जागातीआ उपाव सिआणप करि वीचारु डिठा भंनि बोलका सभि उठि गइआ ॥ त्रितीआ आए सुरसरी तह कउतकु चलतु भइआ ॥5॥ मिलि आए नगर महा जना गुर सतिगुर ओट गही ॥ गुरु सतिगुरु गुरु गोविदु पुछि सिम्रिति कीता सही ॥ सिम्रिति सासत्र सभनी सही कीता सुकि प्रहिलादि स्रीरामि करि गुर गोविदु धिआइआ ॥ देही नगरि कोटि पंच चोर वटवारे तिन का थाउ थेहु गवाइआ ॥ कीरतन पुराण नित पुंन होवहि गुर बचनि नानकि हरि भगति लही ॥ मिलि आए नगर महा जना गुर सतिगुर ओट गही ॥6॥4॥10॥
अर्जन देव की वाणी में एक compiler-कवि की बारीकी है। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। यह शबद उसी सघनता का एक उदाहरण है।
हिन्दी अर्थ: जो अपने आप को गुरू का सिख बता रहे हैं। उनसे हम महसूल ले नहीं सकते)। हे भाई ! मसूलियों ने कई उपाय सोचे। कई तरह से विचार किया। (आखिर उन्होंने) विचार करके देख लिया (कि महसूल उगराहने में हमारी पेश नहीं जा सकती)। अपनी गोलकें बँद करके वे सारे उठ के चले गए। हे भाई ! (दो तीर्थों से होकर सतिगुरू अमरदास जी) तीसरी जगह गंगा पहुँचे। वहाँ एक अजीब तमाशा हुआ। 5। हे भाई ! नगर के मुखी जन मिल के (गुरू अमरदास जी के पास) आए। (उन्होंने) गुरू की ओट ली। सतिगुरू का पल्ला पकड़ा। (गुरू से) पूछ के उन पाँचों ने ये निर्णय कर लिया कि ‘गुरू सतिगुरू’ ‘गुरु गोविंद’ को (हृदय में बसाना ही असल) स्मृति है। हे भाई ! उन सारे महा जनों (मुखिया जनों) ने (गुरू से पूछ कर) ये निर्णय कर लिया (कि जैसे) सुक देव ने प्रहलाद ने श्री राम चंद्र ने ‘गोविंद। गोविंद’ कह-कह के ‘गुर गोविंद’ का नाम सिमरा था (वैसे ही गुर गोविंद को सिमरना ही असल) स्मृतियाँ और शास्त्र हैं। (उन सुकदेव। प्रहलाद श्रीराम ने) शरीर-नगर में बसने वाले शरीर-किले में बसने वाले (कामादिक) पांच चोरों को पाँच डाकुओं को (मार के) उनका (अपने अंदर से) निशान ही मिटा दिया था। हे भाई ! (नगर के पँचों ने गुरू) नानक के द्वारा गुरू के उपदेश के द्वारा परमात्मा की भक्ति करने की दाति हासिल कर ली। (नगर में) सदा कीर्तन होने लग पड़े- (यही उन मुखी जनों के लिए) पुराणों के पाठ और पुन्य-दान (हो गए)। हे भाई ! नगर मुखिया मनुष्य मिल के (गुरू अमरदास जी के पास) आए। (उन्होंने) गुरू की ओट ली। (उन्होंने) सतिगुरू का पल्ला पकड़ा। 6। 4। 10।
अर्जन देव जी के लगभग दो हज़ार शबद आदि ग्रंथ में हैं, सबसे अधिक किसी एक रचयिता के। उन्होंने आदि ग्रंथ का संकलन हरमंदिर साहिब में 1604 में स्थापित किया, और सिख-शहादत की परम्परा 1606 में उन्हीं से शुरू होती है।
हिन्दी अर्थ: तुखारी छंत महला 5 वह अद्वितीय परमेश्वर जिसका वाचक ओम् है, केवल (ऑकार स्वरूप) एक है, सतगुरु की कृपा से प्राप्त होता है। हे सुंदर लाल ! गुरू के द्वारा (गुरू की शरण पड़ कर) मैंने अपना (यह) मन (आपको) दे दिया है। मैं आपसे सदके जाता हूँ। हे लाल ! आपकी सिफत-सालाह की बाणी सुन के मेरा मन (आपके नाम-रस से) भीग गया है। हे मुरारी ! (मेरा यह) मन (आपके नाम-रस से यूँ) भीग गया है (मेरे अंदर आपका इतना) प्यार बन गया है (कि इस नाम-जल के बिना यह मन जी ही नहीं सकता) जैसे पानी की मछली (पानी के बिना नहीं रह सकती)। हे मेरे मालिक ! आपका मूल्य नहीं आँका जा सकता (आप किसी दुनियावी पदार्थ के बदले में नहीं मिल सकता)। आपके ठिकाने का दूसरा छोर नहीं मिल सकता। हे सारे गुण देने वाले मालिक ! मेरी गरीब की एक विनती सुन- (मुझे) नानक को अपने दर्शन बख्श। मैं आपसे सदके हूँ। मैं अपनी यह निमाणी सी जिंद आप पर से वारता हूँ। 1। हे मेरे प्रभू ! (मेरा) यह शरीर आपका (दिया हुआ है)। (मेरा) यह मन आपका (बख्शा हुआ है)। सारे गुण भी आपके ही बख्शे मिलते हैं। मैं आपके दर्शनों से कुर्बान जाता हूँ। हे मेरे प्रभू ! (मैं) आपके दर्शन (से सदके जाता हूँ)। आँख झपकने जितने समय के लिए ही (मेरी ओर) निगाह कर। (आपको) देख के मैं आत्मिक जीवन हासिल करता हूँ। हे प्रभू ! आपका नाम आत्मिक जीवन देने वाला सुनते हैं। अगर आप (मेरे ऊपर) मेहर करे तो ही मैं (आपका नाम-जल) पी सकता हूँ। हे मेरे प्रभू-पति ! आपके दर्शनों की खातिर मेरे अंदर तमन्ना पैदा हैं रही है। उस चाहत की (जैसे) प्यास लगी हुई है (दर्शनों के बिना वह प्यास मिटती नहीं)। जैसे पपीहा (स्वाति-नक्षत्र की वर्षा की) बूँद का इन्तजार करता रहता है। हे नानक ! कह- हे मेरे प्रभू ! मुझे (अपने) दर्शन दे। मैं अपनी यह जिंद आपसे कुरबान करता हूँ। 2। हे प्रभू ! आप सदा कायम रहने वाला मालिक है। आप बेअंत बड़ा शाहु है। हे प्रभू ! आप (हमारा) प्रीतम है। (हमारा) प्यारा है। आप हमारे प्राणों का रक्षक है। आप हमारी जीवात्मा का रखवाला है। हे प्रभू ! आप (हमें) जिंद देने वाला है। सारे सुख देने वाला है। जो मनुष्य गुरू के सन्मुख रह के आपके साथ गहरी सांझ डालता है। उसके अंदर सारे आत्मिक आनंद पैदा हैं जाते हैं। हे प्रभू ! जिस तरह का हुकम तूने किया होता है। जीव वही काम करता है। हे भाई ! जगत के मालिक प्रभू ने जिस मनुष्य पर मेहर की। उसने गुरू की संगति में (रह के अपने) मन को वश में कर लिया। हे नानक ! कह- (हे प्रभू ! मेरी यह) निमाणी जिंद आपसे सदके है। ये जिंद ये शरीर आपका ही दिया हुआ है। 3। हे मेरे प्रभू ! संत जनों की शरण पड़ने की बरकति से तूने मुझ गुणहीन को (भी विकारों से) बचा लिया है। सतिगुरू ने मुझ पापी का पर्दा ढक लिया है (मेरे पाप जग-जाहिर नहीं होने दिए)। हे हम जीवों के मालिक ! हे सब जीवों का पर्दा ढकने की समर्थता वाले ! हे जिंद देने वाले ! हे प्राण देने वाले ! हे सुख देने वाले ! हे नाश-रहित स्वामी ! हे अदृष्य स्वामी ! हे सब गुणों से भरपूर प्रभू ! हे सर्व व्यापक ! हे सृजनहार ! आपकी उस्तति बयान नहीं की जा सकती। कोई नहीं बता सकता कि आप कब का है। दास नानक उस (गुरू) से कुर्बान है (जिसकी कृपा से) परमात्मा का नाम आँख झपकने जितने समय में ही मिल जाता है। 4। 1। 11।
इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।
अर्जन देव की वाणी पढ़ने पर पता चलता है कि वो एक संगठक-कवि थे। हर शब्द में संरचना, क्रम, और अर्थ की कई परतें मिल कर बैठती हैं। आदि ग्रंथ के संकलन के दो साल बाद, 1606 में, उन्होंने मुगल यंत्रणा में अपनी जान दे दी, और सिख-शहादत की परम्परा यहीं से शुरू होती है।
इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “जो अपने आप को गुरू का सिख बता रहे हैं।”
एक पंक्ति, दो-तीन बार। यह पढ़ने का ढंग है जो इस तरह की वाणी से सबसे ज़्यादा खुलता है। अर्थ की कई परतें हैं, और हर पाठ में एक अलग परत सामने आती है। पाठ की धैर्य-शीलता ही असली शिक्षा है, गति नहीं।
स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।
स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।