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अंग 1052

अंग
1052
राग मारू
राग: मारू · रचयिता: Guru Amar Daas Ji
पढ़ने का समय: लगभग 2-3 मिनट
जह देखा तू सभनी थाई ॥
पूरै गुरि सभ सोझी पाई ॥
नामो नामु धिआईऐ सदा सद इहु मनु नामे राता हे ॥12॥
नामे राता पवितु सरीरा ॥
बिनु नावै डूबि मुए बिनु नीरा ॥
आवहि जावहि नामु नही बूझहि इकना गुरमुखि सबदु पछाता हे ॥13॥
पूरै सतिगुरि बूझ बुझाई ॥
विणु नावै मुकति किनै न पाई ॥
नामे नामि मिलै वडिआई सहजि रहै रंगि राता हे ॥14॥
काइआ नगरु ढहै ढहि ढेरी ॥
बिनु सबदै चूकै नही फेरी ॥
साचु सलाहे साचि समावै जिनि गुरमुखि एको जाता हे ॥15॥
जिस नो नदरि करे सो पाए ॥ साचा सबदु वसै मनि आए ॥
नानक नामि रते निरंकारी दरि साचै साचु पछाता हे ॥16॥8॥
गुरु अमरदास जी ने तिहत्तर की उम्र में गुरु-गद्दी सँभाली थी, 1552 में। उनकी वाणी में बुढ़ापे की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध एक सीधा रुख़।

हिन्दी अर्थ: हे प्रभू ! मैं जिधर देखता हूँ। आप सब जगहों में बसता मुझे दिखाई देता है। मुझे ये सारी समझ पूरे गुरू से मिली है। हे भाई ! सदा ही सदा ही परमात्मा का नाम ही नाम सिमरना चाहिए। (जो मनुष्य सिमरता है उसका) यह मन नाम में ही रंगा जाता है। 12। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा के नाम-रंग में रंगा रहता है। उसका शरीर (विकारों की मैल से) पवित्र रहता है; पर जो मनुष्य नाम से टूटे रहते हैं। वे (विकारों में) डूबके (आत्मिक मौत) मरे रहते हैं। वे विकारों का रक्ती भर भी मुकाबला नहीं कर सकते। जो मनुष्य हरी नाम की कद्र नहीं समझते। वे जगत में आते हैं और (खाली ही) चले जाते हैं। पर कई ऐसे हैं जो गुरू की शरण पड़ कर गुरू-शबद से सांझ डालते हैं। 13। हे भाई ! पूरे गुरू ने (हमें ये) समझ बख्शी है कि परमात्मा के नाम के बिना किसी भी मनुष्य ने (विकारों से) मुक्ति हासिल नहीं की। जो मनुष्य हर वक्त नाम में लीन रहता है उसको (लोक-परलोक की) इज्जत मिलती है। वह आत्मिक अडोलता में टिका रहता है। वह प्रेम-रंग में रंगा रहता है। 14। हे भाई ! यह शरीर-नगर (आखिर) गिर जाता है। और ढह-ढेरी हो जाता है। पर गुरू-शबद (को मन में बसाए) बिना (जीवात्मा का) जनम-मरण का चक्कर समाप्त नहीं होता। जो मनुष्य गुरू की शरण पड़ कर एक परमात्मा के साथ सांझ डालता है वह सदा-स्थिर परमात्मा की सिफत-सालाह करता रहता है। वह सदा-स्थिर (की याद) में लीन रहता है। 15। हे भाई ! वही मनुष्य (सिफत-सालाह की दाति) हासिल करता है। जिस पर परमात्मा मेहर की निगाह करता है। सदा स्थिर परमात्मा की सिफत-सालाह का शबद उसके मन में आ बसता है। हे नानक ! जो मनुष्य निरंकार के नाम में रंगे रहते हैं। जो सदा-स्थिर प्रभू के साथ सांझ डालते हैं वे उस सदा स्थिर के दर पर (कबूल हो जाते हैं)। 16। 8।
मारू सोलहे 3 ॥
आपे करता सभु जिसु करणा ॥
जीअ जंत सभि तेरी सरणा ॥
आपे गुपतु वरतै सभ अंतरि गुर कै सबदि पछाता हे ॥1॥
हरि के भगति भरे भंडारा ॥
आपे बखसे सबदि वीचारा ॥
जो तुधु भावै सोई करसहि सचे सिउ मनु राता हे ॥2॥
आपे हीरा रतनु अमोलो ॥
आपे नदरी तोले तोलो ॥
जीअ जंत सभि सरणि तुमारी करि किरपा आपि पछाता हे ॥3॥
जिस नो नदरि होवै धुरि तेरी ॥
मरै न जंमै चूकै फेरी ॥
साचे गुण गावै दिनु राती जुगि जुगि एको जाता हे ॥4॥
माइआ मोहि सभु जगतु उपाइआ ॥
ब्रहमा बिसनु देव सबाइआ ॥
जो तुधु भाणे से नामि लागे गिआन मती पछाता हे ॥5॥
पाप पुंन वरतै संसारा ॥
हरखु सोगु सभु दुखु है भारा ॥
गुरमुखि होवै सो सुखु पाए जिनि गुरमुखि नामु पछाता हे ॥6॥
किरतु न कोई मेटणहारा ॥
गुर कै सबदे मोख दुआरा ॥
पूरबि लिखिआ सो फलु पाइआ जिनि आपु मारि पछाता हे ॥7॥
माइआ मोहि हरि सिउ चितु न लागै ॥
दूजै भाइ घणा दुखु आगै ॥
मनमुख भरमि भुले भेखधारी अंत कालि पछुताता हे ॥8॥
हरि कै भाणै हरि गुण गाए ॥
सभि किलबिख काटे दूख सबाए ॥
हरि निरमलु निरमल है बाणी हरि सेती मनु राता हे ॥9॥
जिस नो नदरि करे सो गुण निधि पाए ॥
हउमै मेरा ठाकि रहाए ॥
गुण अवगण का एको दाता गुरमुखि विरली जाता हे ॥10॥
मेरा प्रभु निरमलु अति अपारा ॥
आपे मेलै गुर सबदि वीचारा ॥
अमरदास जी का स्वर एक बड़ी उम्र के व्यक्ति का है, जिसने समाज को क़रीब से देखा है। लंगर-व्यवस्था और बाईस मंजी (केन्द्र) देश-भर में स्थापित करना उन्हीं का काम है।

हिन्दी अर्थ: मारू सोलहे 3॥ हे प्रभू ! आप स्वयं ही वह करतार है जिसका (रचा हुआ यह) सारा जगत है। सारे जीव आपकी ही शरण में हैं। हे भाई ! प्रभू खुद ही सब जीवों के अंदर गुप्त रूप में मौजूद है। गुरू के शबद से उसके साथ सांझ पड़ सकती है। 1। हे भाई ! हरी के खजाने में भक्ति के भंडारे भरे पड़े हैं। गुरू के शबद से स्वयं ही प्रभू यह सूझ बख्शता है। हे प्रभू ! जो आपको अच्छा लगता है। वही कुछ जीव करते हैं। हे भाई ! (प्रभू की रजा से ही) जीव का मन उस सदा-स्थिर प्रभू के साथ जुड़ सकता है। 2। हे भाई ! प्रभू स्वयं ही (कीमती) हीरा है खुद ही अमोलक रत्न है। प्रभू स्वयं ही अपनी मेहर की निगाह से (इस हीरे की) परख करता है। हे प्रभू ! सारे ही जीव आपकी ही शरण में हैं। आप स्वयं ही कृपा करके (अपने साथ) गहरी सांझ पैदा करता है। 3। हे प्रभू ! जिस मनुष्य पर धुर से आपकी हजूरी से आपकी मेहर की निगाह हैं। वह बार-बार पैदा होता-मरता नहीं। उसका जनम-मरण का चक्कर समाप्त हो जाता है। हे भाई ! (जिस पर उसकी निगाह हो। वह) दिन-रात सदा-स्थिर प्रभू के गुण गाता है। हरेक युग में वह उस प्रभू को ही (बसता) समझता है। 4। यह सारा ही जगत तूने माया के मोह में (ही) पैदा किया है (सब पर माया का प्रभाव है)। हे प्रभू ! ब्रहमा। विष्णू। सारे ही देवता गण (जो भी जगत में पैदा हुआ है) जो आपको अच्छे लगते हैं। वह आपके नाम में जुड़ते हैं। आत्मिक जीवन की सूझ वाली मति के द्वारा ही आपके साथ जान-पहचान बनती है। 5। हे भाई ! सारे जगत में (माया के प्रभाव तहत ही) पाप और पुन्य हो रहा है। (माया के मोह में ही) हर जगह कहीं खुशी और कहीं ग़मी है (माया के मोह का) बहुत सारा दुख (जगत को व्याप रहा है)। जिस मनुष्य ने गुरू की शरण पड़ कर हरी-नाम के साथ सांझ डाली है। जो गुरू के सन्मुख रहता है वही आत्मिक आनंद पाता है। 6। हे भाई ! कोई मनुष्य पिछले किए कर्मों की कमाई मिटा नहीं सकता। (पिछले किए कर्मों से) मुक्ति का रास्ता गुरू के शबद द्वारा ही मिलता है। जिस मनुष्य ने स्वै भाव मिटा के (हरी-नाम के साथ) सांझ डाल ली। उसने भी जो कुछ पूर्बले जनम में कमाई की। वही फल अब प्राप्त किया। 7। हे भाई ! माया के मोह के कारण परमात्मा के साथ मन जुड़ नहीं सकता। माया के मोह में फसे रहने से जीवन-सफर में बहुत दुख होता है। मन के मुरीद मनुष्य धार्मिक पहरावा पहन के भी भटकना के कारण गलत राह पर पड़े रहते हैं। आखिरी वक्त में पछताना पड़ता है। 8। हे भाई ! जो मनुष्य परमात्मा की रजा में रह के परमात्मा के गुण गाता है। वह अपने सारे पाप सारे दुख (अपने अंदर से) काट देता है। उस का मन उस प्रभू के साथ रंगा रहता है। जो विकारों की मैल से रहित है और जिसकी सिफत सालाह की बाणी भी पवित्र है। 9। हे भाई ! परमात्मा जिस मनुष्य पर मेहर की निगाह करता है वह उस गुणों के खजाने हरी का मिलाप हासिल कर लेता है। वह मनुष्य अपने अंदर से अहंकार और ममता (के प्रभाव) को रोक देता है। हे भाई ! गुरू के सन्मुख रहने वाले विरलों (कुछ एक ने ही) ये समझ लिया है कि गुण देने वाला और अवगुण पैदा करने वाला सिर्फ परमात्मा ही है। 10। हे भाई ! मेरा प्रभू बड़ा बेअंत है और विकारों के प्रभाव से परे है। गुरू के शबद द्वारा (अपने गुणों की) विचार बख्श के वह स्वयं ही (जीव को अपने साथ) मिलाता है।

इस राग की धुन का अपना मिज़ाज है, और शास्त्रीय परम्परा में इसकी अपनी विशिष्टता है। ग्रंथ के संकलन के समय यह राग चुना गया क्योंकि इसकी रचनाएँ इसी सुर में बँधी थीं। रामकली राग का योग-केन्द्रित क्षेत्र। गुरु नानक का नाथ-योगियों से संवाद यहीं संग्रहीत है।

अमरदास जी ने एक ऐसी उम्र में गुरु-गद्दी पायी जब अधिकांश लोग रिटायर हो जाते हैं। उनकी रचनाओं में एक बड़े आदमी की दूर-तक देखी हुई दृष्टि झलकती है, और जाति-भेद के विरुद्ध उनका सीधा रुख़ बाद की सिख-परम्परा का foundational-वाक्य बना।

इस अंग पर दो शबद बैठे हैं, एक के बाद दूसरा।

इस ग्रंथ का पाठ अकेले भी हो सकता है, मगर पंजाब की कीर्तन-परम्परा में संगति का एक विशेष स्थान है। अमृतसर के हरमंदिर साहिब में रोज़ सुबह आसा-दी-वार, शाम को रहिरास, और रात को सोहिला, यह तीनों प्रार्थनाएँ चार सदियों से अनवरत चल रही हैं। पाठ का जो अनुभव कीर्तन-संगति में होता है, वो अकेले पाठ से भिन्न है।

स्रोत-नोट: यहाँ का देवनागरी पाठ बानीडीबी डेटाबेस (Khalis Foundation का खुला-स्रोत संग्रह) से लिया गया है। हिन्दी अनुवाद का आधार प्रोफ़ेसर साहिब सिंह जी की प्रसिद्ध टीका है, जो 1962 में पंजाबी विश्वविद्यालय द्वारा प्रकाशित हुई थी और आज भी विद्वानों के बीच मानक मानी जाती है। गहन व्याख्या के लिए परम्परागत ‘स्टीक’ और ‘टीका’ संसाधन उपलब्ध हैं।

स्रोत: हिन्दी अर्थ banidb.com (Khalis Foundation) के डेटा से। टीका प्रोफ़ेसर साहिब सिंह की टीका पर आधारित। देवनागरी transliteration lulla.net पर automated।
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