Lulla Family

अंग 1118

अंग
1118
राग केदारा
राग: केदारा · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
केदारा महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन राम नाम नित गावीऐ रे ॥
अगम अगोचरु न जाई हरि लखिआ गुरु पूरा मिलै लखावीऐ रे ॥ रहाउ ॥
जिसु आपे किरपा करे मेरा सुआमी तिसु जन कउ हरि लिव लावीऐ रे ॥
सभु को भगति करे हरि केरी हरि भावै सो थाइ पावीऐ रे ॥1॥
हरि हरि नामु अमोलकु हरि पहि हरि देवै ता नामु धिआवीऐ रे ॥
जिस नो नामु देइ मेरा सुआमी तिसु लेखा सभु छडावीऐ रे ॥2॥
हरि नामु अराधहि से धंनु जन कहीअहि तिन मसतकि भागु धुरि लिखि पावीऐ रे ॥
तिन देखे मेरा मनु बिगसै जिउ सुतु मिलि मात गलि लावीऐ रे ॥3॥
हम बारिक हरि पिता प्रभ मेरे मो कउ देहु मती जितु हरि पावीऐ रे ॥
जिउ बछुरा देखि गऊ सुखु मानै तिउ नानक हरि गलि लावीऐ रे ॥4॥1॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 4 घरु 1 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम सदा सिमरना चाहिए। हे मन ! वह परमात्मा अपहुँच है। ज्ञानेन्द्रियों की पहुँच से परे है। (मनुष्य की अपनी अक्ल से वह) समझा नहीं जा सकता। जब पूरा गुरू मिलता है तब उसको समझा जा सकता है। रहाउ। हे मेरे मन ! मेरा मालिक प्रभू जिस मनुष्य पर स्वयं ही कृपा करता है। उस मनुष्य को प्रभू (अपने चरणों का) प्यार लगाता है। हे मन ! (अपनी ओर से) हरेक जीव परमात्मा की भक्ति करता है। पर वही मनुष्य (उसके दर पर) परवान होता है जो उसको प्यारा लगता है। 1। हे मेरे मन ! परमात्मा का नाम किसी दुनियावी मूल्य से नहीं मिल सकता। (उसका यह नाम उस) परमात्मा के (अपने) पास है। जब परमात्मा (किसी को नाम की दाति) देता है। तब ही सिमरा जा सकता है। हे मन ! मेरा मालिक प्रभू जिस मनुष्य को अपना नाम देता है उस (के पिछले किए हुए कर्मों का) सारा हिसाब समाप्त हो जाता है। 2। हे मेरे मन ! जो मनुष्य परमात्मा का नाम सिमरते हैं। वह मनुष्य भाग्यशाली कहे जाते हैं। उनके माथे पर धुर से ही प्रभू की हजूरी से लिखी अच्छी किस्मत उनको प्राप्त हो जाती है। हे भाई ! उनके दर्शन करने से मेरा मन (इस तरह) खुश होता है। जैसे पुत्र (अपनी) माँ को मिल के (खुश होता है)। वह माँ के गले से चिपक जाता है। 3। हे मेरे पिता-प्रभू ! हम जीव आपके बच्चे हैं। (हे प्रभू !) मुझे ऐसी मति दे। जिससे आपका नाम प्राप्त हैं सके। हे नानक ! जैसे गाय (अपने) बछरे को देख के प्रसन्न होती है वैसे ही वह भाग्यशाली मनुष्य सुखी महसूस करता है जिसको परमात्मा अपने गले से लगा लेता है। 4। 1।
केदारा महला 4 घरु 1
ੴ सतिगुर प्रसादि ॥
मेरे मन हरि हरि गुन कहु रे ॥
सतिगुरू के चरन धोइ धोइ पूजहु इन बिधि मेरा हरि प्रभु लहु रे ॥ रहाउ ॥
कामु क्रोधु लोभु मोहु अभिमानु बिखै रस इन संगति ते तू रहु रे ॥
मिलि सतसंगति कीजै हरि गोसटि साधू सिउ गोसटि हरि प्रेम रसाइणु राम नामु रसाइणु हरि राम नाम राम रमहु रे ॥1॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: केदारा महला 4 घरु 1 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे मेरे मन ! परमात्मा के गुण गाया कर। गुरू के चरण धो-धो के पूजा कर (भाव। अहंकार छोड़ के गुरू के चरण पड़ा रह)। हे मन ! इस तरीके से प्यारे प्रभू को ढूँढ ले। रहाउ। हे मन ! काम। क्रोध। लोभ। मोह। अहंकार। विषियों के चस्के – इनसे हमेशा दूर बना रह। हे मन ! साध-संगति में मिल के हरी-गुणों की विचार करनी चाहिए। हे मेरे मन ! परमात्मा का प्यार सब रसों से श्रेष्ठ रस है। परमात्मा का नाम सारे रसों का घर है। सदा परमात्मा का नाम सिमरा कर। 1।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

रामदास जी का जीवन-व्यवहार और रचना दोनों एक तरह की संगति में रहीं। अमृतसर का चयन, हरमंदिर साहिब का स्थल, और सूही राग की भावुक रचनाएँ, सब एक ही मनोदशा के अलग-अलग पहलू हैं।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “केदारा महला 4 घरु 1 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है।”

पाठ की पारम्परिक विधि सरल है। एक बार धीमे-से पूरा शबद, हिन्दी अर्थ के साथ। फिर एक बार बिना अर्थ के, सिर्फ़ देवनागरी, ताकि लय अपनी जगह बैठ सके। दूसरी बार में स्वर अपना काम करता है, और जो पंक्ति आज की किसी स्थिति से जुड़ती है, उसे चिन्हित कर लेना उपयोगी रहता है। यही ‘हुकमनामा’ की भावना है, यानी आज के दिन के लिए एक संकेत।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।