरा है। 6। (गुरमुखि सदा इस प्रकार अरदास करता है-) हे राजन ! आप स्वयं ही सारे जगत को पैदा करने वाला है। और पैदा करने की समर्था रखता है। हे राजन ! आप पवित्र स्वरूप है। जिस पर आपकी मेहर होती है वह आत्मिक आनंद पाता है। 7। हे नानक ! जो भी मनुष्य परमात्मा के नाम के स्वाद में मगन होता है वह माया की तरफ से तृप्त हो जाता है। (उसको निष्चय हो जाता है कि) परमात्मा के बिना प्रीतम गुरू की शरण के बिना मनुष्य-जीवन व्यर्थ चला जाता है। 8। 7।
बसंतु हिंडोलु महला 1 घरु 2
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
नउ सत चउदह तीनि चारि करि महलति चारि बहाली ॥
चारे दीवे चहु हथि दीए एका एका वारी ॥1॥
मिहरवान मधुसूदन माधौ ऐसी सकति तुम॑ारी ॥1॥ रहाउ ॥
घरि घरि लसकरु पावकु तेरा धरमु करे सिकदारी ॥
धरती देग मिलै इक वेरा भागु तेरा भंडारी ॥2॥
ना साबूरु होवै फिरि मंगै नारदु करे खुआरी ॥
नानक की कहन यहाँ-भी पैदल यात्री की है, जिसने सुलतानपुर के बहीखाते से निकल कर तीस-वर्ष की उम्र के क़रीब काबुल, बग़दाद, मक्का, और जगन्नाथ पुरी तक का सफ़र किया। शब्द इसी सफ़र की पंक्तियाँ हैं।

हिन्दी अर्थ: बसंतु हिंडोलु महला 1 घरु 2 सतिगुर प्रसादि॥ (जब यहाँ हिन्दू राज था तो लोग हिन्दी के शब्द ही बरतते थे और कहा करते थे कि) हे प्रभू ! (तूने) नौ खण्ड। सात द्वीप। चौदह भवन। तीन लोक और चार युग बना के तूने चार खाणियों के द्वारा इस (सृष्टि-) हवेली को बसा दिया है। तूने (चार वेद रूपी) चार दीए चारों युगों के हाथ में अपनी-अपनी बारी से पकड़ा दिए। 1। हे सब जीवों पर मेहर करने वाले ! हे दुष्टों का नाश करने वाले ! हे माया के पति प्रभू ! आपकी इस तरह की ताकत है (कि जहाँ पहले हिन्दू धर्म का राज था सब लोग अपनी आम बोलचाल में हिन्दके शब्द बरतते थे। हाँ पर अब तूने मुसलमानी राज कर दिया है। साथ ही लोगों की बोली भी बदल गई है)। 1। रहाउ। हरेक शरीर में आपकी ही जोति व्यापक है। ये सारे जीव आपका लश्कर हैं। और इन जीवों पर (आपका पैदा किया हुआ) धर्मराज सरदारी करता है। (तूने इस लश्कर की पालना के लिए) धरती (-रूप) देग बना दी जिसमें से एक ही बार में (भाव। अतॅुट भण्डारा) मिलता है। हरेक जीव का प्रारब्ध आपका भण्डारा बाँट रहा है। 2। (हे प्रभू ! आपका इतना बेअंत भण्डारा होते हुए भी जीव का मन) नारद (जीव के लिए) दुख पैदा करता है। सिदक-हीन मन बार-बार (पदार्थ) माँगता रहता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु नानक की वाणी का अपना मिज़ाज है, सीधा-सादा, बिना अलंकार के, मगर हर पंक्ति में एक ठहराव। 1469 में तलवण्डी में जन्म, सुलतानपुर के बहीखाते में कुछ साल काम, फिर तीस की उम्र के क़रीब वो लम्बी पैदल यात्रा जो काबुल, बग़दाद, मक्का, जगन्नाथ-पुरी, तिब्बत की सरहद तक उन्हें ले गयी। उनके शबद इन्हीं यात्राओं की वाणी हैं।

इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “(हे भाई !) अगर आप गुरू के शबद को अपनी सुरति में टिका के रखे।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।