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अंग 1120

अंग
1120
राग केदारा
राग: केदारा · रचयिता: गुरु अर्जन देव जी (महला 5)
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
वारी फेरी सदा घुमाई कवनु अनूपु तेरो ठाउ ॥1॥
सरब प्रतिपालहि सगल समालहि सगलिआ तेरी छाउ ॥
नानक के प्रभ पुरख बिधाते घटि घटि तुझहि दिखाउ ॥2॥2॥4॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! मैं आपसे वारने जाता हूँ। आपके से सदके जाता हूँ। कुर्बान जाता हूँ। (जहाँ आप बसता है) आपकी (वह) जगह बहुत ही सुंदर है। 1। हे प्रभू ! आप सब जीवों की पालना करता है। आप सबकी संभाल करता है। सब जीवों को आपका ही आसरा है। हे नानक के प्रभू ! हे सर्व-व्यापक सृजनहार ! (मेहर कर) मैं आपको ही हरेक शरीर में देखता रहूँ। 2। 2। 4।
केदारा महला 5 ॥
प्रिअ की प्रीति पिआरी ॥
मगन मनै महि चितवउ आसा नैनहु तार तुहारी ॥ रहाउ ॥
ओइ दिन पहर मूरत पल कैसे ओइ पल घरी किहारी ॥
खूले कपट धपट बुझि त्रिसना जीवउ पेखि दरसारी ॥1॥
कउनु सु जतनु उपाउ किनेहा सेवा कउन बीचारी ॥
मानु अभिमानु मोहु तजि नानक संतह संगि उधारी ॥2॥3॥5॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! प्यारे प्रभू की प्रीति मेरे मन को आकर्षित करती रहती है। हे प्रभू ! अपने मन में मस्त (रह के) मैं (आपके दर्शनों की) आशाएं चितवता रहता हूँ। मेरी आँखों में (आपके दर्शनो की) चाहत-भरा इन्तज़ार बना रहता है। रहाउ। हे भाई ! वह दिन। वह पहर। वह महूरत। वह पल बहुत ही भाग्यशाली होते हैं। वह घड़ी भी बहुत भाग्यों वाली होती है। जब (मनुष्य के अंदर से) माया की तृष्णा मिट के उसके (मन के बँद हो चुके) किवाड़ झटपट खुल जाते हैं। हे भाई ! प्रभू के दर्शन करके (मेरे अंदर तो) आत्मिक जीवन पैदा होता है। 1। हे नानक ! (कह- हे भाई !) मैं वह कौन सा यतन कहूँ। कौन सी बात बताऊँ। मैं वह कौन सी सेवा विचारूँ (जिन के सदका प्यारे प्रभू के दर्शन हो सकते हैं)। हे भाई ! संतजनों की संगति में मान-अहंकार-मोह त्याग के पार-उतारा होता है (और प्रभू का मिलाप होता है)। 2। 3। 5।
केदारा महला 5 ॥
हरि हरि हरि गुन गावहु ॥
करहु क्रिपा गोपाल गोबिदे अपना नामु जपावहु ॥ रहाउ ॥
काढि लीए प्रभ आन बिखै ते साधसंगि मनु लावहु ॥
भ्रमु भउ मोहु कटिओ गुर बचनी अपना दरसु दिखावहु ॥1॥
सभ की रेन होइ मनु मेरा अहंबुधि तजावहु ॥
अपनी भगति देहि दइआला वडभागी नानक हरि पावहु ॥2॥4॥6॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! सदा परमात्मा के गुण गाते रहा करो। हे गोपाल ! हे गोविंद ! (मेरे पर) मेहर कर। मुझे अपना नाम जपने में सहायता कर। रहाउ। हे प्रभू ! आप मनुष्यों का मन साध-संगति में लगाता है। उनको तूने अन्य विषियों में से निकाल लिया है। हे प्रभू ! जिनको आप अपने दर्शन देता है। गुरू के बचनों से उनका भ्रम उनका डर उनका मोह काटा जाता है। 1। हे दयालु प्रभू ! (मेहर कर। मुझे) अपनी भक्ति (की दाति) बख्श (मेहर कर। मेरे अंदर से) अहंकार दूर कर। मेरा मन सबके चरणों की धूल हुआ रहे। हे नानक ! (कह- हे भाई !) आप बड़े भाग्यों से (ही) परमात्मा का मिलाप हासिल कर सकते हैं। 2। 4। 6।
केदारा महला 5 ॥
हरि बिनु जनमु अकारथ जात ॥
तजि गोपाल आन रंगि राचत मिथिआ पहिरत खात ॥ रहाउ ॥
धनु जोबनु संपै सुख भोुगवै संगि न निबहत मात ॥
म्रिग त्रिसना देखि रचिओ बावर द्रुम छाइआ रंगि रात ॥1॥
मान मोह महा मद मोहत काम क्रोध कै खात ॥
करु गहि लेहु दास नानक कउ प्रभ जीउ होइ सहात ॥2॥5॥7॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! परमात्मा (के भजन) के बिना जिंदगी व्यर्थ चली जाती है। (जो मनुष्य) परमात्मा (की याद) भुला के और ही रंग में मस्त रहता है। उसका पहनना-खाना सब कुछ व्यर्थ है। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य यहाँ) धन-दौलत (इकट्ठी करता है)। जवानी का आनंद लेता है (पर इनमें से कोई भी चीज़ जगत से चलने के वक्त) रक्ती भर भी (मनुष्य के) साथ नहीं जाती। पागल मनुष्य (माया की इस) मृग-मारीचिका को देख के मस्त रहता है (जैसे) पेड़ की छाया की मौज में मस्त है। 1। हे भाई ! मनुष्य (दुनिया के) मान-मोह के भारे नशे में मोहित हुआ रहता है। काम-क्रोध के गड्ढे में गिरा रहता है। हे प्रभू जी ! (नानक की) सहायता करने वाले बन के दास नानक को हाथ पकड़ के (इस गड्ढे में गिरने से) बचा ले। 2। 5। 7।
केदारा महला 5 ॥
हरि बिनु कोइ न चालसि साथ ॥
दीना नाथ करुणापति सुआमी अनाथा के नाथ ॥ रहाउ ॥
सुत संपति बिखिआ रस भोुगवत नह निबहत जम कै पाथ ॥
नामु निधानु गाउ गुन गोबिंद उधरु सागर के खात ॥1॥
सरनि समरथ अकथ अगोचर हरि सिमरत दुख लाथ ॥
नानक दीन धूरि जन बांछत मिलै लिखत धुरि माथ ॥2॥6॥8॥
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5॥ हे भाई ! (जगत से चलने के वक्त) परमात्मा के नाम के बिना और कोई (जीव के) साथ नहीं जाता। हे दीनों के नाथ ! हे मेहरों के साई ! हे स्वामी ! हे अनाथों के नाथ ! (आपका नाम ही असल साथी है)। रहाउ। हे भाई ! (मनुष्य के पास) पुत्र (होते हैं)। धन (होता है)। (मनुष्य) माया के अनेकों रस भोगता है। पर जमराज के रास्ते पर चलने के वक्त कोई साथ नहीं निभाता। हे भाई ! परमात्मा का नाम ही (साथ निभने वाला असल) खजाना है। गोबिंद के गुण गाया कर। (इस तरह अपने आप को) संसार-समुंद्र के (विकारों के) गड्ढे (में गिरने) से बचा ले। 1। हे समर्थ ! हे अकॅथ ! हे अगोचर ! हे हरी ! (मैं आपकी) शरण (आया हूँ)। (आपका नाम) सिमरने से सारे दुख दूर हैं जाते हैं। हे नानक ! (कह- हे प्रभू !) दास गरीब आपके संत जनों की चरण-धूड़ माँगता है। यह चरण-धूड़ उस मनुष्य को मिलती है। जिसके माथे पर धुर-दरगाह से लिखी होती है। 2। 6। 8।
केदारा महला 5 घरु 5
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
बिसरत नाहि मन ते हरी ॥
अब इह प्रीति महा प्रबल भई आन बिखै जरी ॥ रहाउ ॥
बूंद कहा तिआगि चात्रिक मीन रहत न घरी ॥
गुरु अर्जन देव जी ने 1604 में आदि ग्रंथ का संकलन पूरा किया, और दो वर्ष बाद, 1606 में, जहाँगीर के दरबार में चालीस-तीन की उम्र में शहीद हुए। उनकी अपनी वाणी सबसे सघन है, सघन, बहु-स्तरीय।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 5 घरु 5 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे भाई ! (जिस मनुष्य के) मन से परमात्मा नहीं बिसरता। उसके अंदर आखिर यह प्यार इतना बलवान हो जाता है कि अन्य सारे विषौ (इस प्रीति-अग्नि में) जल जाते हैं। रहाउ। हे भाई ! (देखो प्रीति के कारनामे !) पपीहा (स्वाति नक्षत्र की वर्षा की) बूँद को छोड़ के और (किसी) बूँद से तृप्त नहीं होता। मछली (का पानी से इतना प्यार है कि वह पानी के बिना) एक घड़ी भी जी नहीं सकती।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।

इस अंग पर 6 शबद हैं, क्रम-से बँधे। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे प्रभू ! मैं आपसे वारने जाता हूँ।”

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।