अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: स्वयं ही गुरू के द्वारा इज्जत बख्शता है। हे नानक ! (जिस पर परमात्मा मेहर करता है)। वह हरी-नाम में लीन रहता है। 4। 9। 19।
भैरउ महला 3 ॥ मेरी पटीआ लिखहु हरि गोविंद गोपाला ॥ दूजै भाइ फाथे जम जाला ॥ सतिगुरु करे मेरी प्रतिपाला ॥ हरि सुखदाता मेरै नाला ॥1॥ गुर उपदेसि प्रहिलादु हरि उचरै ॥ सासना ते बालकु गमु न करै ॥1॥ रहाउ ॥ माता उपदेसै प्रहिलाद पिआरे ॥ पुत्र राम नामु छोडहु जीउ लेहु उबारे ॥ प्रहिलादु कहै सुनहु मेरी माइ ॥ राम नामु न छोडा गुरि दीआ बुझाइ ॥2॥ संडा मरका सभि जाइ पुकारे ॥ प्रहिलादु आपि विगड़िआ सभि चाटड़े विगाड़े ॥ दुसट सभा महि मंत्रु पकाइआ ॥ प्रहलाद का राखा होइ रघुराइआ ॥3॥ हाथि खड़गु करि धाइआ अति अहंकारि ॥ हरि तेरा कहा तुझु लए उबारि ॥ खिन महि भैआन रूपु निकसिआ थंम॑ उपाड़ि ॥ हरणाखसु नखी बिदारिआ प्रहलादु लीआ उबारि ॥4॥ संत जना के हरि जीउ कारज सवारे ॥ प्रहलाद जन के इकीह कुल उधारे ॥ गुर कै सबदि हउमै बिखु मारे ॥ नानक राम नामि संत निसतारे ॥5॥10॥20॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! (प्रहलाद अपने पढ़ाने वालों को रोज कहता है-) मेरी तख्ती पर हरी का नाम लिख दो। गोबिंद का नाम लिख दो। गोपाल का नाम लिख दो। जो मनुष्य सिर्फ माया के प्यार में रहते हैं। वे आत्मिक मौत के जाल में फसे रहते हैं। मेरा गुरू मेरी रक्षा कर रहा है। सारे सुख देने वाला परमात्मा (हर वक्त) मेरे अंग-संग बसता है। 1। हे भाई ! (अपने) गुरू की शिक्षा पर चल के प्रहलाद परमात्मा का नाम जपता है। बालक (प्रहलाद) किसी भी शारीरिक कष्ट से डरता नहीं। 1। रहाउ। हे भाई ! (प्रहलाद को उसकी) माँ समझाती है- हे प्यारे प्रहलाद ! हे (मेरे) पुत्र ! परमात्मा का नाम छोड़ दे। अपनी जान बचा ले। (आगे से) प्रहलाद कहता है- हे मेरी माँ ! सुन। मैं परमात्मा का नाम नहीं छोड़ूगा (यह नाम जपना मुझे मेरे) गुरू ने समझाया है। 2। हे भाई ! संड अमरक व और सभी ने जा के (हर्नाक्षस के पास) पुकार की- प्रहलाद खुद ही बिगड़ा हुआ है। (उसने) बाकी के सारे बच्चे भी बिगाड़ दिए हैं। हे भाई ! (ये सुन के) उन दुष्टों ने सलाह पक्की की (कि प्रहलाद को खत्म कर दिया जाए। पर) प्रहलाद का रक्षक स्वयं परमात्मा बन गया। 3। हे भाई ! (हर्णाक्षस व हर्णाकश्यप) हाथ में तलवार पकड़ के बड़े अहंकार से (प्रहलाद पर) टूट पड़ा (और कहने लगा- बता) कहाँ है आपका हरी। जो (आपको) बचा ले। (ये कहने की देर थी कि एक दम) एक पल में ही (परमात्मा) भयानक रूप (धारण करके) खंभा फाड़ के निकल आया। (उसने नरसिंघ रूप में) हर्णाकश्यप को (अपने नाखूनों से) चीर डाला और प्रहलाद को बचा लिया। 4। हे भाई ! परमात्मा सदा अपने भक्तों के सारे काम सँवारता है (देख ! उसने) प्रहलाद की 21 कुलों का (भी) उद्धार कर दिया। हे नानक ! परमात्मा अपने संतों को गुरू शबद में जोड़ के (उनके अंदर से) आत्मिक मौत लाने वाले अहंकार को समाप्त कर देता है। और। हरी-नाम में जोड़ के उनको संसार-समुंद्र से पार लंघा देता है। 5। 10। 20।
भैरउ महला 3 ॥ आपे दैत लाइ दिते संत जना कउ आपे राखा सोई ॥ जो तेरी सदा सरणाई तिन मनि दुखु न होई ॥1॥ जुगि जुगि भगता की रखदा आइआ ॥ दैत पुत्रु प्रहलादु गाइत्री तरपणु किछू न जाणै सबदे मेलि मिलाइआ ॥1॥ रहाउ ॥ अनदिनु भगति करहि दिन राती दुबिधा सबदे खोई ॥ सदा निरमल है जो सचि राते सचु वसिआ मनि सोई ॥2॥ मूरख दुबिधा पड़्हहि मूलु न पछाणहि बिरथा जनमु गवाइआ ॥ संत जना की निंदा करहि दुसटु दैतु चिड़ाइआ ॥3॥ प्रहलादु दुबिधा न पड़ै हरि नामु न छोडै डरै न किसै दा डराइआ ॥ संत जना का हरि जीउ राखा दैतै कालु नेड़ा आइआ ॥4॥ आपणी पैज आपे राखै भगतां देइ वडिआई ॥ नानक हरणाखसु नखी बिदारिआ अंधै दर की खबरि न पाई ॥5॥11॥21॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।
हिन्दी अर्थ: भैरउ महला 3॥ हे भाई ! परमात्मा स्वयं ही (अपने) संत जनों को (दुख देने के लिए उन पर) दैत्य चिपका देता है। पर वह स्वयं ही (संत जनों का) रखवाला बनता है। हे प्रभू ! जो मनुष्य आपकी शरण में सदा टिके रहते हैं (दुष्ट भले ही कितने ही कष्ट उनकों दें) उनके मन को कोई तकलीफ़ नहीं होती। 1। हे भाई ! हरेक युग में (परमात्मा अपने) भगतों की (इज्जत) रखता आया है। (देखो) हर्णाक्षस का पुत्र प्रहलाद गायत्री (मंत्र का पाठ करना; पित्रों की प्रसन्नता के लिए) पूजा-अर्चना (करनी) ये सब कुछ भी नहीं था जानता। (परमात्मा ने उसको गुरू के) शबद में जोड़ के (अपने चरणों में) मिला लिया। 1। रहाउ। हे भाई ! जो मनुष्य दिन-रात हर वक्त परमात्मा की भक्ति करते हैं। उन्होंने गुरू के शबद से (अपने अंदर से) मेर-तेर समाप्त कर ली होती है। हे भाई ! जो मनुष्य सदा-स्थिर हरी-नाम में रति रहते हैं। जिनके मन में वह सदा-स्थिर प्रभू ही बसा रहता है उनका जीवन सदा पवित्र टिका रहता है। 2। हे भाई ! मूर्ख लोग मेर-तेर (पैदा करने वाली विद्या ही नित्य) पढ़ते हैं। रचनहार करतार के साथ सांझ नहीं डालते। संतजनों की निंदा (भी) करते हैं (इस तरह अपना) जीवन व्यर्थ गवा लेते हैं। (इस तरह के मूर्ख संड अमरक आदि ने ही) दुष्ट दैत्य (हर्णाक्षस) को (प्रहलाद के विरुद्ध) भड़काया था। 3। पर। हे भाई ! प्रहलाद मेर-तेर (पैदा करने वाली विद्या) नहीं पढ़ता। वह परमात्मा का नाम नहीं छोड़ता। वह किसी का डराया डरता नहीं। हे भाई ! परमात्मा अपने संतजनों का रखवाला स्वयं है। (प्रहलाद से पंगा ले के मूर्ख हणाक्षस) दैत्य का काल (बल्कि) नजदीक आ पहुँचा। 4। हे भाई ! (भगतों की इज्जत और परमात्मा की इज्जत सांझी है। भगतों के सम्मान को अपना सम्मान जान के) परमात्मा (भगतों की मदद करके) अपना सम्मान स्वयं बचाता है। (अपने) भगतों को (सदा) वडिआई बख्शता है। (तभी तो) हे नानक ! (परमात्मा ने नरसिंघ रूप धार के) हर्णाक्षस को (अपने) नाखूनों से चीर दिया। (ताकत के नशे में) अंधे हो चुके (हर्णाक्षस) ने परमात्मा के दर का भेद ना समझा। 5। 11। 21। 8। 21। 29।
रागु भैरउ महला 4 चउपदे घरु 1 ੴ सतिगुर प्रसादि ॥ हरि जन संत करि किरपा पगि लाइणु ॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।
हिन्दी अर्थ: रागु भैरउ महला 4 चउपदे घरु 1 सतिगुर प्रसादि॥ हे मेरे मन ! (परमात्मा स्वयं) कृपा करके (जिस मनुष्य को अपने) संत जनों के चरणों में लगाता है (वह मनुष्य हरी का नाम जपता है)।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर वर्ष की आयु में गुरु-गद्दी सँभाली, 1552 में, और 1574 तक रहे। उनकी वाणी में बुढ़ापे, समाज की संरचना, और संगति की चिन्ताएँ बार-बार लौटती हैं। उन्होंने ही लंगर (साझा-भोजन) की व्यवस्था मज़बूत की, और देश-भर में बाईस मंजी (केन्द्र) स्थापित किए।
इस अंग पर 4 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “स्वयं ही गुरू के द्वारा इज्जत बख्शता है।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।