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अंग 1115

अंग
1115
राग तुखारी
राग: तुखारी · रचयिता: Guru Raam Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
तिन का जनमु सफलिओ सभु कीआ करतै जिन गुर बचनी सचु भाखिआ ॥
ते धंनु जन वड पुरख पूरे जो गुरमति हरि जपि भउ बिखमु तरे ॥
सेवक जन सेवहि ते परवाणु जिन सेविआ गुरमति हरे ॥3॥
तू अंतरजामी हरि आपि जिउ तू चलावहि पिआरे हउ तिवै चला ॥
हमरै हाथि किछु नाहि जा तू मेलहि ता हउ आइ मिला ॥
जिन कउ तू हरि मेलहि सुआमी सभु तिन का लेखा छुटकि गइआ ॥
तिन की गणत न करिअहु को भाई जो गुर बचनी हरि मेलि लइआ ॥
नानक दइआलु होआ तिन ऊपरि जिन गुर का भाणा मंनिआ भला ॥
तू अंतरजामी हरि आपि जिउ तू चलावहि पिआरे हउ तिवै चला ॥4॥2॥
रामदास जी की रचनाओं में एक स्नेह-भरी लय है। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्र है, उन्हीं की रचना है, और उसी लय की प्रतिध्वनि इस शबद में भी सुनी जा सकती है।

हिन्दी अर्थ: हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू के वचनों पर चल कर सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरा। करतार ने उनका सारा जनम सफल कर दिया। हे भाई ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं। महापुरख हैं। गुणों के पात्र हैं। जो गुरू की मति पर चल कर इस मुश्किल तैरे जाने वाले संसार-समुंद्र से पार लांघ जाते हैं। हे भाई ! परमात्मा के भगत (परमात्मा की) सेवा-भक्ति करते हैं। वह (परमात्मा की हजूरी में) आदर-सत्कार पाते हैं। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू की मति पर चल के प्रभू की सेवा-भक्ति की (परमात्मा ने उनके सारे पाप एक छिन में ही दूर कर दिए)। 3। हे हरी ! आप स्वयं सब के दिल की जानने वाला है। हे प्यारे ! जैसे आप (हम जीवों को) जीवन-राह पर चलाता है। मैं उसी तरह ही चलता हूँ। हे हरी ! हम जीवों के वश में कुछ भी नहीं। जब आप (मुझे अपने चरणों में) मिलाता है। तब (ही) मैं आ के मिलता हूँ। हे हरी ! हे स्वामी ! जिनको आप (अपने चरणों में) जोड़ता है। उनके (पिछले किए कर्मों का) सारा लेख समाप्त हैं जाता है (उनके अंदर से पिछले किए सारे बुरे कर्मों के संस्कार मिट जाते हैं)। हे भाई ! जिन मनुष्यों को परमात्मा गुरू के बचनों पर चला के (अपने साथ) मिलाता है। कोई भी पक्ष उनके (पिछले कर्मों की) विचार मत करना (क्योंकि उनके अंदर से तो वे सारे संस्कार मिट जाते हैं)। हे नानक ! जो मनुष्य गुरू की रज़ा को मीठी कर के मानते हैं। परमात्मा उन पर स्वयं दयावान होता है। हे हरी ! आप स्वयं सब के दिल की जानने वाला है। हे प्यारे ! जैसे आप (हम जीवों को) जीवन-राह पर चलाता है। मैं उसी तरह चलता हूँ। 4। 2।
तुखारी महला 4 ॥
तू जगजीवनु जगदीसु सभ करता स्रिसटि नाथु ॥
तिन तू धिआइआ मेरा रामु जिन कै धुरि लेखु माथु ॥
जिन कउ धुरि हरि लिखिआ सुआमी तिन हरि हरि नामु अराधिआ ॥
तिन के पाप इक निमख सभि लाथे जिन गुर बचनी हरि जापिआ ॥
धनु धंनु ते जन जिन हरि नामु जपिआ तिन देखे हउ भइआ सनाथु ॥
तू जगजीवनु जगदीसु सभ करता स्रिसटि नाथु ॥1॥
तू जलि थलि महीअलि भरपूरि सभ ऊपरि साचु धणी ॥
जिन जपिआ हरि मनि चीति हरि जपि जपि मुकतु घणी ॥
जिन जपिआ हरि ते मुकत प्राणी तिन के ऊजल मुख हरि दुआरि ॥
ओइ हलति पलति जन भए सुहेले हरि राखि लीए रखनहारि ॥
हरि संतसंगति जन सुणहु भाई गुरमुखि हरि सेवा सफल बणी ॥
तू जलि थलि महीअलि भरपूरि सभ ऊपरि साचु धणी ॥2॥
तू थान थनंतरि हरि एकु हरि एको एकु रविआ ॥
वणि त्रिणि त्रिभवणि सभ स्रिसटि मुखि हरि हरि नामु चविआ ॥
सभि चवहि हरि हरि नामु करते असंख अगणत हरि धिआवए ॥
सो धंनु धनु हरि संतु साधू जो हरि प्रभ करते भावए ॥
सो सफलु दरसनु देहु करते जिसु हरि हिरदै नामु सद चविआ ॥
तू थान थनंतरि हरि एकु हरि एको एकु रविआ ॥3॥
तेरी भगति भंडार असंख जिसु तू देवहि मेरे सुआमी तिसु मिलहि ॥
जिस कै मसतकि गुर हाथु तिसु हिरदै हरि गुण टिकहि ॥
हरि गुण हिरदै टिकहि तिस कै जिसु अंतरि भउ भावनी होई ॥
गुरु रामदास जी ने 1577 के क़रीब अमृतसर शहर की नींव रखी, और हरमंदिर साहिब का स्थान चुना। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य-प्रेम की tasviren बार-बार लौटती हैं।

हिन्दी अर्थ: तुखारी महला 4॥ हे प्रभू ! आप जगत के जीवों को जिंदगी देने वाला है। आप जगत का मालिक है। आप सारी (सृष्टि) का खसम है। हे प्रभू ! धुर दरगाह से जिनके भाग्यों में (हरी-सिमरन के संस्कारों का) लेख लिखा हुआ है। जिनका माथा भाग्यशाली है। उन्होंने आपको सिमरा है। हे भाई ! उन्होंने मेरे राम को सिमरा है। हे भाई ! मालिक-हरी ने जिनके भाग्यों में धुर से सिमरन का लेख लिख दिया है। वह (सदा) हरी-नाम का सिमरन करते हैं। हे भाई ! जिन्होंने गुरू के बचनों पर चल के परमात्मा का नाम जपा है। उनके सारे सारे पाप आँख झपकने जितने समय में दूर हो जाते हैं। हे भाई ! वे मनुष्य भाग्यशाली हैं। मुबारक हैं। जो परमात्मा का नाम जपते हैं। उनके दर्शन करके मैं (भी) पति वाला (कहलवाने योग्य) हो गया हूँ (क्योंकि मैं भी पति-प्रभू का नाम जपने लग गया हूँ)। हे प्रभू ! आप जगत के जीवों को जिंदगी देने वाला है। आप जगत का मालिक है। आप सारी (सृष्टि) का पैदा करने वाला है। आप सृष्टि का खसम पति है। 1। हे प्रभू ! आप जल में धरती में आकाश में (हर जगह) व्यापक है। आप सब जीवों के सिर पर है। आप सदा कायम रहने वाला मालिक है। हे भाई ! जिन मनुष्यों ने अपने मन में अपने चित्त में परमात्मा का नाम (सदा) जपा (वे विकारों से बच गए)। हे भाई ! प्रभू का नाम बार-बार जपके बेअंत दुनिया मुक्त हो जाती है। हे भाई ! जो प्राणी परमात्मा का नाम जपते हैं। वे पवित्र जीवन वाले हो जाते हैं। परमात्मा के दर पर उनके मुँह उज्जवल होते हैं (प्रभू के द्वार पर वे आदर-मान पाते हैं)। वे लोग इस लोक में और परलोक में सुखी जीवन वाले हो जाते हैं। बचाने की समर्थता वाले परमात्मा ने उन्हें स्वयं (विकारों से) बचा लिया होता है। हे हरी ! हे संत जनो ! हे साध-संगति ! हे भाई ! सुनो- गुरू की शरण पड़ कर ही परमात्मा की की हुई सेवा-भक्ति सफल होती है। हे प्रभू ! आप जल में धरती में आकाश में (हर जगह) व्यापक है। आप सब जीवों के सिर पर है। आप सदा कायम रहने वाला मालिक है। 2। हे हरी ! हरेक जगह में एक आप ही आप मौजूद है। हे प्रभू ! जंगल में। तिनकों में। त्रिभवणी जगत में- हर जगह आप ही आप बस रहा है। हे भाई ! सारी सृष्टि (भाव। सारी सृष्टि के जीव) अपने मुँह से हरी-नाम ही उचार रही है। हे भाई ! असंखों जीव अनगिनत जीव सारे ही करतार का नाम सदा उचार रहे हैं। हे भाई ! (सारी सृष्टि) हरी का नाम सिमर रही है। हे भाई ! हरी का वह संत हरी का वह साधु धन्य है धन्य है। जो हरी-प्रभू को जो करतार को प्यारा लगता है (भा जाता है)। हे करतार ! जिसके हृदय में (आप बसता है)। जो सदा (आपका) नाम उचारता है। वह मनुष्य कामयाब (जीवन वाला) है। (मुझे उसका) दर्शन बख्श। हे हरी ! हरेक जगह पर एक आप ही आप मौजूद है। 3। हे मेरे स्वामी ! (आपके घर में) आपकी भक्ति के बेअंत खजाने भरे पड़े हैं। (पर यह खजाने) उस (मनुष्य) को मिलते हैं जिसको आप (स्वयं) देता है। हे भाई ! जिस (मनुष्य) के माथे पर गुरू का हाथ हो। उसके हृदय में परमात्मा के गुण टिके रहते हैं। हे भाई ! जिस (मनुष्य) के अंदर (परमात्मा का) डर-अदब है (परमात्मा के लिए) श्रद्धा-प्यार है। उसके हृदय में परमात्मा के गुण टिके रहते हैं।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। भैरव, बसन्त, सारंग, मल्हार, और कान्हड़ा राग। सत्रहवीं सदी की रचनाओं का बड़ा हिस्सा।

गुरु रामदास जी 1574 में गुरु-गद्दी पर बैठे और 1581 तक रहे। उन्हीं ने अमृतसर शहर बसाया, हरमंदिर साहिब की नींव रखी। उनकी वाणी में पानी, सरोवर, और गुरु-शिष्य प्रेम की तस्वीरें बार-बार लौटती हैं। ‘सूही-दी-लावां’, जो सिख विवाह-संस्कार का केन्द्रीय शब्द-समूह है, उन्हीं की रचना है।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा। पहले की प्रारम्भिक पंक्ति यह है: “हे भाई ! जिन मनुष्यों ने गुरू के वचनों पर चल कर सदा-स्थिर हरी-नाम सिमरा।”

बैठ कर पढ़ने का सुझाव है। पहले संस्कृत-तुल्य देवनागरी पाठ को बिना समझे एक बार पढ़ लीजिए, सिर्फ़ ध्वनि-लय के लिए। फिर हिन्दी अनुवाद के साथ दूसरी बार। दूसरे पाठ में, अक्सर, शब्दों की अपनी ध्वनि अधिक स्पष्ट होती है। बीच में रुक कर सोचने में कोई हानि नहीं।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।