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1120
केदारा
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वारी फेरी सदा घुमाई कवनु अनूपु तेरो ठाउ ॥1॥
वारी फेरी सदा घुमाई कवनु अनूपु तेरो ठाउ ॥1॥
सरब प्रतिपालहि सगल समालहि सगलिआ तेरी छाउ ॥
नानक के प्रभ पुरख बिधाते घटि घटि तुझहि दिखाउ ॥2॥2॥4॥
सरब प्रतिपालहि सगल समालहि सगलिआ तेरी छाउ ॥
नानक के प्रभ पुरख बिधाते घटि घटि तुझहि दिखाउ ॥2॥2॥4॥
हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! मैं आपसे वारने जाता हूँ। आपसे सदके जाता हूँ। कुर्बान जाता हूँ। (जहाँ आप बसते हैं) आपकी (वह) जगह बहुत ही सुंदर है। 1। हे प्रभू ! आप सब जीवों की पालना करते हैं। आप सबकी संभाल करते हैं। सब जीवों को आपका ही आसरा है। हे नानक के प्रभू ! हे सर्व-व्यापक सृजनहार ! (मेहर करें) मैं आपको ही हरेक शरीर में देखता रहूँ। 2। 2। 4।
प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥
केदारा महला 5 ॥
प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥
मगन मनै महि चितवउ आसा नैनहु तार तुहारी ॥ रहाउ ॥
ओइ दिन पहर मूरत पल कैसे ओइ पल घरी किहारी ॥
खूले कपट धपट बुझि त्रिसना जीवउ पेखि दरसारी ॥1॥
कउनु सु जतनु उपाउ किनेहा सेवा कउन बीचारी ॥
मानु अभिमानु मोहु तजि नानक संतह संगि उधारी ॥2॥3॥5॥
प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥
मगन मनै महि चितवउ आसा नैनहु तार तुहारी ॥ रहाउ ॥
ओइ दिन पहर मूरत पल कैसे ओइ पल घरी किहारी ॥
खूले कपट धपट बुझि त्रिसना जीवउ पेखि दरसारी ॥1॥
कउनु सु जतनु उपाउ किनेहा सेवा कउन बीचारी ॥
मानु अभिमानु मोहु तजि नानक संतह संगि उधारी ॥2॥3॥5॥
हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! प्यारे प्रभू की प्रीति मेरे मन को आकर्षित करती रहती है। हे प्रभू ! अपने मन में मस्त (रह के) मैं (आपके दर्शनों की) आशाएं चितवता रहता हूँ। मेरी आँखों में (आपके दर्शनो की) चाहत-भरा इन्तज़ार बना रहता है। रहाउ। हे भाई ! वह दिन। वह पहर। वह महूरत। वह पल बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। वह घड़ी भी बहुत भाग्यों वाली होती है। जब (मनुष्य के अंदर से) माया की तृष्णा मिट के उसके (मन के बँद हो चुके) किवाड़ झटपट खुल जाते हैं। हे भाई ! प्रभू के दर्शन करके (मेरे अंदर तो) आत्मिक जीवन पैदा होता है। 1। हे नानक ! (कहें- हे भाई !) मैं वह कौन सा यतन कहूँ। कौन सी बात बताऊँ। मैं वह कौन सी सेवा विचारूँ (जिन के सदका प्यारे प्रभू के दर्शन हो सकते हैं)। हे भाई ! संतजनों की संगति में मान-अहंकार-मोह त्याग के पार-उतारा होता है (और प्रभू का मिलाप होता है)। 2। 3। 5।
हरि हरि हरि गुन गावहु ॥
केदारा महला 5 ॥
हरि हरि हरि गुन गावहु ॥
करहु क्रिपा गोपाल गोबिदे अपना नामु जपावहु ॥ रहाउ ॥
काढि लीए प्रभ आन बिखै ते साधसंगि मनु लावहु ॥
भ्रमु भउ मोहु कटिओ गुर बचनी अपना दरसु दिखावहु ॥1॥
सभ की रेन होइ मनु मेरा अहंबुधि तजावहु ॥
अपनी भगति देहि दइआला वडभागी नानक हरि पावहु ॥2॥4॥6॥
हरि हरि हरि गुन गावहु ॥
करहु क्रिपा गोपाल गोबिदे अपना नामु जपावहु ॥ रहाउ ॥
काढि लीए प्रभ आन बिखै ते साधसंगि मनु लावहु ॥
भ्रमु भउ मोहु कटिओ गुर बचनी अपना दरसु दिखावहु ॥1॥
सभ की रेन होइ मनु मेरा अहंबुधि तजावहु ॥
अपनी भगति देहि दइआला वडभागी नानक हरि पावहु ॥2॥4॥6॥
हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! सदा परमात्मा के गुण गाते रहा करें। हे गोपाल ! हे गोविंद ! (मेरे पर) मेहर करें। मुझे अपना नाम जपने में सहायता करें। रहाउ। हे प्रभू ! आप मनुष्यों का मन साध-संगति में लगाते हैं। उनको आपने अन्य विषयों में से निकाल लिया है। हे प्रभू ! जिनको आप अपने दर्शन देते हैं। गुरू के बचनों से उनका भ्रम उनका डर उनका मोह काटा जाता है। 1। हे दयालु प्रभू ! (मेहर करें। मुझे) अपनी भक्ति (की दाति) बख्शें (मेहर करें। मेरे अंदर से) अहंकार दूर करें। मेरा मन सबके चरणों की धूल हुआ रहे। हे नानक ! (कहें- हे भाई !) आप बड़े भाग्यों से (ही) परमात्मा का मिलाप हासिल कर सकते हैं। 2। 4। 6।
हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥
केदारा महला 5 ॥
हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥
तजि गोपाल आन रंगि राचत मिथिआ पहिरत खात ॥ रहाउ ॥
धनु जोबनु संपै सुख भोुगवै संगि न निबहत मात ॥
म्रिग त्रिसना देखि रचिओ बावर द्रुम छाइआ रंगि रात ॥1॥
मान मोह महा मद मोहत काम क्रोध कै खात ॥
करु गहि लेहु दास नानक कउ प्रभ जीउ होइ सहात ॥2॥5॥7॥
हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥
तजि गोपाल आन रंगि राचत मिथिआ पहिरत खात ॥ रहाउ ॥
धनु जोबनु संपै सुख भोुगवै संगि न निबहत मात ॥
म्रिग त्रिसना देखि रचिओ बावर द्रुम छाइआ रंगि रात ॥1॥
मान मोह महा मद मोहत काम क्रोध कै खात ॥
करु गहि लेहु दास नानक कउ प्रभ जीउ होइ सहात ॥2॥5॥7॥
हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा (के भजन) के बिना जिंदगी व्यर्थ चली जाती है। (जो मनुष्य) परमात्मा (की याद) भुला के और ही रंग में मस्त रहता है। उसका पहनना-खाना सब कुछ व्यर्थ है। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य यहाँ) धन-दौलत (इकट्ठी करता है)। जवानी का आनंद लेता है (पर इनमें से कोई भी चीज़ जगत से चलने के वक्त) रत्ती भर भी (मनुष्य के) साथ नहीं जाती। पागल मनुष्य (माया की इस) मृग-मारीचिका को देख के मस्त रहता है (जैसे) पेड़ की छाया की मौज में मस्त है। 1। हे भाई ! मनुष्य (दुनिया के) मान-मोह के भारी नशे में मोहित हुआ रहता है। काम-क्रोध के गड्ढे में गिरा रहता है। हे प्रभू जी ! (नानक की) सहायता करने वाले बन के दास नानक को हाथ पकड़ के (इस गड्ढे में गिरने से) बचा लें। 2। 5। 7।
हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥
केदारा महला 5 ॥
हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥
दीना नाथ करुणापति सुआमी अनाथा के नाथ ॥ रहाउ ॥
सुत संपति बिखिआ रस भोुगवत नह निबहत जम कै पाथ ॥
नामु निधानु गाउ गुन गोबिंद उधरु सागर के खात ॥1॥
सरनि समरथ अकथ अगोचर हरि सिमरत दुख लाथ ॥
नानक दीन धूरि जन बांछत मिलै लिखत धुरि माथ ॥2॥6॥8॥
हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥
दीना नाथ करुणापति सुआमी अनाथा के नाथ ॥ रहाउ ॥
सुत संपति बिखिआ रस भोुगवत नह निबहत जम कै पाथ ॥
नामु निधानु गाउ गुन गोबिंद उधरु सागर के खात ॥1॥
सरनि समरथ अकथ अगोचर हरि सिमरत दुख लाथ ॥
नानक दीन धूरि जन बांछत मिलै लिखत धुरि माथ ॥2॥6॥8॥
हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! (जगत से चलने के वक्त) परमात्मा के नाम के बिना और कोई (जीव के) साथ नहीं जाता। हे दीनों के नाथ ! हे मेहरों के साई ! हे स्वामी ! हे अनाथों के नाथ ! (आपका नाम ही असल साथी है)। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य के पास) पुत्र (होते हैं)। धन (होता है)। (मनुष्य) माया के अनेकों रस भोगता है। पर जमराज के रास्ते पर चलने के वक्त कोई साथ नहीं निभाता। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही (साथ निभने वाला असल) खजाना है। गोबिंद के गुण गाया करें। (इस तरह अपने आप को) संसार-समुंद्र के (विकारों के) गड्ढे (में गिरने) से बचा लें। 1। हे समर्थ ! हे अकॅथ ! हे अगोचर ! हे हरी ! (मैं आपकी) शरण (आया हूँ)। (आपका नाम) सिमरने से सारे दुख दूर हो जाते हैं। हे नानक ! (कहें- हे प्रभू !) दास गरीब आपके संत जनों की चरण-धूड़ माँगता है। यह चरण-धूड़ उस मनुष्य को मिलती है। जिसके माथे पर धुर-दरगाह से लिखी होती है। 2। 6। 8।
बिसरत नाहि मन ते हरी ॥
केदारा महला 5 घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिसरत नाहि मन ते हरी ॥
अब इह प्रीति महा प्रबल भई आन बिखै जरी ॥ रहाउ ॥
बूंद कहा तिआगि चात्रिक मीन रहत न घरी ॥
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिसरत नाहि मन ते हरी ॥
अब इह प्रीति महा प्रबल भई आन बिखै जरी ॥ रहाउ ॥
बूंद कहा तिआगि चात्रिक मीन रहत न घरी ॥
हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5 घरु 5 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य के) मन से परमात्मा नहीं बिसरता। उसके अंदर आखिर यह प्यार इतना बलवान हो जाता है कि अन्य सारे विषय (इस प्रीति-अग्नि में) जल जाते हैं। रहाउ। हे भाई ! (देखें प्रीति के कारनामे !) पपीहा (स्वाति नक्षत्र की वर्षा की) बूँद को छोड़ के और (किसी) बूँद से तृप्त नहीं होता। मछली (का पानी से इतना प्यार है कि वह पानी के बिना) एक घड़ी भी जी नहीं सकती।
रचयिता और स्रोत
इस अंग के रचयिता-संकेत: महला 5: गुरु अर्जन देव जी।
देवनागरी लिप्यन्तरण और हिन्दी अर्थ के साथ पढ़िए। उपलब्ध हिन्दी अर्थ का आधार बानीडीबी में संकलित प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका है। मूल गुरमुखी और विस्तृत व्याख्या के लिए गुरु ग्रंथ दर्पन, अंग 1120 खोल सकते हैं। स्वतंत्र अंग्रेज़ी अनुवाद संत सिंह खालसा के पाठ में है।